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गन्‍ना Tag

गन्ने की उन्नत रोपण विधियाँ Conventional method of planting in sugarcane is very old practice since the inception of sugarcane crop. However, conventional planting leads to higher amount of seed cane for maintaining plant population which is very important for achieving the optimum cane yield. Generally requirement of seed cane is about 50-60 quintal /ha under conventional planting method. This much amount of cane leads to higher cost of cultivation to the cane growers. So, there is a need to find out alternate methods for reducing the cost. Pit Planting: This technique is quite common in Kerala's hilly regions as well as Tillah soil in Assam. Pits are dug along the contours at intervals of 20 to 30 cm, with a row-to-row distance of 75 cm. The bottom of the pits is filled with organic manure. In the triangle's pits, cane setts are arranged and then covered with soil. This technique is excellent for soil conservation and can be utilized in rain-fed agriculture. Skip Furrow Planting: It is common in Orissa. It is hybrid of flat and trench method. In this method trenches are dug 45 cm apart and a gap of 90 cm is left after each two rows of cane. Sablang or Sprouting Method: Plants are sown in fertile soil with wide spacing, shallow planting...

Natural farming is a necessity to maintain soil health and yield of sugarcane For sugarcane production, the field is deeply plowed two to three times, due to which a hard layer (hard pan) is formed on the lower surface of the field, which affects the air circulation, activity of microorganisms, etc. in the soil. In such a situation, if natural ingredients are used for sugarcane production, then the health of the soil will be maintained and the farmer brothers will continue to get bountiful yield. Natural farming is a necessity to maintain soil health and yield of sugarcane गन्ने की फसल में किसानों द्वारा अंधाधुन रसायनिक उर्वरक का इस्तेमाल किया जाता है जिससे मिट्टी की संरचना खराब होती है तथा धीरे-धीरे मिट्टी बंजर होने लगती है। गन्ना उत्पादन के लिए खेत की दो से तीन बार गहरी जुताई की जाती है जिससे खेत की निचली सतह पर कठोर परत (हार्ड पैन) बन जाता है जो कि मिट्टी में हवा संचरण, सूक्ष्मजीवों की क्रियाशीलता इत्यादि को प्रभावित करता है। ऐसी परिस्थिति में यदि गन्ना उत्पादन के लिए प्राकृतिक अवयव का प्रयोग करते हैं तो मिट्टी का स्वास्थ्य बना रहेगा और किसान भाइयों को भरपूर उपज मिलता रहेगा। पारंपरिक जैविक खादों की कमी के संदर्भ में मृदा संरक्षण और स्वास्थ्य पर बढ़ती चिंता के साथ, फसल...

Increase in sugarcane production in Bihar with improved techniques ईख की खेती बिहार के किसानों की अर्थव्‍यवस्‍था का आधारभूत स्‍तम्‍भ है। इस आधुनकि युग में गन्‍ना किसान, गन्‍ना शोध संस्‍थान, चीनी उद्योग व्‍यवस्‍था एवं गन्‍ना विकास विभाग के सामुहिक सक्रिय प्रयास से ही लक्ष्‍य को प्राप्‍त करना संभव है। किसानों के साथ चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति में वृद्धि की काफी प्रबल संभावनाऐं हैं। गन्‍ने का उत्‍पादन प्रति एकड़ कम हो रहा है, आय घट रही है तथा उत्‍पादन लागत बढ़ रहा है। इसका मुख्‍य कारण आधुनकि तकनीक से खेती करने की विस्‍तृत जानकारी का अभाव है। अभी भी गन्‍ने की खेती पुरानी पद्धति से बड़े पैमाने पर किसान बँधुओं द्वारा किया जा रहा है। अत: किसानों को उन्‍नत तकनीकों को अपनाकर खेती करने हेतु बड़े पैमाने पर जागरूक करने की आवश्‍यकता है ताकि प्रति ईकाई उत्‍पादकता में वृद्धि एवं उत्‍पादन लागत में कमी कर किसान एवं चीनी उद्योग की आर्थिक स्थ्तिी मजबुत हो सके एवं आत्‍म निर्भर बन सके। अन्‍य प्रदेशों के तुल्‍ना में बिहार प्रदेश की उत्‍पादकता बहुत कम है। गन्‍ने की उत्‍पादकता कम होने के कई कारण है, जैसे कि अनुशांसित प्रभेदों की खेती ना होना, विभिन्‍न परिस्थितियों के लिए गन्‍ने के उपयुक्‍त प्रभेदों की कमी , रोप हेतु सही विधि तथा उचित समय का अनुसरण ना करना, कीट व्‍याद्यि...

