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ऊँटों में होने वाले तीन प्रमुख रोग तथा उनसे बचाव Camel farming is an indispensable occupation of desert areas as camel is an important part of the desert ecosystem. Due to its unique bio-physical characteristics, it has become a symbol of adaptation to survive in the harshness of arid regions. Camel's milk has medicinal value and is used as a medicine in many complex diseases including diabetes, asthma, jaundice, tuberculosis, anemia, cancer and liver. ऊँटों में होने वाले तीन प्रमुख रोग तथा उनसे बचाव ऊंट पालन रेगिस्तानी क्षेत्रों का अपरिहार्य व्यवसाय है क्योकि ऊँट रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण भाग है। अपनी अनूठी जैव-भौतिकीय विशेषताओं के कारण यह शुष्क क्षेत्रों की विषमताओं में जीवनयापन के लिए अनुकूलन का प्रतीक बन गया है।  मरूधरा की कठिन जीवनयापन शैली में यह मानव का जीवन संगी है। रेत के धोरो में ऊँट के बिना जीवन बिताना दुष्कर है। रेगिस्तान का जहाज कहलाने वाला ये पशु कोई भी विकट परिस्थितियों में भी ज़िन्दा रह सकता है और इस पशु ने भार वाहन के क्षेत्र में अपरिहार्यता की हद तक पहचान बनाई है । इसके अतिरिक्त भी ऊँट की बहुत सी उपयोगिताएं हैं, जो निरन्तर सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों से प्रभावित है। ऊंटनी के दूध का ओषधिय महत्त्व होता है। इसका उपयोग मधुमेह, दमा, पीलिया, तपेदिक, एनीमिया, कैंसर और...

पशुओं में खुरपका-मुँहपका ( एफ.एम.डी.) रोग  यह रोग एक विषाणु जनित रोग है। इस विषाणु के सात मुख्य प्रकार है। भारत में इस रोग के केवल तीन प्रकार ( ओ, ए, एशिया-1) पाये जाते है। इस रोग को खुरपका व मुंहपका ,मुहाल, एफ. एम .डी. के नाम से भी जाना जाता है। यह रोग गाय ,भैंस, बकरी ,भेड़ में तेजी से फैलने वाला रोग है। यह रोग रोगी पशु के सम्पर्क में आने से फैलता है। यह रोग एक साथ एक से अधिक पशुओं को ग्रसित कर सकता है। यह रोग सभी उम्र के पशुओं में तीव्र गति से फैलता है। पशुओं में इस रोग से मृत्यु दर तो बहुत कम है किन्तु मादा पशुओं का दुग्ध उत्पादन, उनकी गर्भधारण क्षमता और कार्य करने की क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस रोग से ग्रसित पशु में आजीवन एवं लम्बे समय तक उत्पादन क्षमता और कार्य क्षमता में कमी आ जाती है। संक्रमित पशुओं की कार्य क्षमता एवं उत्पादन क्षमता में कमी आ जाने के कारण पशुपालक को अत्यधिक आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है तथा इस रोग से ग्रसित पशु में गर्मियों में हाँकने की समस्या बनी रहती है। रोग का फैलाव :- पशुओं के मुँह से अत्यधिक मात्रा में लार गिरती है, इससे आस पास का वातावरण संक्रमित हो जाता है।पशु की देखभाल करने...

Major breeds of sheep and goat in India भारतीय कृषि में पशु पालन के अन्तर्गत बकरी व भेड़ पालन की महत्वपूर्ण भूमिका है जो मुख्यतः सीमांत किसान व लघु कृषकों के आजीविका के साथ निकटता से जुड़ी हुई है। समय के साथ यह व्यवसाय अपने प्रमुख उत्पादों जैसे दूध, मांस, रेशों, खाल आदि के बढ़ते मांग को देखते हुए निरंतर विस्तार की ओर अग्रसर है, जिसके अन्तर्गत मुख्यतः बहुउपयोगी नस्लों के संवर्धन द्वारा इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के प्रयास हैं। भारत बकरी व भेड़ अनुवांशिक संसाधनों का एक समृद्ध भंडार है जो वर्तमान मे 34 बकरी की नस्लें और 44 भेड़ की नस्लों के रुप मे पहचाना जाता है। अन्य नस्लें जिनका पंजीकरण नही हो पाया है उनकी राष्ट्रीय पशु अंनुवाशिक संस्थान, भारत सरकार के मघ्यम से अपने भौगौलिक क्षेत्रों में पहचान कर पंजीकरण का कार्य भी किया जा रहा है जिससे भविष्य में इन नस्लों को उनकी उपयोगिता के अनुसार बढ़ावा दिया जाये और किसानों की आजीविका से जोड़ा जाये। भारत में बकरी व भेड़ की नस्लों को क्षेत्र की जलवायु व नस्ल की उपयोगिता के अनुसार वर्गीकृत किया गया है। भारतीय क्षेत्र व जलवायु के अनुसार विभाजित भेड़ व बकरी की प्रमुख नस्लें निम्न हैः जलवायु  क्षेत्र  भेड़  बकरी ठंडा हिमालयन व हिमांचल गद्दी, चांगथांगी, गुरेज, पूंछी, भकरवाल, कश्मीर मेरिनो।  गद्दी, चांगधांगी, चेगू, भकरवाल शुष्क उत्तर भारत, मध्य भारत, राजस्थान,...

