30 Sep आम की रंगीन किस्मों के माध्यम से आर्थिक समृद्धि एवं पोषण सुरक्षा
आम भारत का अत्यंत प्राचीन एवं लोकप्रिय फल है। आम को अपने विशेष स्वाद, सुगंध एवं पौष्टिक गुणों के कारण फलों में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। इसी कारण इसे “फलों का राजा” कहा जाता है। भारत में आम की खेती का इतिहास लगभग 4000 वर्ष पुराना माना जाता है। भारतीय संस्कृति, साहित्य, धर्म एवं परंपराओं में आम का विशेष महत्व रहा है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों, वेदों एवं पुराणों में आम का उल्लेख मिलता है। ऐसा माना जाता है कि आम का मूल उद्गम भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र है। प्राचीन काल में आम के वृक्ष प्राकृतिक रूप से जंगलों में पाए जाते थे, बाद में इसकी व्यवस्थित खेती प्रारंभ हुई। मौर्यकाल में आम के बाग लगाने की परम्परा विकसित हुई। कहा जाता है कि सम्राट अशोक ने सड़कों के किनारे आम के वृक्ष लगवाए थे। मध्यकाल में मुगल शासकों ने आम की खेती एवं नई किस्मों के विकास को बढ़ावा दिया। समय के साथ भारत में आम की दशहरी, लंगड़ा, अल्फांसो एवं केसर जैसी अनेक प्रसिद्ध किस्में विकसित हुईं। ब्रिटिश काल में आम की वैज्ञानिक खेती, कलम विधि एवं बाग प्रबंधन तकनीकों का विकास हुआ। स्वतंत्रता के बाद कृषि विश्वविद्यालयों एवं अनुसंधान संस्थानों ने उन्नत किस्मों और आधुनिक उत्पादन तकनीकों पर कार्य किया। परिणामस्वरूप आम्रपाली एवं मल्लिका जैसी संकर किस्में विकसित की गईं। आज भारत विश्व का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है। भारत में लगभग 2300 हजार हैक्टर क्षेत्र में आम की खेती की जाती है, जिससे लगभग 21000 हजार मीट्रिक टन उत्पादन प्राप्त होता है। विश्व के कुल आम उत्पादन का लगभग 50 प्रतिशत भाग भारत में उत्पादित होता है। भारत में उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना तथा पश्चिम बंगाल प्रमुख आम उत्पादक राज्य हैं। भारत ताजे आमों एवं आम से बने प्रसंस्कृत उत्पादों का विश्व के प्रमुख निर्यातक देशों में भी शामिल है। भारतीय आम की मांग देश के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भी तेजी से बढ़ रही है। इस प्रकार, आम की खेती भारतीय कृषि, संस्कृति एवं अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग रही है और भविष्य में भी इसकी महत्ता बनी रहेगी।
आम पोषण और औषधीय गुणों से भरपूर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फल है। इसमें आहार रेशा, विटामिन (ए एवं सी), खनिज तत्व तथा कार्बोहाइड्रेट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करने के साथ-साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूती प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त आम में पाए जाने वाले जैव सक्रिय यौगिक जैसे बीटा-कैरोटीन, मैंगिफेरिन, लुपिओल एवं विभिन्न फ्लेवोनॉयड्स एंटीऑक्सीडेंट के रूप में कार्य करते हैं, जो हमारे शरीर को कई प्रकार की बीमारियों एवं कोशिकीय क्षति से बचाने में सहायक होते हैं। आम का उपयोग केवल ताजे फल के रूप में ही नहीं किया जाता, बल्कि विभिन्न प्रकार के प्रसंस्कृत उत्पादों के निर्माण में भी व्यापक रूप से किया जाता है। इससे जूस, शेक, आइसक्रीम, केक, अचार, जैम, आमचूर, चटनी तथा सब्जी जैसे अनेक स्वादिष्ट एवं पौष्टिक उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इन उत्पादों के माध्यम से आम का