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Organic farming

ट्राइकोडर्मा: टिकाऊ कृषि के लिए पर्यावरण के अनुकूल कवक The novel technologies in all areas of agriculture have improved agricultural production, but some modern practices affect the environment. The recent challenge faced by advanced farming is to achieve higher yields in environment-friendly manner. Thus, there is an immediate need to find eco-friendly solutions such as wider application of biocontrol agents. Among various types of species being used as biocontrol agents, including fungi and bacteria, fungal genus Trichoderma produces different kinds of enzymes which play a major role in biocontrol activity like degradation of cell wall, tolerance to biotic or abiotic stresses, hyphal growth etc. Many research has proved that the bio agents bring the disease suppression with no environmental hazards. Fungi in genus Trichoderma sp. have been known since 1920s for their capability to function as biocontrol agents (BCA) against plant pathogens. Trichoderma fungus are known not only for the control of plant disease but also for their capability to enhance plant growth and development, elevated reproductive ability, capacity to modify the rhizosphere. Trichoderma is capable to grow under adverse conditions, competence in the use of nutrients, strong aggressiveness against phytopathogenic fungi and efficacy in supporting plant growth and enhanced defense mechanisms. Trichoderma can work as biocontrol agents in several ways :- It may grow faster...

चारा फसलों पर जैव उर्वरक का उपयोग पिछले ५० सालो में कृषि क्षेत्र में फसलों के लिए रासायनिक उर्वरको का अधिक उपयोग किया गया है जिसके प्रभाव से मिटटी की उपजाऊ क्षमता में कमी, पौधों में पोषक तत्वों की ज्यादा मात्रा, पौधों में रोग तथा किटो का आना , फलिय पौधों में नोडूलेसन की कमी, मिटटी के जीवाणुओं में कमी और प्रदुषण हुआ है| जिसके कारण किसानो को बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है | फसल की उत्पादकता कम हो गई है जिससे कि‍सानों की आमदनी कम हो गयी| ऐसी स्थिति में किसानो ने रासायनिक उर्वरक के बदले जैव उर्वरक का प्रयोग करना शुरू किया जो उनकी आशाओं पर खड़े उतरे है | जैविक उर्वरक के उपयोग के कारण रासायनिक उर्वरको के हानिकारक प्रभाव में कमी आई है तथा पर्यावरण में प्रदुषण भी कम हुआ है| किसान आज जैव उर्वरक का प्रयोग चारे की फसलों में भी करने लगे है जिससे किसानो को अधिक लाभ हुआ है| सण1895 में सबसे पहली जैव उर्वरक “नाइट्रैगिन’ की खोज हुई जिसे नोबे और हेल्टनर नामक वैज्ञानिकों ने खोजा था | इसके बाद एजोटोबैक्टर की खोज और फिर नीली-हरी शैवाल और अन्य तरह के जैव उर्वरक की खोज हुई |भारत में सबसे पहले जैव उर्वरकों पर अध्यन डॉ. डी.एन. जोशी ने किया था |जैव उर्वरकों का...

जैविक खेती की वि‍भि‍न्‍न क्रि‍याऐं कृषि‍ उत्‍पादों की लगातार बढती जरूरत को पूरा करने के लि‍ए व उत्पादन बढ़ााने के लिए कि‍सान रासायनिक उर्वको का प्रयोग करते है ।  निरंतर रसायनो का उपयोग मानव एवं मृदा के स्वास्थ्य पर बहुत गलत तरीके से असर कर रहा हे।मृदा में क्षारीयता, कार्बनिक तत्वों का प्रमाण कम होना, मृदा, पर्यावरण, जल एवम वायु प्रदूषण जैसे अनिछनीय बदलाव मे रासायनिक उर्वको का भी योगदान है। रासायनिक उर्वको खेती का खर्च बढ़ा देते हे, इसी लिए किसानो की महेनत का ज्यादा लाभ नहीं मिल पाता। एसी स्थिति मे जैविक खेति एक मात्रा विकल्प हे जो मृदा, मानव को स्वस्थ रखती है, एवं किसानोंको मुनाफा भी देती है। जैविक खेती की व्याख्या: कृषि‍ की पद्धति जिसमे रासायनिक उर्वको, किट नाशको तथा खरपतवार नासियो की जगह गोबर, कम्पोस्ट की खाद्य, बेक्टेरिया कल्चर , हरी खाद्य, जैविक कीटनाशीी, जैविक पाक, फसल अवशेषों आदि का उपयोग किया जाता है, उसका मुख्य मकसद मृदा की उर्वरता एवं भूमि की उत्पादक लम्बे समय तक अच्छी और टिकाव बानी रहे, एवम कम खर्च में ज़्यादा उत्पादन प्राप्त हो बिना किसी पर्यावरण और मृदा को हानि पहुचाए । जैविक कृषि की वि‍भि‍‍‍‍न्‍ न क्रि‍याऐं इस प्रकार है। भूमि उपचार: बोवाई पूर्व आखिरी जुताई से पहले ट्राइकोडर्मा को भूमि में मिलाइए। ट्राइकोडर्मा एक जैविक फुग है। २।५ किलो ट्राइकोडर्मा पावडर...

