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जल संतुलन जलाशय: नहर कमान में एक कुशल जल भंडारण संरचना Water balancing reservoir is also known as Diggies or Tanks or Farm pond or intermediate storage structures in canal command. It is a water storage structure in canal command to store the water delivered from the water courses to farms and regulate the flow of water for agricultural irrigation. Water is pumped out of this and is distributed to the field through channels or micro irrigation system. It helps to supply irrigation water when the crop requires it, the most. All these interventions contribute to higher yield, production and water productivity. However, water balancing reservoirs are shown to be cost-effective for landholdings above 4 ha. Thus, it can directly help medium to large fully irrigated landholdings. In India, 8 % of the irrigated landholdings are in this category and they account for 24 % of the irrigated land. The right combination of water balancing reservoir or tank with canal command areas as inlet and micro-irrigation as outlet hold the key to achieve high yield and better quality of produce. Need of water balancing reservoir in the canal command areas Water balancing reservoir is very important water harvesting structure in canal command to meet the demand and supply of water to agricultural farm. It is advantageous in...

Smart Water Management: A boon for agriculture पानी की बढ़ती मांग दुनिया के सामने एक चुनौती है, खासकर सबसे शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में जहां पानी की कमी और पानी का तनाव महत्वपूर्ण समस्याएं हैं। पानी की कमी की स्थिति एक जगह पर तब होती है जब प्रति व्यक्ति प्रति दिन पानी की उपलब्धता 1000 घन मीटर से कम हो जाती है। भारत केे 2025 तक जल-तनावग्रस्त देश बनने की आशंका है, जिसके परिणामस्वरूप हमारे पास प्रति दिन प्रति व्यक्ति 1700 घन मीटर से कम पानी होगा। भारत में, कृषि पानी का प्रमुख उपभोक्ता (80%) है और कृषि उत्पादन के लिए पानी का उपयोग करते समय पानी के अतिरिक्त नुकसान की मात्रा भी बहुत बड़ी है। सिंचाई प्रणाली संचालन, शेड्यूलिंग और प्रबंधन के दौरान पानी का निरर्थक रिसाव एवं बहाव हो जाता है। ये नुकसान पानी के उपयोग की दक्षता को कम करते हैं और पानी के तनाव की समस्याएं भी पैदा करते हैं। हमारे देश में अधिकांश किसान जानकारी के अभाव में इन कुपरिणामों के समाधान से अनजान हैं। इसके अलावा, वे फसल की क्षति, प्रतिकूल मौसम के कारण कम उत्पादकता और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सतर्क उपायों के कम ज्ञान के कारण समस्या का सामना कर रहे हैं। हमें जल प्रबंधन की एक ऐसी प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है जो किसानों...

Bio-drainage is an eco-friendly solution for waterlogged areas भारत में कुल जलाक्रांत भूमि लगभग 7 मिलियन हेक्टेयर है।  परंपरागत जल निकासी प्रणाली या ड्रेनेज को सतहजल तथा धरातल जल निकासी पद्धति के नाम से भी जाना जाता है। इसका तात्पर्य है की आवश्यकता से ज्यादा या अतिरिक्त पानी को मिट्टी की सतह और मिट्टी की प्रोफाइल से हटाना है। जल निकास प्रणाली को शुरुआत में बनाने के लिए अधिक पूंजी निवेश, संचालन और रखरखाव की आवश्यकता होती है। इस समस्या को सुलझाने के लिए जैविक जल निकासी या जैव जल निकासी तकनीक को एक संभावित विकल्प केरूप मे प्रयोग कि‍या जा सकता है। दुनिया का लगभग एक तिहाई सिंचित क्षेत्र में जलाक्रांत या जलभराव की समस्या है। जलाक्रांत क्षेत्र में बढ़ौतरी के मुख्य कारण नहरों से रिसाव, खारे भूजल के निकास में कमी, नहर के पानी से सतही सिंचाई और प्राकृतिक जल निकासी की अनुपस्थिति हैं। जलभराव, पर्यावरण प्रदुषण जैसे पानी और मृदा में नमक बढ़ाने जैसी समस्या भी उत्पन करती है। जैव जल निकासी तकनीक के अन्तर्गत पौधों के माध्यम से मिट्टी के पानी की ऊर्ध्वाधर जल निकासी करते है। इस तकनीक के तहत जलाक्रांत क्षेत्र से पानी को पौधों के वाष्पन-उत्सर्जन प्रतिक्रिया के द्वारा जल निकासी करते है। यह तकनीक अन्य जल निकास तकनीक की तुलना में कम पूंजी निवेशी है साथ...

