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Importance of millets in the context of climate change Coarse grain is called millet in English. Millets are a nutritious food for humans and animals. You can grow millet anywhere. It can be easily grown in dry areas, rainy areas, coastal areas or hilly areas. People around the world should take note of the general benefits of climate-friendly millet production and consumption as this crop is hassle-free to produce and has many health benefits. Importance of millets in the context of climate change मोटे अनाज को अंग्रजी में मिलेट कहते है। मोटे अनाज मानव और जानवरों के लिए एक पौष्टिक आहार है। मिलेट को आप कहीं पर भी उगा सकते है। इसे सूखे क्षेत्र, वर्षा क्षेत्रों, तटीय क्षेत्रों या पहाड़ी क्षेत्रों में आसानी से उगाया जा सकता है। दुनिया भर के लोगों को जलवायु के अनुकूल मोटे अनाज के उत्पादन और खपत के सामान्य फायदों पर घ्यान देना चाहिया क्योंकि इस फसल का उत्पादन बिना किसी परेशानी के होता है और इसके खाने से लोगों को सेहत के मामले में बहुत लाभ होता हैं। संयुक्त राष्ट्र ने 2023 को मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी इत्यादि) का वर्ष घोषित किया है और सभी भागीदारों से कहा हैं कि पोषण और स्वास्थ्य के मामले में मोटे अनाज की खपत से होने वाले फायदों के साथ-साथ...

बानयार्ड मिल्लेट - पोषण सुरक्षा की भविष्य The crop of Sanwa is capable of withstanding difficult conditions and giving high yield. Being a C4 crop, its grain and fodder yield is higher than other cereals. The duration of harvesting of sorghum is 75 to 100 days and the average yield is up to 2200 kg/ha. बानयार्ड मिल्लेट - पोषण सुरक्षा की भविष्य खाद्य सुरक्षा की परिभाषा सन 1970 के हरित क्रांति से ही विकसित होती आई है। खाद्य सुरक्षा का अर्थ शुरुवात मे हर व्यक्ति को अन्न पर्याप्त मात्र और वहनयोग मे मिलना था। परिस्थिति बदली है की खाद्य सुरक्षा अन्न पर्याप्त  मात्रा के साथ साथ  अच्छे गुणवत्ता से मिलना भी है। ऐसे अन्न देश के हर नागरिक पूरे गरिमा के साथ पाने का तरीका ढूंढ निकालना भी ज़रूरी है। भारतीय सरकार लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) के माध्यम से पौषिक खाद्यन्नों को रियायती मूल्य मे व्यापक जनसंख्या को प्रदान करती आई है। इतने महतपूर्ण कदमो के बाद भी देश में थोड़े बहुत जनसंख्या कुपोषण और मोटापा (Obesity) से पीड़ित है। भारत मे एक तिहाई बच्चों की आबादी कुपोषण और एक तिहाई महिला अनीमिया से ग्रस्त हैं। इसके उपरांत देश के 14% महिला और 18% पुरुषों की आबादी मोटापा के वश में है।  इसी के साथ साथ लोगों में डायबिटीज़ की रोग भी तीव्र गति...

Food Security in the Age of Climate Change through Coarse Cereals जलवायु परिवर्तन का भारत जैसे उभरते देशों की खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। यह खाद्य उपलब्धता, खाद्य पहुंच, खाद्य उपयोग और खाद्य प्रणाली स्थिरता को प्रभावित करता है जो खाद्य सुरक्षा के चार आयाम है। वर्तमान स्थिति में विश्व में हर तरफ जलवायु परिवर्तन के कारण मुख्य खाद्य फसलों की उत्पादकता पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। कृषि विशेषज्ञ बारिश की बढ़ती अनियमतता और फसलों के पकाव के समय अत्यधिक तापमान के प्रतिकूल प्रभाव से फसलों को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे है। मोटे अनाज वाली फसलों में अन्य खाद्य फसलों के मुकाबले सूखे और अधिक तापमान को सहन करने की क्षमता होती है। इसी वजह से जलवायु परिवर्तन का सबसे कम प्रकोप मोटे अनाज वाली फसलों में है और इनको आगामी दशकों में मूल भोजन के रूप में देखा जा रहा है। सामान्यतः मोटे अनाज वाली फसलों को सुपरफूड कहा जा सकता है। मोटे अनाज वाली फसलों को अक्सर कम लागत पर उगाया जाता है व इनमे रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग भी काफी कम मात्रा में होता है, जो टिकाऊ खेती का एक बड़ा स्तम्भ है। गेहूं और आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों में ग्लूटेन की मात्रा ज्यादा होती हैं। गेहूं की अधिक खपत...