जैविक खेती के लिए पंचगव्य बनाने की वि‍धि‍। In India the “Green Revolution” pesticides and chemicals were introduced and pushed through all the publicity media and scientific institutions.  It increased the agricultural productivity but as the years passed on, the soil got contaminated due to chemical residues. After realising the ill impacts of overuse of chemicals, once again farmers started to go back to what they knew best – organic farming. Tiny steps were taken to replace chemical fertilizers, pesticides and fungicides, with organic manure. But nothing was available to replace growth promoting hormones and immunity boosters, and to bring sustained higher productivity. So farmers, and some scientists, started experimenting with medicines mentioned in the Vrikshayurveda, and panchgavya was the result. The description of cow being the abode of all Gods and the medium of achieving Dharma, Artha, Kama and Moksha is found in many ancient Indian texts. In Vedic Literature, Prithvi is the synonym of Gau (Cow). In ancient times, a man’s abundance was judged by the number of cows he possessed. History gives evidence that the Indians were in the peak of health when the cow was respected. There was commercialization of cow products in ancient times. Milk and grains were given free of cost. Milk was offered instead of water. Rightly said, streams of...

जैविक खेती में नाशीजीव प्रबंधन के सुरक्षित उपाय  कृषि के व्यापारिकरण का हमारे वातावरण पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है । कृषि मे नाशीजीवों के प्रबन्धन हेतु उपयोग किए जाने वाले रसायन हमारे वातावरण, मिट्टी, पानी, हवा, जानवरों, यहाँ तक की हमारे शरीर में भी एकत्रित होते जा रहे है । रासायनिक उर्वरकों का कृषि उत्पादकता पर क्षणिक प्रभाव पड़ता है जबकि हमारे पर्यावरण पर अधिक समय तक नकारात्मक प्रभाव बना रहता है जहाँ वे रीसाव एवं बहाव के द्वारा भूमिगत जल तथा अन्य जल संरचनों को प्रदूषित करते हैं । ये सभी प्रदूषण मानव स्वास्थ्य के साथ ही साथ पर्यावरणीय सन्तुलन पर प्रतिकूल प्रभाव डालते है । उपरोक्त समस्याओं की रोकथाम के लिए विशेषकर सब्जी उत्पादन में जैविक नाशीजीव प्रबन्धन पर विवरण प्रस्तुत है ।   सामान्य सिद्धान्त जैविक कृषि प्रणाली में नशीजीवों जैसे: कीट व्याधि एवं खरपतवारों से होने वाली क्षति को कम से कम रखना सुनिश्चित किया जाना चाहिए । जिसके लिए संतुलित पोशाक तत्व प्रबन्धन, वातावरण के अनुरूप फसलों की उन्नतशील प्रजाति, उच्च जैविक सक्रियता युक्त उर्वर मृदा, अंगीकृत फसल चक्र, सह:फसल, हरी खाद इत्यादि विंदुओं पर विशेष ध्यान आकर्षित करने की आवस्यकता है । साथ ही साथ फसल की वृद्धि एवं विकास प्राकृत के अनुरूप होनी चाहिए । संस्तुतियाँ नशीजीवों की रोकथाम के लिए ऐसी पारम्परिक तकनीकों का उपयोग किया जाना चाहिए...

जैविक खेती के लिए अपशिष्ट अपधटक एक वरदान  सूक्ष्मजीव सेल्लुलोज खाकर बढ़ते हैं और फिर पोषक तत्व छोड़ते हैं जो जमीन के लिए उपयोगी हैं। ज्यादा रासायनिक उर्वरक डालने से पीएच बढ़ता जाता है और कार्बन तत्व कम होते जाते हैं, बाद में ऐसी जमीन उर्वरक डालने पर भी उत्पादन नहीं दे पाती है। खेती के लि‍ए जमीन मे जीवाश्‍म होना आवश्‍यक है यदि जमीन में जीवाश्वम नहीं होंगे तो लम्बे समय तक वहा फसल उत्पादन नहीं हो सकता। इसलिए खेत में गोबर, फसल अवशेष आदि डालने चाहि‍ए।जिनके अपगठन के द्वारा वेस्ट डीकम्पोजर जमीन में पड़े उर्वरकों के पोषक तत्व को घोलकर पौधे को उपलब्‍ध करवाते हैं। कचरा अपघटक या वेस्ट डीकम्पोजर यह उत्पाद देशी गाय के गोबर से बनाया जाता है। इसमें सूक्ष्म जीवाणु हैं, जो फसल अवशेष, गोबर, जैव कचरे को खाते हैं और तेजी से बढ़ोतरी करते हैं। जिससे जहां ये डाले जाते हैं वहां एक श्रृंखला तैयार हो जाती है, जो कुछ ही दिनों में गोबर और कचरे को सड़ाकर खाद बना देती है। अपघटक को जब जमीन में डालते हैं, तो यह मिट्टी में मौजूद हानिकारक, बीमारी फैलाने वाले कीटाणुओं की संख्या को नियंत्रित करता है। वेस्ट डीकम्पोजर की विशेषताएं हर मौसम में प्रत्येक फसल हेतु उपयोगी लम्बी जीवन अवधि (3 वर्ष) बहुत सस्ता बनाने में सरल अति विश्वनीय सभी फसलों हेतु बहुत प्रभावी बनाने की विधि एक...