An important initiative to make farmers self–reliant in sugarcane seed production technology ईख की खेती में अधिक उत्पादन के लिए उपयुक्त प्रभेद का चयन महत्वपूर्ण होता है। परंतु प्रभेद अच्छा हो लेकिन उसकी गुणवत्ता अच्छी नहीं हो तो प्रभेद की महत्ता ख़त्म हो जाती है। ईख में चूँकि शुद्ध बीज का प्रयोग व्यवसायिक स्तर पर नहीं होता है इसलिए उसे ईख का बीज न कहकर बीज का ईख कहा जाता है। व्यावसायिक ईख फसल में उपज और चीनी की मात्रा पर अधिक ध्यान दिया जाता है। जबकि ईख बीज में आँखों की स्वस्थता, पौधों में नमी और रिड्यूसिंग सुगर की अधिकता एवं अंकुरण क्षमता पर ध्यान दिया जाता है। साधारणतया अधिकांश जगहों पर ईख की कटाई तथा रोपाई का काम साथ-साथ होता है इसलिए किसान व्यावसायिक ईख को ही रोपने के काम में लाते हैं। सामान्यतः ईख बीज का अंकुरण 30% प्रतिशत से ज्यादा नहीं होता है जिसके चलते उपज में कमी आती है। इसलिए बीज उत्पादन कार्यक्रम चलाया जाता है ताकि लगातार प्रजनक एवं आधार बीज का उत्पादन और आगे गुणन चलता रहे जिससे बीज के चलते उपज में होने वाली कमी को रोका जा सके। इस कार्यक्रम को तीन स्तर पर चलाया जाता है यथा प्रजनक, आधार, एवं प्रमाणित या व्यावसायिक बीज उत्पादन। व्यावसायिक बीज उत्पादन - इन बीजों का उत्पादन प्रमाणित बीजों...

Top Rot Disease of Sugarcane and its control बिहार प्रदेश में चीनी उद्योग कृषि पर ही निर्भर है एवं गन्ना ही चीनी मिलों के लिए कच्चा माल है तथा प्रदेश के लिए प्रमुख नगदी फसल है। जैसा कि हम सब जानते है कि गन्ना एक दिर्घ अवधि वाला फसल है जो खेतों में खड़ी रह कर विभिन्न ऋतुओं से गुजरता है एवं अनेक प्रकार के किट व्याधियों के जीवन चक्र से ग्रसित हो कर गुजरता है, जिसके परिणाम स्वरूप गन्ने की फसल को काफी हद तक हानी पहुँचता है। गन्ना की खेती तना गेंड़ीयों से होती है और लगभग साल भर खेत में खडी रहती है। तना गेड़ियों से उपजाई जाने वाली फसलों पर रोगों के आक्रमण से काफी हद तक क्षती होती है, इसलिए गन्ना बीज चुनाव हेतु थोड़ी सी चुक काफी नुकसानदायक साबित होती है। इसे विभिन्न तापक्रम एवं आर्द्रता से भी गुजरना पड़ता है जिससे कि अनेक रोगों के प्रसार हेतु कभी-न-कभी अनुकुल वातावरण प्राप्त हो जाता है और पौधे विभिन्न प्रकार के रोगों से ग्रसित हो जाते है। किसी-किसी क्षेत्रों में गन्ने के बाद गन्ने की फसल बुआई  की जाती है जिसके फलस्वरूप गन्ने के कटे-छटे अवशेषों से मिट्टी में व्याधिजनों के पलने और फैलने का मार्ग मिल जाता है एवं प्रकृति में व्याधिजनों के नये-नये जातिकाऐं विकसित होते...

Plassey borer of Sugarcane: problem and prevention  गन्ना की फसल अन्य फसलों की अपेक्षा अधिक अवधि (लगभग 10 से 12 माह) होने के कारण इसमे कीटों की समस्या भी अधिक होती है। बिहार में गन्‍ना फसल मे लगभग डेढ दर्जन से भी अधिक कीटों का प्रकोप देखा गया है। इनमें से छिद्रक कीट की समस्या रोपनी से कटाई तक पायी जाती हैं। बिहार में प्लासी छिद्रक (plaasee borer) आर्थिक दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण कीट है। सर्वप्रथम यह कीट पश्‍चि‍म बंगाल के प्लासी नामक जगह में पाया गया। इस जगह के नाम पर ही इसका नामंकरण प्लासी छिद्रक किया गया। यदि समय पर इसकी रोकथाम नहीं की जाती है तो गन्‍ना उत्‍पादन मे अनुमानतः 30 - 40 प्रतिशत की हानि हो सकती है। वर्ष 2007-08 में उपयुक्त वातावरण मिलने पर बिहार के गन्ना उत्पादन क्षेत्रों में इस कीट के द्वारा गन्ना फसल को लगभग 80 प्रतिषत तक क्षति कर एक सुनामी का रुप कर दिया था। इस वर्ष फिर उपयुक्त वातावरण मिलने पर उत्तर बिहार के जिलों में गन्ना की फसल पर क्षति करते देखा जा रहा है, अधिक दिनों तक लगातार भारी वर्षा, फसल के खेत में जल-जमाव की स्थिति एवं उच्च तापमान होने पर इस कीट के आगमन की सम्भावनाएं प्रबल हो जाती है। परपोषी पौधे जैसे मक्का, जनेरा, काँस इत्यादि पास...