Nutritious and healthy coarse grains are super food cereals भारत में 60 के दशक के पहले तक कदन्न अनाज की खेती की परम्परा थी। कहा जाता है कि हमारे पूर्वज हजारों वर्षों से कदन्न अनाज का उत्पादन कर रहे हैं। भारतीय हिंदू परंपरा में यजुर्वेद में कदन्न अनाज का जिक्र मिलता है। 50 साल पहले तक मध्य और दक्षिण भारत के साथ पहाड़ी क्षेत्रों में मोटे अनाज की खूब पैदावार होती थी। एक अनुमान के मुताबिक देश में कुल खाद्यान्न उत्पादन में कदन्न अनाज की हिस्सेदारी 40 फीसदी थी। कदन्न अनाज को मोटा अनाज भी कहा जाता है क्योंकि इनके उत्पादन में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। ये अनाज कम पानी और कम उपजाऊ भूमि में भी उग जाते हैं। आज भी भारत में कुछ क्षेत्रों में कदन्न फसलों में ज्वार (सोरघम), बाजरा (पर्ल मिलेट), रागी (फिंगर मिलेट), कंगनी (फॉक्सटेल मिलेट), कुटकी (लिटिल मिलेट), चीना (प्रोसो मिलेट), कोदो (कोडोमिलेट), सांवां (बार्नयार्ड मिलेट) तथा भूराशीर्ष कदन्न (ब्राउनटॉप मिलेट) आदि की खेती की जाती है।   कदन्न प्रमुख खाद्य फसलों के अंतर्गत आते हैं तथा देश के विविध कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में इनकी खेती की जाती है। ये विशेषकर बारानी तथा पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा आधारित खेती के लिए उपयुक्त है। बहुत ही कम निवेश के साथ इनकी खेती की जा सकती है। ये फसलें जलवायु अनुकूल, कठोर परिस्थितियों में जीवनक्षम...

Major diseases of coarse grain, Millet and their prevention बाजरा पश्चिमी राजस्थान में बोई जाने वाली प्रमुख फसल है। बाजरा भारत की प्रमुख फसलाें में से एक है। जिसका उपयोग भारतीय लोग बहुत लम्बे समय से करते आ रहे है। इसकी खेती अफ्रीका और भारतीय महाद्वीप में बहुत समय पहले से की जा रही है। अधिक सूखा सहनशीलता उच्चे तापमान व अम्लीयता सहन के कारण बाजरा उन क्षेत्रों में भी आसानी से उगाया जा सकता है जहा मक्का या गेहूं नहीं उगाये जा सकते है। बाजरा बहुत रोगों से प्रभावित होता है जिसका समय पर उपचार कर फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है। बाजरे की बिमारियां निम्न प्रकार से है। 1. तुलासिता व हरित बाली रोग: यह एक फफुंद जनित रोग है जिसको जोगिया , हरित बाली या कोडिया आदि नामों से भी जाना जाता है। यह बाजरे की फसल का प्रमुख रोग है। तथा हमारे देष में लगभग सभी बाजरा उत्पादक राज्यों में पाया जाता है। इस रोग में सर्वप्रथम 15-20 दिन के उम्र के पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाती है। पत्तियों की नीचे की सतह पर कवक की सफेद वृद्धि दिखाई देती है। पत्तियों पर एक दुसरे के समानान्तर पीली धारियां बन जाती है। जो कि पत्तियों की सम्पूर्ण लम्बाई में फेल जाती है। रोग की उग्रता के साथ धारियां भूरे रंग...

Major diseases of Sorghum and Millet and their management ज्वार भारत की एक महत्वपूर्ण खाद्य और चारा फसल है। जवार में अन्न-कंड, अरगट (गदाकरस), एन्थे्रकनोज (काला धब्बा रोग) इत्यादी अधिक हानिकारक है। इसलिए इन रोगों का नियंत्रण आवष्यक है। (1) अन्न कंड (ग्रेइन स्मट) रोगजनक: स्फासेलोथेका सोर्गी (लिंक) यह रोग सभी कंड रोगों में सबसे अधिक हानिकारक है, जिससे पूरे भारत में अनाज की उपज को अत्याधिक नुकसान होता है। यह रोग ज्यादातर बरसाती और सिंचित ज्वार मे पाया जाता है। रोग के लक्षण: यह रोग केवल दाने बनने के समय में आता है। रोग ग्रस्त बालियों में कुछ दाने सामान्य दाने से बडे होते है। जब रोग की तीव्रता बढ जाती है उस वक्त पुरी बालियॉ कंड रोग से प्रभावित हो जाता है। स्वस्थ दाने के स्थान पर गोल अंडाकार काले रंग की बीजानुधानी बन जाती है जीसमें रोग को फैलाने वाले बीजाणु होते है। इस रोग के कारण कुछ क्षेत्रों में 25 प्रतिशत तक नुकसान दर्ज करने की सूचना है। रोग चक्र एवं अनुकूल वातावरण: बीजाणु बीज के तल पर जुडे होते है। वे बीज के साथ अंकुरित होते है और मूल क्षेत्र को भेदकर रोपाई (पौधे) को संक्रमित करते है। यदि रोग ग्रस्त बालिया स्वस्थ बालिया के साथ में काटा जाता है और एकसाथ थ्रेशींग कीया जाता है तो बीजाणुधानी फटने से स्वस्थ दाने भी...