मूल्य संवर्धन होता है, जिससे किसानों एवं उद्योगों को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। फल प्रसंस्करण उद्योग में आम का विशेष स्थान है, क्योंकि यह कच्चे एवं पके दोनों रूपों में उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों के निर्माण के लिए उपयुक्त कच्चा माल प्रदान करता है। इस प्रकार आम एक पौष्टिक फल होने के साथ-साथ कृषि आधारित उद्योगों एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भारत में आम की अनेक प्रचलित एवं लोकप्रिय किस्में जैसे दशहरी, लंगड़ा, चैसा, फजली, बॉम्बेग्रीन, सफेदा, अल्फांसो, बैंगनपल्ली, तोतापरी, हिमसागर, केसर, पेयरी, किशनभोग, मालदा, मलगोवा, नीलम, मल्लिका, आम्रपाली, रत्ना, जरदालू, गुजरात आम-1 (आनंद रसराज), अर्का उदय, अर्का सुप्रभात, राजापुरी, जमादार आदि उगाई जाती हैं। यह सभी किस्में हरे या पीले रंग के आकर्षक फल प्रदान करती हैं। इनके अतिरिक्त पारंपरिक लाल रंग वाली किस्में जैसे हुसनारा, सिंधुरी, वनराज, सुरखा, जनार्दन-पसंद, याकुती, सुवर्णरेखा (लाल सुंदरी), गुलाब खास, जाफरान एवं लाल मलगोवा आदि शामिल हैं। विदेशी लाल किस्मों में टॉमी एटकिंस, सेंसेशन, ओस्टीन, एल्डन एवं लिली प्रमुख हैं। यद्यपि विदेशी किस्में अपेक्षाकृत कम मिठास वाली होती हैं, फिर भी इनकी भंडारण क्षमता अधिक होने के कारण निर्यात एवं लम्बी दूरी के बाजारों के लिए उपयुक्त होती हैं।
जलवायु एवं भूमि
आम की खेती मुख्यतः उष्ण एवं समशीतोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में की जा सकती है। आम के बाग व्यावसायिक रूप से लगभग 600 मीटर की ऊँचाई तक सफलतापूर्वक लगाए जा सकते हैं। आम के लिए 23.8-26.6 डिग्री सेल्सियस तापमान सर्वोत्तम माना जाता है, जो इसके अच्छे पुष्पन, फलन एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन में सहायक होता है। आम की खेती प्रत्येक प्रकार की भूमि में की जा सकती है। परन्तु अधिक बलुई, पथरीली, क्षारीय तथा जल भराव वाली भूमि में इसे उगाना लाभकारी नही माना जाता है। इसकी व्यावसायिक खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट मिट्टी सर्वोत्तम मानी जाती है।
आम की रंगीन किस्में
गत वर्षों के दौरान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के विभिन्न संस्थानों तथा कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा आम की पारंपरिक एवं विदेशी लाल किस्मों के संकरण के माध्यम से रंगीन एवं उन्नत किस्मों को विकसित किया गया है। इन अनुसंधानों का मुख्य उद्देश्य ऐसी किस्में विकसित करना है जो उच्च उत्पादन क्षमता, बेहतर गुणवत्ता, आकर्षक रंग, शीघ्र फलन एवं विविध उपयोगों के लिए उपयुक्त हों और किसानों की आय में वृद्धि एवं बाजार की मांग की पूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
इन प्रयासों के परिणामस्वरूप विकसित प्रमुख उन्नत किस्मों में अंबिका, अरुणिका, पूसा दीपशिखा, पूसा अरुणिमा, पूसा प्रतिभा, पूसा सूर्या, पूसा श्रेष्ठ, पूसा लालिमा, अर्का अरुणा, अर्का नीलकिरण, अर्का अनमोल, अर्का पुनीत तथा अर्का नीलाचल केसरी जैसी किस्में शामिल हैं।
इन किस्मों की विशेषता यह है कि यह सभी किस्में पारंपरिक आम की तुलना में अधिक नियमित एवं शीघ्र फल देने वाली होती हैं, जिससे किसानों को शीघ्र एवं स्थिर आय प्राप्त होने में मदद मिलती है। इन उन्नत किस्मों का वृक्ष आकार अपेक्षाकृत छोटा और नियंत्रित होता है, जिसके कारण इन्हें सघन बागवानी प्रणाली में भी आसानी से लगाया जा सकता है। इन किस्मों के प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक पौधे लगाए जा सकते हैं, जिससे उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि तथा भूमि का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।