Why farmers should adopt drip irrigation  ड्रिप सिंचाई क्या है ? यह सिंचाई का एक तरीका है जो पानी की बचत करता है और यह पौधे या पेड़ की जड़ में पानी के धीरे-धीरे सोखने में (चाहे वो पौधे के ऊपर वाली मिट्टी हो या फिर जड़ हो) मदद कर खाद और उर्वरक के अधिकतम उपयोगी इस्तेमाल में मदद करता है। ड्रिप सिंचाई वॉल्व्स, पाइप, ट्यूब्स और एमीटर्स से जुड़े एक नेटवर्क की मदद से कार्य करता है। यह काम संकरे ट्यूब से जोड़कर किया जाता है जो पौधे या पेड़ की जड़ तक पानी को सीधे पहुंचाता है। ड्रिप सिंचाई व्यवस्था में माइक्रो-स्प्रे हेड्स तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह मशीन एमीटर्स के मुकाबले पानी को छोटे से क्षेत्र में फैलाता है। आमतौर पर इस तरह के स्प्रे हेड का इस्तेमाल लंबे-चौड़े जड़ वाली शराब का उत्पादन की जाने वाली फसलों और पेड़ों के लिए किया जाता है जिसके जड़ें व्यापक रूप से फैली होती हैं। कम पानी की उपल्बधता या रीसाइकिल्ड या पुनरावर्तित पानी इस्तेमाल में सब सरफेस (उप सतह) ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल किया जाता है। इसमे स्थाई या अस्थाई गड़े हुए ड्रिपर लाइन या ड्रिप टेप जो पौधे की जड़ के पास या नीचे स्थित होते हैं उसका इस्तेमाल किया जाता है। अनुकूल ड्रिप सिंचाई व्यवस्था का पता...

Water conservation and management techniques in fruits cultivation  खेती में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता धीरे - धीरे कम होती जा रही है, इसलिए यह अत्यावश्यक हो गया है की सिंचाई के लिए जल का उपयोग बहुत ही सोच समझकर एवं बुधिमतापुर्वक किया जाए । अभी भी किसान सिंचाई की पुरानी विधियां ही उपयोग में ला रहे है जिनकी सिंचाई जल प्रयोग की दक्षता बहुत कम होती है । इसलिए हमें सिंचाई की नयी तकनीको को अपनाना चाहिए जिसमें जल प्रयोग की दक्षता ज्यादा हो तथा हम जल संरक्षण की तारफ कदम बढा  सकें। जल संरक्षण के साथ साथ हमें उसके प्रबंधन पर भी ध्यान देना चाहिए क्योंकि जल प्रकाश- संश्लेशन एवं पौधों के विकास के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है । इसकी कमी फलों के उत्पादन  और हमारे मुनाफे को भी कम कर देगी  फल फसल में सिचाई का उचित समय सिंचाई की आवश्यकता फलों के रोपण विधि पर निर्भर करती है I खेतो में सीधे बीज को डालकर अथवा नर्सरी में तैयार  पौधों को पुन: खेतो में रोपाई की जाती है Iबीजो के प्रस्फुटन के समय खेतो की मिट्टी में उचित नमी होनी चाहिए अन्यथा बीजों के विकास बाधित हो जाएगा I जब हम पौधों को नर्सरी से लाकर खेतो में लगाते है उससमय खेतों में पानी का जमाव होना चाहिए जिससे...