Multi cut fodder sorghum cultivation technique.  भारत में मात्र 4 प्रतिशत भूमि पर चारे की खेती की जाती है तथा एक गणना के अनुसार भारत में 36 प्रतिशत हरे चारे एवं 40 प्रतिशत सूखे चारे की कमी है | अत:  हमें उन चारा फसलों की खेती करनी होगी जो लम्बे समय तक पशुओं को पोष्टिक हरा चारा उपलब्ध कराने के साथ साथ हमारी जलवायु में आसानी से लगाई जा सके| शरद ऋतू में बरसीम, जई, रिजका, कुसुम आदि की उपलब्धता मार्च के पहले पखवाड़े तक बनी रहती है किन्तु बहु कट चारा ज्वार से पशुओं को लम्बे समय तक हरा चारा आसानी से मिल सकता है। ज्वार का चारा स्वाद एवं गुणवत्ता में बहुत अच्छा होता है | शुष्क भार के आधार पर ज्वार चारे में औसत 9 से 10 प्रतिशत प्रोटीन, 8-17 प्रतिशत शर्करा, 30-32 प्रतिशत फाइबर, 65-72 प्रतिशत एन.डी. एफ., 36 प्रतिशत सेलुलोज एवं 21 से 26 प्रतिशत हेमी सेलुलोज पाया जाता है | चारा ज्वार की बहु कटाई वाली किस्में: चारा उत्पादन हेतु भारत में ज्यादातर किसान ज्वार की स्थानीय किस्में लगाते है जो कम उत्पादन देने के साथ-साथ कीट एवं रोगों से प्रभावित होती है | अत: किसानो को अधिक उत्पादन देने वाली बहु कटाई चारा ज्वार किस्मों का अपने क्षेत्र के अनुरूप चयन करना चाहिए | एस. एस. जी.-59-3,एम. पी. चरी, पूसा चरी  23, को. 29, सी. एस. एच. 20, सी. एस. एच. 24 एम. एफ, पी. सी. एच. 106, पी. सी. एच. 109,पंजाब सुड़ेक्स तथा हरा सोना ज्वार खेत का चुनाव एवं तैयारी : चारा ज्वार...

Multi harvesting sorghum fodder crop cultivation techniques  भारत में  मात्र 4 प्रतिशत भूमि पर चारे की खेती की जाती है तथा एक गणना के अनुसार भारत में 36 प्रतिशत हरे चारे एवं 40 प्रतिशत सूखे चारे की कमी है | अत: बढती हुई आबादी एवं घटते हुए कृषि क्षेत्रफल को ध्यान में रखते हुए हमें उन चारा फसलों की खेती करनी होगी जो लम्बे समय तक पशुओं को पोष्टिक चारा उपलब्ध कराने के साथ साथ हमारी जलवायु में आसानी से लगाई जा सके | शरद ऋतू में बरसीम, जई, रिजका, कुसुम आदि की उपलब्धता मार्च के पहले पखवाड़े तक बनी रहती है किन्तु बहु कट चारा ज्वार से पशुओं को लम्बे समय तक हरा चारा आसानी से मिल सकता है  ज्वार का चारा स्वाद एवं गुणवत्ता में बहुत अच्छा होता है | शुष्क भार के आधार पर  ज्वार चारे में औसत 9 से 10 प्रतिशत प्रोटीन, 8-17 प्रतिशत शर्करा, 30-32 प्रतिशत फाइबर, 65-72 प्रतिशत एन.डी. एफ., 36 प्रतिशत सेलुलोज एवं 21 से 26 प्रतिशत हेमी सेलुलोज पाया जाता है | ज्वार की पानी उपयोग करने की क्षमता भी अन्य चारा  फ़सलों की तुलना में अधिक है। शीघ्र बढवार एवं अधिक चारा उत्पादन क्षमता एवं कम पानी में भी अधिक उत्पादन देने के कारण यह  एक आदर्श चारा फसल है| सामान्यत: एक कटान वाली ज्वार में...