चित्र 1: रंगीन आम का बाग (स्रोतः गुगल)
उच्च उत्पादन क्षमता, उत्तम गुणवत्ता, आकर्षक रंग, शीघ्र फलन तथा ताजे उपभोग एवं प्रसंस्करण उद्योग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए भारत में विकसित की गई आम की प्रमुख रंगीन किस्मों की विस्तृत जानकारी निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत की गई है।
पूसा दीपशिखा
भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा विकसित की गई आम की इस किस्म के पौधे नियमित फल देने वाले, अर्ध-बौने आकार के होते हैं। अधिकतर फल एक समान आकार वाले, लम्बे, आकर्षक, चमकदार लाल छिलके एवं नारंगी-पीले गूदे वाले होते हैं। फल मध्यम मिठास (18.67% टीएसएस) व 70 फीसदी गूदे वाले होते हैं। पकने के बाद फलों को सामान्य तापक्रम पर 7-8 दिन तक रखा जा सकता है। पौधे मध्यम एवं सघन बागवानी (6×6 मीटर) के लिए उपयुक्त होते हैं। इस किस्म की अनुमानित उपज लगभग 14.30 टन प्रति हैक्टर है।

चित्र 2: पूसा दीपशिखा (स्रोतः हबीब फार्मिंग)
पूसा अरुणिमा
भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा विकसित आम की यह किस्म देरी से पकने वाली तथा इसके पेड़ मध्यम ओजस्वी होते हैं। पौधों को 6 × 6 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है। इसके फल लगभग 250 ग्राम वजन के तथा गहरे लाल रंग के होते हैं। फलों में मध्यम मिठास (लगभग 19.50% टीएसएस) पाई जाती है। पकने के बाद फलों को सामान्य तापमान पर 10-12 दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है। उत्तर भारत में इस किस्म के फल जुलाई के अंतिम सप्ताह में पकना प्रारंभ कर देते हैं।
पूसा लालिमा
भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2012 में विकसित आम की यह किस्म देखने में बहुत ही खुबसूरत होती है। फलों के पकने के बाद यह खूबसूरती कई गुना बढ़ जाती है। इस किस्म के छिलके इतने पतले होते है कि कुछ लोग छिलका सहित ही खा लेते हैं। इसके पौधे मध्यम आकार के होने के कारण सघन बागवानी के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। पौधों को 6 × 6 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है। यह एक शीघ्र पकने वाली तथा नियमित फल देने वाली किस्म है। इसके फल मध्यम आकार के लाल रंग के बहुत ही आकर्षक होते हैं। इसमें गूदे की मात्रा 70.1 प्रतिशत तक होती है। इस किस्म के आम जून के प्रथम पखवाड़े में पकने प्रारंभ हो जाते हैं। पकने के बाद फलों को सामान्य तापमान पर 5-6 दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इसकी औसत उपज 14.00 टन प्रति हैक्टर है।
पूसा प्रतिभा
भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2012 में विकसित आम की यह किस्म देखने में बहुत ही सुन्दर होती है। फल पकने के बाद सुनहरी पीली सतह पर आकर्षक लाल आभा वाले होते हैं। इसके फलों में अच्छी सुगंध, मीठा स्वाद (19.5% टीएसएस), नारंगी एवं रेशा रहित गूदा होता है। इसके पौधे मध्यम आकार के होने के कारण सघन बागवानी के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। पौधों को 6 × 6 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है। यह नियमित फल देने वाली तथा उच्च उत्पादन वाली किस्म है। इस किस्म के आम जुलाई के प्रथम सप्ताह में पकने प्रारंभ हो जाते हैं। पकने के बाद फलों को सामान्य तापमान पर 6-7 दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इसकी औसत उपज 14.00 टन प्रति हैक्टर है।