PPR Disease in Sheep and Goats  भेड़ व बकरियां ज्यादातर समाज के कमजोर एवं गरीब वर्ग द्वारा पाली जाती है इसलिए पी.पी.आर. रोग बीमारी मुख्यतः छोटे व मध्यम वर्गीय पशुपालकों को ज्यादा प्रभावित करती है, जिसका आजीविका का मुख्य स्रोत भेड़ व बकरी पालन है। यह रोग एक विषाणु (मोरबिलि विषाणु ) जनित रोग है। इस रोग में मृत्युदर बहुत अधिक होती है। यह रोग भेड़ व बकरियों में फैलता है। भेड़ की तुलना में बकरी में पी.पी.आर. रोग अधिक होता है। यह रोग सभी उम्र व लिंग की भेड़ बकरियों को प्रभावित करता है लेकिन मेमनों में मृत्युदर बहुत अधिक होती है। यह रोग पशुओं में बहुत तेजी से फैलता है और इस रोग से पशु की मृत्यु बहुत तेजी से होती है, इसलिए इसे प्लेग के नाम से भी जानते हैं। इस रोग में अधिक मृत्युदर होने की वजह से यह बीमारी पशुपालकों को आर्थिक दृष्टि से बहुत हानि पहुंचाती है और पशुपालक आर्थिक रूप से बहुत कमजोर हो जाता है। पी.पी.आर. रोग के लक्षण- इस रोग में पशु को तेज बुखार आता है,जो चार से पांच दिनों तक रहता है। पशु खाना - पीना व चलना - फिरना बंद कर देता है। त्वचा रूखी हो जाती है। रोगी पशु के मुंह,होंठ व जीभ पर छाले हो जाते हैं जिसकी वजह से पशु के मुंह से...

भेड़ के दूध का महत्व और भेड़ किसानों के आर्थिक उत्थान में इसकी भूमिका Milk has been a part of human nutrition since time immemorial. It is the first food for all mammals after birth. Milk is labeled with age old adage like complete food, super food, nutrient enriched food, first food etc. About 10,000 years ago, people hardly drink milk of animals, they first domesticated the animals for their meat, but slowly early farmers and pastoralists start taking milk as a food and at present day milk becomes the most abundant food enjoyed worldwide by each and every section of society. Milk for human consumption usually obtained from cow, buffalo, sheep, goat and in certain areas from yak, camel. The whole world is facing two major challenges these days i.e. Climate change and Malnutrition. Malnutrition encompasses food security and food safety. There is a need of adequate and nutritional food for the mankind. Modern diet and present-day lifestyle has undergone drastic changes in recent years. This resulted remarkable rise in chronic and deadly diseases. Therefore, consumers are now shifting towards health foods. They are looking for food items having moderate amount of carbohydrate, beneficial fatty acid, ample of minerals and health influential peptides. Sheep milk addresses all these nutritional facets effectively. It has some...