Protection of Sugarcane Crop from Fall Armyworm  फाॅल आर्मी वर्म नामक कीटका बिहार में कुछ दिनों से मक्के की फसल पर प्रकोप देखने को मिल रहा है। साथ ही यह भी सम्भावना है कि मक्का फसल की कटाई के बाद भोजन की अनुउपलब्धता में गन्ने की फसल पर इसका प्रकोप हो सकता है। अतः किसान भाईयों (विशेषकर गन्ना उत्पादकों) से  अनुरोध है कि गन्ना फसल की लगातार निगरानी करते रहें जिससे समय रहते आवश्यक कदम उठाया जा सके। सर्वप्रथम यह कीट सन् 2015 में अमेरिका में मक्का, धान एवं गन्ना पर पाया गया था एवंइनके अलावा इस कीट के परपोषी पौधे घास कुल के अन्य सदस्य भी हैं। सन् 2017 के अंत तक इस कीट का प्रसार लगभग 54 अफ्रीकी देशों में हो चुका था। यह कीट टिड्डी की तरह सम्पूर्ण फसल नष्ट करने की क्षमता रखता है। भारत में सर्वप्रथमसन् 2018 में कर्नाटक में मक्का की फसल पर इसका प्रकोप पाया गया था। तत्पश्चात् आँध्रप्रदेश, बिहार, गुजरात में भी इस कीट का प्रकोप देखा गया और फसल की भारी क्षति देखने को मिली। गन्ने की फसल पर इस कीट का प्रकोप सबसे पहले तमिलनाडू में पाया गया। यह कीट एक दिन में 100 किलोमीटर की उड़ान भरने की क्षमता रखता है। फाॅल आर्मी वर्म की पहचान फाॅल आर्मी वर्म कीट के पिल्लू (लार्वा) की पहला...

Integrated Insect Pest Management of Sugarcane गन्नेे में समेकित कीट प्रबंधन की विभिन्न क्रियाआ द्वारा फसल की उत्पादकता एवं गुणवता में वृद्वि करने के लिए किसानों को निम्नलिखित बिन्दुओं खेतों में सुनियोजित ढंग से अपनाने की जररुत है। गन्ना को रोपने से कटनी तक साप्ताहिक निगरानी कर छिद्रक कीट एवं उनके मित्रों के बारे में जानकारी रखना। छिद्रक कीटों को नष्ट करने के लिए उन्हीं तकनीकों को अपनायें जिनसे वातावरण प्रदूषित न हो उर्वरकों तथा रसायनों की संस्तुति मात्रा का उचित समय पर प्रयोग। उपयुक्त प्रजाति तथा कीट मुक्त गन्ना का चयन। खेत की गर्मियों में गहरी जुताई करके खुला छोड़ना तथा खरपतवार मुक्त रखना। गन्ना के कीटों की पहचान, जीवन चक्र, आपात का समय एवं लक्षण की जानकारी के लिए साप्ताहिक अन्तराल पर निरीक्षण। अन्य शस्य क्रियाओं का स-समय प्रयोग। उचित फसल-चक्र अपनाना। समय पर रोपाई, अनुशंसित दूरी एवं उचित समय पर सिंचाई करना। मित्र कीटों (परजीवों/परभक्षी) का संरक्षण और उनकी संख्या को बढ़ाना। खेत में फेरोमोन ट्रेप एवं प्रकाश पास लगाकर नर पतंगों को एकत्रित कर नष्ट करना। जैविक एवं वानस्पतिक कीटनाशों के प्रयोग को प्रोत्साहन। फसल का आर्थिक नुकसान होने की आशंका में मान्यता प्राप्त रसायनों की अनुशंसित मात्रा का प्रयोग। समेकित प्रबन्धन की विधियाँ: 1. किस्म प्रबन्धन - गन्ना की कीट अवरोधी किस्मों का उपयोग समेकित प्रबन्धन हेतु किया जाता है। इस प्रबन्धन में प्रमुख हानिकारक कीटों को सहन करने वाली किस्मों...