पूसा श्रेष्ठ
भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2012 में विकसित आम की यह किस्म अपने आकर्षक लाल रंग, मध्यम आकार (औसत 228 ग्राम) और बेहतरीन स्वाद (20.33% टीएसएस) के लिए जानी जाती है। इसके फलों का आकार आयताकार-अंडाकार, छिलका सुनहरा पीला तथा लाल रंग की झलक दिखाई देती है। इसका गूदा नारंगी रंग का, उच्च गूदा सामग्री (लगभग 71.88%) वाला तथा रेशा रहित होता है। इसे घरेलू एवं निर्यात दोनों के लिए उपयुक्त माना जाता है। इसके पौधे मध्यम आकार के होने के कारण सघन बागवानी के लिए उपयुक्त, नियमित फल देने वाले होते हैं। पौधों को 6 × 6 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है। इस किस्म के आम जुलाई के प्रथम सप्ताह में पकने प्रारंभ हो जाते हैं। पकने के बाद फलों को सामान्य तापमान पर 7-8 दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है। यह किस्म किसानों के लिए प्रति पीस बिक्री के लिहाज से बहुत ही लाभदायक मानी जाती है। इसकी औसत उपज 14.00 टन प्रति हैक्टर है।
पूसा मनोहरी
यह अम्रपाली और लाल सुंदरी के संकरण से प्राप्त एक अनोखी संकर किस्म भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2021 में विकसित की गई है। यह किस्म नियमित फल देने की क्षमता रखती है। इसके लम्बें, आयताकार तथा एक समान फलों पर हल्की लालिमा दिखाई देती है। फल का गूदा पीले-नारंगी रंग का तथा प्रति फल का औसत वजन 223.4 ग्राम और गूदे की मात्रा 68.76 प्रतिशत होती है। इसके फलों में मध्यम मिठास, मनमोहक सुगंध और शर्करा व अम्ल का अच्छा संतुलन होता है। फल आहार रेशा रहित होते हैं। यह खाने और प्रसंस्करण के उद्देश्य से अति उपयुक्त हैं। इसके पेड़ मध्यम रूप से ओजस्वी होते हैं। पौधों को 6 × 6 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है। इस किस्म के पौधों में मालफॉर्मेशन रोग के प्रति अच्छी सहनशीलता होती है। इसकी औसत उपज 16.1 टन प्रति हैक्टर है।
पूसा सूर्या
भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा विकसित आम की यह किस्म वर्ष 2002 में “एल्डन” किस्म से चयनित की गई थी। इसके फल बड़े आकार (औसत वजन 270 ग्राम) के आकर्षक व सुनहरे पीले रंग के बेहतरीन स्वाद (19.5% टीएसएस) वाले होते हैं। इसका गूदा नारंगी रंग का, उच्च गूदा सामग्री (लगभग 70.00%) तथा रेशा रहित होता है। पौधों को 6 × 6 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है। इस किस्म के फल जुलाई के तीसरे सप्ताह में पकने प्रारंभ हो जाते हैं। पकने के बाद फलों को सामान्य तापमान पर 8-10 दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है। यह किस्म घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों बाजारों के लिए उपयुक्त है। इसकी औसत उपज लगभग 15.00 टन प्रति हैक्टर है।

चित्र 4: पूसा सूर्या
अर्का अरुणा
भाकृअनुप-भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा विकसित यह आम की एक बौनी किस्म है, जो हर वर्ष फल देती है। इसके लाल रंग के फल मीठे (लगभग 20% टीएसएस), रेशे तथा स्पंजी ऊतक से मुक्त होते हैं। फलों का औसत वजन 400-500 ग्राम होता है। इसका गूदा हल्के पीले रंग का होता है तथा गूदे की रिकवरी लगभग 80 प्रतिशत होती है। इसके पौधों को 5 × 5 मीटर के रोपण के लिए तथा गृह वाटिका में लगाने के लिए उपयुक्त माना जाता है। यह एक नियमित फल देने वाली, उच्च उपज तथा देरी से पकने वाली किस्म है। इसकी औसत उपज लगभग 16.00 टन प्रति हैक्टर प्राप्त की जा सकती है।