Pig rearing why and how? वर्तमान में शूकर पालन पशुधन उद्यमियों के लिए एक उभरता हुआ लाभदायक विकल्प है। व्यावसायिक शूकर पालन को बढ़ावा देने के लिए , विद्यार्थियों, पशु-चिकित्सकों, विभिन्न विकास संगठनों और उद्यमियों को वैज्ञानिक ज्ञान एवं कौशल प्रदान  करना है शूकर की नस्लें, उनके आवास, आहार, प्रजनन, रख-रखाव और स्वास्थ्य प्रबन्धन की महत्वपूर्ण जानकारी  एवं शूकर पालन प्रोजेक्ट के बारे में आर्थिक विश्लेषण एवं मूल्यांकन की जानकारी भी प्राप्त करना महत्वपूर्ण है शूकर पालन कम कीमत पर , कम समय में अधिक आय देने वाला व्यवसाय साबित हो सकता हैं, शूकर एक ऐसा पशु है, जिसे पालना आय की दृष्टि से बहुत लाभदायक हैं| इस पशु को पालने का लाभ यह है कि एक तो शूकर एक ही बार में 5 से 14 बच्चे देने की क्षमता वाला एकमात्र पशु है, जिनसे मांस तो अधिक  प्राप्त  होता ही है और दूसरा इस पशु में अन्य पशुओं की तुलना में साधारण आहार को मांस में परिवर्तित करने की अत्यधिक क्षमता होती है, जिस कारण रोजगार की दृष्टि से यह पशु लाभदायक सिद्ध होता है । यदि किसान शूकर पालन की शुरुआत करते हैं तो उनके लिए फायदे का सौदा हो सकता है। शूकर  पालन कोई भी किसान कर सकता है। इसके लिए सरकार द्वारा भी सहायता प्रदान की जाती है। इसके मांस में प्रोटीन होने की वजह से इसके मांस की मांग अधिक है। सुअर के मांस को निर्यात कर भी अच्छी आमदनी की जा सकती है।  शूकर का मांस भोजन के रूप में खाने के अलावा इस पशु का प्रत्येक अंग किसी न किसी रूप में उपयोगी है। शूकर की चर्बी, पोर्क, त्वचा, बाल और हड्डियों से विलासिता के सामान तैयार...

9 Major diseases and parasites of goats बकरियों में होने वाले विभिन्न रोग, उनके कारण, लक्षण, उपचार और रोकथाम के उपायों के बारे में व्यवहारिक ज्ञान होना अति आवश्यक है जिससे बकरी पालक रोगों द्वारा होने वाली हानि से बच सकता है। बकरियों में होने वाली बीमारियों का संक्षेप में विवरण यहा दिया जा रहा है जिसको ध्यान में रखकर बकरी पालक अपने रेवड़ में आयी बीमारी की पहचान कर अपने निकटतम पशुचिकित्सक से सलाह लेकर उपचार करवा सकता है- 1. फड़किया (इन्ट्रोटॉक्सिमियां) : बकरियों की यह एक प्रमुख बीमारी है जो अधिकतर वर्षा ऋतु में फेलती है। एक साथ रेवड़ में अधिक बकरियां रखने, आहार में अचानक परिवर्तन तथा अधिक प्रोटीनयुक्त हरा चारा खा लेने से यह रोग तीव्रता से बढ़ता है। यह रोग क्लासट्रिडियम परफिजेंन्स नामक जीवाणु के विष के कारण पैदा होता है। साधारणत: इस बीमारी में अफारा हो जाता है। अधिक ध्यान से दिखने पर बकरी के अंगों में फड़कन (कम्पन्न) सी दिखाई देती है इसी कारण इसे फड़किया रोग के नाम से जाना जाता है। इस रोग में पशु लक्षण प्रकट होने के 3-4 घण्टे में मर जाता है। पेट में दर्द के कारण बकरी पिछले पेंर मारती है तथा धीरे-धीर सुस्त होकर मर जाती है। यही इस रोग का प्रमुख लक्षण है। वर्षा का मौसम शुरू होने से पहले 3...

आंतरिक परजीवी: भेड़ और बकरियों में रोकथाम और नियंत्रण के उपाय As we all know that, Indiais a paradise of many parasites due to its hot and humid climatic condition. Though most of our indigenous breeds are well adapted to the harsh environment, low nutrition and tropical disease, but animal welfare and productivity are highly affected by internal parasite infestation, mainly during rainy season. Internal parasitism is one of the major problems in the small ruminant’s sector because it exhibits major health issues, which have deleterious effects on the animal performance and cause great economic loss to the producer. In fact, most of the economic losses produced by internal parasites are actually not due to mortality but production loss. The most common internal parasites in sheep and goats are Lung worms (Dictyocaulusspp. or Muelleriuscapillaris), Stomach worms (Haemonchuscontortus) commonly called Barber pole worm, Liver flukes (Fasciola hepatica), and Intestinal parasites, the most common of which are coccidia (Eimeria or Isospora). These parasites have become more difficult to manage because of developed resistance to nearly all available dewormers. Hence, the proper management of internal parasites is extremely important to the success of the small ruminant sector. The ability to observe the clinical signs of a vital infection, to properly medicate and handle the herd, and to effectively reduce the...