केंचुआ खाद, जैविक कृषि के लिए एक जरूरी सामग्री  वर्तमान परिदृश्य में अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी में जीवांश कार्बन का स्तर लगातार कम हो रहा है, तथा कृषि रसायनों के अंधाधुंध उपयोग से मृदा जीव भी नष्ट होते जा रहे हैं। अतः भविष्य में मृदा उर्वरता को संरक्षित रखनेे तथा इसकी निरन्तरता को बनाये रखने के लिए जीवांश खाद उपयोग को बढ़ावा देने की नितान्त आवश्यकता है। जीवांश खादों में वर्मीकम्पोस्ट (केंचुआ खाद) का विशिष्ट स्थान है, क्योंकि इसे तैयार करने की विधि सरल एवं गुणवत्ता काफी अच्छी होती है। केंचुआ खाद जैविक कृषि के लिए एक प्राचीन एवं उत्तम जैविक खाद है। पूरे विश्व में केंचुए की लगभग 3000 प्रजातियाँ पायी जाती है। इनमें से भारत में लगभग 509 प्रजातियाँ उपलब्ध है। केंचुआ खाद क्या है ? - केंचुओं द्वारा निगला हुआ गोबर, घास-फूस, कचरा आदि कार्बनिक पदार्थ इनके पाचन तंत्र से पिसी हुई अवस्था में बाहर आता है, उसे ही केंचुआ खाद कहते हैं। केंचुआ खाद जल घुलनशील पोषक तत्वों से युक्त होता है। यह पोषक तत्व से भरपूर जैविक खाद और मृदा अनुकूलक है जो पौधों के द्वारा अपेक्षाकृत आसानी से अवशोषित किए जाते है। चूंकि केंचुए साधारण रूप में खनिजों को पीस कर समान रूप से मिश्रित करते हैं, पौधों को उन्हें प्राप्त करने के लिए न्यूनतम प्रयास...

आलू की जैविक खेती की वि‍धि‍  आलू अपने अंदर बिभिन्न प्रकार का विटामिन्स, मिनिरल्स एवं एंटी ओक्सिडेंट को समाये हुए एक संपूर्ण आहार है| आलू की फसल हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब और बिहार आदि राज्यों की आर्थिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखती है, क्योंकि यहां की जलवायु आलू उत्पादन के लिए अनुकूल है। आलू की अनुमोदित किस्में कुफरी-चंद्रमुखी, कुफरी-ज्योत, कुफरी-अशोका, कुफरी-पुखराज, कुफरी-लालिमा, कुफरी-अरुण, कुफरी-चिप्सोना, राजेंद्र आलू आदि प्रमुख किस्में है| आलू की फसल के लि‍ए भूमि  आलू की फसल के लिए अच्छे निकास वाली, उपजाऊ दोमट मिट्टी सबसे उत्तम है। यद्यपि अच्छे प्रबंध द्वारा इसे विभिन्न प्रकार की भूमियों में भी उगाया जा सकता है। इस फसल के लिए मिट्टी का पी एच मान 6-7.5 तक उपर्युक्त होता है| एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और 2-3 जुताईयां देसी हल से करनी चाहिए ताकि आलू की फसल के लिए अच्छे खेत बन सके। खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। खेत समतल होना चाहिए ताकि जल निकासी सही हो सके। आलू की फसल में खाद एवं उर्बरक आलू की फसल के लिए 20-25 टन सड़ी हुई गोबर कि खाद का प्रयोग करें| 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर कि दर से ट्राईकोडर्मा गोबर कि खाद में मिला कर खेत में प्रयोग करें| खड़ी  फसल में मिट्टी चढाने के समय वर्मी कम्पोस्ट डालने से फसल एवं उपज अच्छी प्राप्त होती है| बीज की तैयारी बिजाई के लिए अच्छे...