अर्का अनमोल
आम की यह किस्म भाकृअनुप-भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा विकसित की गई है, जिसे अल्फांसो और जनार्दन-पसंद किस्मों के संकरण से तैयार किया गया है। इसके फल मध्यम आकार के लम्बे, सुनहरे पीले रंग के होते हैं। इन फलों में मध्यम मिठास (लगभग 19% टीएसएस) तथा प्रति फल वजन लगभग 300-330 ग्राम तक होता है। यह किस्म नियमित फल देने वाली है और सघन बागवानी के लिए उपयुक्त है। इसकी औसत उपज लगभग 18.00 टन प्रति हैक्टर है।
अर्का नीलकिरण
भाकृअनुप-भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा विकसित की गई आम की किस्म अर्का नीलकिरण एक उत्कृष्ट संकर किस्म है। यह किस्म अल्फांसो और नीलम के संकरण से विकसित की गई है। इसके फल पकने पर आकर्षक सुनहरे पीले रंग के हो जाते हैं, जिन पर अक्सर हल्की लाल आभा भी दिखाई देती है। इसका गूदा गहरा पीला, रेशा रहित होता है। इसके फल मध्यम आकार (औसतन 270-280 ग्राम) के वजनदार होते हैं। यह एक नियमित फल देने वाली तथा देरी से पकने किस्म है। यह किस्म अपने बेहतरीन स्वाद, सुगंध और अच्छी भंडारण क्षमता के लिए जानी जाती है।
अर्का पुनीत
आम की इस उत्कृष्ट किस्म को भाकृअनुप-भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा अल्फांसो एवं बैंगनपल्ली किस्मों के संकरण से विकसित किया गया है। यह किस्म प्रति वर्ष नियमित रूप से फल देने की क्षमता रखती है। इसके अंडाकार फलों का रंग पकने पर पीले रंग के हो जाते हैं जिन पर लाल आभा भी झलकती है। फलों का गूदा ठोस, नारंगी रंग का तथा स्पंजी ऊतक से पूर्णतः मुक्त होता है। यह किस्म आकर्षक, रेशा रहित एवं मीठे (21% टीएसएस) फलों के लिए प्रसिद्व है। इसके गूदे की रिकवरी 65-70 प्रतिशत तक होती है। तथा भंडारण क्षमता भी अच्छी होती है।
अर्का नीलाचल केसरी
भाकृअनुप-भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा विकसित आम की यह अगेती किस्म देश के पूर्वी तटीय क्षेत्रों में व्यावसायिक खेती हेतु विकसित की गई है। इस किस्म का चयन ‘गुलाबखास’ किस्म से किया गया है। इसके फल अंडाकार आकार (200-250 ग्राम) के तथा पकने पर सुनहरे पीले लाल आभा लिए होते हैं। फल अत्यंत मीठे (21.0% टीएसएस) तथा फलों में लगभग 50 प्रतिशत गूदा होता है। इसकी औसत उपज 70 -110 किलोग्राम प्रति वृक्ष होती है।
अरुणिका
भाकृअनुप-केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ द्वारा विकसित यह आम की किस्म ‘आम्रपाली’ एवं ‘वनराज’ किस्मों के संकरण से तैयार की गई है। प्रति वर्ष फल देने वाली इस किस्म के फल मध्यम आकार (190-210 ग्राम) के तथा आकर्षक लाल रंग के होते हैं। इसके फलों का गूदा नारंगी पीले रंग का तथा अत्यंत मीठा (24.6% टीएसएस) होता है। पौधे की वृद्धि अपेक्षाकृत कम होने के कारण गृह वाटिका व सघन बागवानी हेतु उपयुक्त मानी जाती है। रोपण के लगभग 10 वर्ष बाद प्रति वृक्ष लगभग 70 किलोग्राम उपज प्राप्त हो जाती है।
अम्बिका
भाकृअनुप-केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ द्वारा विकसित आम की यह किस्म ‘आम्रपाली’ एवं ‘जनार्दन पसंद’ के संकरण से तैयार की गई है। यह नियमित फल देने वाली तथा देरी से पकने वाली किस्म है। इसके फल लम्बाकार तथा वजन लगभग 300-350 ग्राम होता है। फल आकर्षक लालिमा लिए हुए होते हैं। फलों का गूदा गहरा पीला, ठोस, कम रेशेदार तथा उत्तम गुणवत्ता वाला होता है। इस किस्म के फलों की भंडारण क्षमता भी अच्छी होती है। फलों में मिठास लगभग 21.0% टीएसएस पाई जाती है। रोपण के लगभग 10 वर्ष बाद प्रति वृक्ष लगभग 80 किलोग्राम उपज प्राप्त हो जाती है।
अवध समृद्धि
भाकृअनुप-केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ द्वारा विकसित आम की इस किस्म को ‘आम्रपाली’ एवं ‘वनराज’ किस्मों के संकरण से विकसित किया गया है। यह नियमित रूप से फल देने वाली किस्म है। इसके फलों का छिलका लाल आभायुक्त पीले रंग का होता है। फलों का औसत वजन लगभग 300-350 ग्राम होता है। फलों की भंडारण क्षमता अच्छी होती है। इसके पेड़ मध्यम फैलाव वाले होते हैं, इसलिए यह प्रजाति सघन बागवानी के लिए उपयुक्त मानी जाती है। इसके 15 वर्ष पुराने पेड़ों की ऊँचाई लगभग 15-20 फीट होने के कारण प्रबंधन कार्य आसानी से किया जा सकता है। इसके फल जुलाई-अगस्त माह में पक जाते हैं। रोपण के लगभग 10 वर्ष बाद प्रति वृक्ष 85-90 किलोग्राम तक उपज प्राप्त हो जाती है।
अवध अभय
भाकृअनुप-केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ द्वारा आम की इस किस्म को नीलम व टोमी एटकिन्स किस्मों के संकरण से विकसित किया गया है। यह देरी से पकने वाली तथा प्रति वर्ष नियमित फल देने वाली उत्कृष्ट किस्म है। इसके फल मध्यम आकार (300-400 ग्राम) के तथा छिलका आकर्षक लाल आभायुक्त हल्के पीले रंग का होता है। इसका गूदा स्वाद में अत्यंत मीठा तथा पीले रंग का उच्च गुणवत्तायुक्त होता है। फलों की भंडारण क्षमता (फलों की तुड़ाई के 15 दिनों तक) अच्छी होती है। रोपण के लगभग 10 वर्ष बाद प्रति वृक्ष 85-90 किलोग्राम तक उपज प्राप्त हो जाती है जिससे यह किस्म व्यावसायिक बागवानी के लिए अत्यंत उपयुक्त किस्म मानी जाती है।
निष्कर्ष
रंगीन आम की उन्नत किस्में अपनी आकर्षक बाहरी रंगत, उत्कृष्ट स्वाद, बेहतर भंडारण क्षमता तथा उच्च बाजार मूल्य के कारण वर्तमान समय में बागवानी क्षेत्र में विशेष महत्व प्राप्त कर रही हैं। इन किस्मों के फलों का लाल, गुलाबी अथवा सुनहरे पीले रंग का आकर्षक छिलका उपभोक्ताओं को अधिक आकर्षित करता है, जिससे घरेलू एवं निर्यात बाजारों में इनकी मांग निरंतर बढ़ रही है। आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों, उन्नत रोपण सामग्री, संतुलित पोषण प्रबंधन, सूक्ष्म सिंचाई तथा समुचित कीट एवं रोग प्रबंधन को अपनाकर किसान गुणवत्तायुक्त एवं अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। रंगीन आम की बागवानी न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रही है, बल्कि यह बागवानी के व्यावसायिक एवं निर्यातोन्मुख विकास को भी नई दिशा प्रदान कर रही है। अतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं आधुनिक प्रबंधन तकनीकों के समन्वित उपयोग से रंगीन आम की खेती भविष्य में किसानों के लिए लाभकारी एवं टिकाऊ कृषि व्यवसाय के रूप में उभरने अपार संभावनाएँ हैं।
Author
डॉ. सुरेश चन्द राणा1, डॉ. मंगल सिंह2, डॉ. अनुज कुमार3, डॉ. रविन्द्र सिंह शेखावत4, डॉ. मुकेश कुमार सिंह4
1 & 5 भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान क्षेत्रीय स्टेशन, करनाल
2, 3 & 4 भाकृअनुप-भारतीय गेहूँ एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल