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रबी मौसम में जलजमाव वाले क्षेत्रों में बोरो धान एक विकल्प  धान भोजन का एक प्रमुख फसल के साथ.साथ कार्बोहाड्रेट का मुख्य श्रोन्न है जिससे मनुष्य अपने भोजन का अधिकांश भाग पूरा करता है। धान की खेती मुख्यतः खरीफ मौसम में की जाती है परन्तु इस मौसम में कीट-पतंग, बीमारीयों तथा मौसमी खरपतवार का प्रकोप होने के कारण फसल की वांछित उपज प्राप्त नहीं होती है। इसके बिपरीत रबी मौसम की बोरो धान  में लगने बाली कीट-पतंग, बीमारियाँ तथा मौसमी खरपतवार कम लगने के साथ-साथ सूर्य की अबधि खरीफ मौसम की तुलना में प्रति इकाई अधिक होती है।  परिणमतः प्रति पौधों में किलों की संख्या अधिक होती है जिसके कारण प्रति वर्गमीटर में उपजषील किल्लें बढ जाती है जिससे रबी मौसम की बोरो धान  की उपज अधिक होती है। रबी मौसम की बोरो धान की खेती मुख्यतः बंगाल,  उतरी बिहार, उङीशा इत्यादि प्रदेशों में की जाती है। जहाँ साल भर जलजमाव रहने के साथ-साथ वह क्षेन्न हमेशा बेकार पडे रहते हैं उस जलजमाव वाले भूमि  पर किसान दूसरे किसी रबी फसल की खेती नहीं कर पाते हैं वैसे में किसान उस भूमि पर समुचित शस्य प्रबंधन कर रबी मौसम की बोरो धान  की खेती एक विकल्प के रूप में कर अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है। भूमि का चयन एवं खेतों की तैयारीः...

Bakanae disease of rice in basmati rice: Symptoms and control measures बकाने रोग, धान (ओरायजा सटाइवा एल.) की फसल के उभरते हुए रोगों में से एक है। भारत में यह रोग रोग पहली बार थॉमस (1931) द्वारा सूचित किया गया था। यह रोग देश के विभिन्न भागों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, असम, महाराष्ट्र, पंजाब, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और ओडिशा आदि से रिपोर्ट किया गया है। भारत में बकाने रोग पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंण्ड में अधिक गंभीर सूचित किया गया है जहाँ बासमती की किस्में उगाई जाती हैं। जापानी भाषा में ‘बकाने’ का शाब्दिक अर्थ बुरी या बेवकूफीपूर्ण पौध होता है जो इस रोग के विशिष्ट लक्षण, सामान्य से अधिक लम्बा होने की ओर इंगित करता है। इस रोग को गुणात्मक और मात्रात्मक नुकसान के लिए जाना जाता है। उपयुक्त पर्यावरणीय स्थितियों में रोग को दुनिया के विभिन्न कोनों में 70% तक की कमी का कारण माना जाता है। रोगजनक: बकाने एक कवक जनित रोग है जो फ्यूजे़रियम फ्यूजिकुरोई के कारण होता है । यह कवक जिबरेलिन्स एवं अन्य उपापचयजों जैसे कि कैरोटिनायड्स, बीकावेरिन एवं फ्यूजे़रिन का उत्पादन करते हैं। रोग लक्षण: बकाने रोग को विभिन्न प्रकार के लक्षणों के लिए जाना जाता है, जिसमें बुवाई से लेकर कटाई तक विभिन्न प्रकार के लक्षण उत्पन्न होते हैं । प्ररूपी लक्षणों में प्राथमिक पत्तियों...

जैव संवर्धित किस्में एवं उनकी प्रमुख विशेषतायें  पोषक आहार मानव शरीर की सम्पूर्ण वृद्धि व विकास के लिए आवश्यक है| पोषक आहार नही मिलने से विभिन्न सूक्ष्म तत्वों की कमी शरीर को अनेक प्रकार से प्रभावित करती है जिसको सामान्य शब्दों में कुपोषण कहा जाता है| सम्पूर्ण विश्व में लगभग 2 बिलियन जनसंख्या अपुष्ट आहार से प्रभावित है जबकि 795 मिलियन जनसंख्या कुपोषण की शिकार है| भारत में 194.6 मिलियन जनसंख्या कुपोषित है जिनमे से 44% महिलायें अनीमिया से ग्रसित है, 5 वर्ष से कम उम्र के 38.4% बच्चे छोटे कद व 35.7% बच्चे कम वजन के है| जैव संवर्धित किस्मों का विकास कर कुपोषण की स्थिति से बचा जा सकता है| यह सबसे सस्ता और सरल उपाय है| पारम्परिक प्रजनन (जैव प्रौद्योगिकी के साथ या इसके बिना, फसल मानचित्रण और मार्कर समर्थित प्रजनन) या मेटाबोलिक प्रौद्योगिकी के उपयोग के माध्यम से खाद्य फसल की सूक्ष्म पोषक तत्वों का संवर्धन जैव संवर्धन कहलाता है|  भारतीय कृषि अंनुसंधान परिषद ने जैव संवर्धित विधि से धान्य, दलहन, तिलहन, सब्जी और फल वाली फसलो में उच्च पैदावार व उच्च पोषक गुणवत्ता वाली विभिन्न जैव संवर्धित किस्मों का विकास किया है| इन किस्मों के बारे में संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है: धान की जैव संवर्धित किस्में 1. सी आर धान 310: यह किस्म राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, कटक (2016) द्वारा विकसित की...

Importance of varieties selection and nursery management for improvement in paddy production धान एक महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है विश्व की अधिकांश जनसंख्या (लगभग 60 प्रतिशत) द्वारा दैनिक भोजन में चावल का उपयोग भात, पोहा, मुरमुरा, लाई, आटे की रोटी के इत्यादि के रूप में किया जाता है। धान उत्पादन में चीन के बाद भारत का दूसरा स्थान है। जैसा की हम जानते है कि हर खुशबूदार धान, बासमती धान नहीं होता लेकिन हर बासमती धान खुशबूदार होता है इसलिए धान (चावल) को दाने का आकार और गुणवत्ता के आधार पर मुख्यतः तीन श्रेणियों बासमती धान, सुगन्धित धान और असुगन्धित धान में बांटा जा सकता है। भारतीय उपमहाद्वीप में उत्पादित बासमती धान अपने अद्भुत गुणों जैसे दानों का आकार, सुगंध, अच्छा स्वाद, सुपाचय और अधिक समय तक इन्हीं गुणों का बने रहना जो कि व्यावसायिक दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण हैं। धान की अच्छी फसल के लिए जलवायु एंव मृदा धान एक उष्ण तथा उपोष्ण जलवायु की फसल है। धान की अच्छी फसल के लिए उच्च तापमान (औसतन 20 से 37 डिग्री), लम्बे समय तक सूर्य की रोशनी, नमी एवम पर्याप्त पानी की उपलब्ध होना चाहिए। अच्छी जल धारण क्षमता वाली मृदा, जिसका पीएच मान 5.0 से 9 के बीच होता है, में धान की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। मटियार चिकनी मृदा जिसका पीएच मान 5.0...

Nematodes problems, symptoms and management in rice crop चावल दुनिया के एक बड़े हिस्से में  अनाज के रूप मे खाया जाता है। यह मानव पोषण और कैलोरी सेवन के लिए महत्वपूर्ण अनाज है, दुनियाभर में मनुष्यों द्वारा खपत की गई कैलोरी का 1/5 से अधिक हिस्सा है। चावल भारत की प्रसिद्ध फसल है जो देश के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों के लोगों का मुख्य भोजन है। कई निमेटोड प्रजातियां चावल की फसल को सक्रंमित करती है जैसे उफरा (डिटाइलेकस डिप्सेकी), व्हाइट टिप बिमारी (एफेलेनकोआइड बसेई) और जड़ गांठ रोग (मेलोडेगायनी ग्रमिनिकोल) है। दुनिया के सभी कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कुछ निमेटोड प्रजातियां जैसे कि प्रटिलेकंस स्पी. सबसे खतरनाक है। चावल रूट निमेटोड (हार्समैनिएला आॅरिझी) एक प्रवासी अन्तः परजीवी है जो अधिक मात्रा में मिटटी होने पर चावल की फसल का पूरा विनाश कर सकता है। चावल का जड़ गांठ रोग (मेलोडेगायनी ग्रमिनिकोल) लक्षणः- * जड़ों पर विशेषता हुक जैसे गांठे। * नये उभरते पत्ते, विकृत और किनारे मुड़े होते है। * पीलेपन से साथ छोटे पौधे। * भारी सक्रंमित पौधे, फूल जल्दी पक जाते हैं। * फूटाव कम होना। * बाली छोटी और कम दाने। चावल का जड़ गांठ रोग (मेलोडेगायनी ग्रमिनिकोल) प्रबंधन:- * हमेशा जलमग्न स्थितियों में फसल को रखें * कृषि क्रिया नियंत्रण, लगातार बाढ़ की स्थिती रखें, चावल की पनीरी को जल प्लावित स्थान पर उगाना और  फसल चक्र। इन...

Agricultural work to be carried out in the month of June धान फसल: यदि‍ मई के अन्‍ति‍म सप्‍ताह में धान की नर्सरी नही डाली हो तो जून के प्रथम पखवाडे तक पूरा कर ले। सुगंधि‍त धान की प्रजाति‍यों की नर्सरी जून के तीसरे सप्‍ताह मे ही डालनी चाहि‍ऐ। एक हैक्‍टेयर क्षेत्रफल में धान की रोपाई के लि‍ए 800 से 1000 वर्ग मीटर नर्सरी क्षेत्र की आवश्‍यकता होती है। प्रमुख कि‍स्‍मे - पूसा 1509, 1612, पूसा बासमती 5,6, पूसा 1121, पूसा आरएच 10  सब्‍जि‍यॉं : बै्ंगन, मि‍र्च व अगेती फूलगोभी की नर्सरी तैयार करें। बैंगन की कि‍स्‍मे: गोल फल- पूसा उत्‍तम, पूसा संकर 6 व 9, लम्‍बे फल- पूसा श्‍यामला, पूसा कौसल, पूसा संकर 5 व 20, छोटे गोल फल- पूसा बि‍ंदू, पूसा अंकंर, पूसा उपकार। गोभी की कि‍स्‍में: पूसा मेघना, पूसा अश्‍वि‍नी मि‍र्च की कि‍स्‍मे: पूसा ज्‍वाला, पूसा सदाबहार बुआई से पहले प्रति‍ कि‍लोग्राम बीज को 4 ग्राम ट्राइकोडर्मा अथ्‍ावा 3 ग्राम थि‍रम या केप्‍टान या 2 ग्राम कार्बेन्‍डाजि‍म से बीजोउचार अवश्‍य करें । फल वाली फसलें: जून में आम, अमरूद, नींबू, कि‍न्‍नू, मोसम्‍मी तथा लीची के नए बाग लगाने की तैयारी करते है जैसे की बाग का लेआउट व डि‍जाईन बनाना। गढ्ढो की खुदाई (आकार 1x1x1 घन मीटर)। प्रति‍ गढ्ढा 20 कि‍लो अच्‍छी तरह से सडी गोबर की खाद 100 ग्राम नाइट्रोजन, फास्‍फोरस व पोटास प्रत्‍येक, की मात्रा मि‍ट्टी मे मि‍लाकर...

Agricultural work to be carried out in the month of August धान फसल: गैर बासमती धान की अधि‍क उपज वाली कि‍स्‍मों में रोपाई के 25 से 30 दि‍न बाद 30 कि‍लो नाइट्रोजन यानि‍ 65 कि‍लो यूरि‍या प्रति‍ हैक्‍टेअर तथा बासमती कि‍स्‍मों मे 15 कि‍लोग्राम नाइट्रोजन (33 कि‍ग्रा यूरि‍या) प्रति‍ हैक्‍टेयर की टापॅ ड्रेसि‍ंग कर दें। इतनी ही मात्रा से दूसरी व अन्‍ति‍म टॉप ड्रेसि‍ंग रोपाई के 50-55 दि‍न बादे करें  ध्‍यान रखे की टॉप ड्रेसि‍ंग करते समय खेत मे पानी 2-3 सेमी से अधि‍क ना हो। धान के तना छेदक कीट की रोकथाम के लि‍ए, जब खेत में 4.5 सेंमी पानी हो, प्रति‍ हैक्‍टेयर 20 कि‍ग्रा कार्बोफयूरान दवा का प्रयोग करें अथवा क्‍लोरोपायरीफास 20 ईसी दवा 1.5 लि‍टर प्रति‍ हैक्‍टेयर की दर से 60 लीटर पानी मे घोलकर छि‍डकाव करें। सब्‍जि‍यॉं : गोभी की पूसा शरद,पूसा हाईब्रि‍ड 2 प्रजाति‍ की नर्सरी तैयार करें। अगेती गाजर जैसे पूसा वृष्‍टि‍ कि‍स्‍म की बुआई आरम्‍भ कर सकते हैं। कद्दू वर्गीय सब्‍जि‍यों में मचान बनाकर उस पर बेल चढाने से उपज में वृद्धि‍ होगी व स्‍वस्‍थ्‍य फल बनेंगें। बैंगन में थि‍रम 3 ग्राम या कैप्‍टान 3 ग्राम या कार्बेन्‍डाजि‍म 2 ग्राम प्रति‍ कि‍लोग्राम बीज की दर से उपचारि‍त करके बुआई करने से फोमाप्‍सि‍सं अंगमारी व फल वि‍गलन की रोकथाम करें। फल फसलें:   तराई क्षेत्रों में आम के पौधों पर गांठ बनाने वाले कीडे गॉल...

Procedure of rice transplanting through paddy transplanting machine  मशीन से धान की रोपाई के लिए खेत की उथली मताई (Puddling) करना आवश्यक है। जिससे चटाईनुमा पौध की सुचारू रूप से रोपाई की जा सके। इस विधि से पौध की जड़े आसानी से मिट्टी को पकड़ लेती है तथा उनकी वृद्धि भी अच्छी होती है। मताई की कार्य विधि खेत की पडलिंग (मताई) करने के लिए भुरभुरा होने वाली नमी की अवस्था में बखर या मिट्टी पलट हल से अच्छी तरह जोतना चाहिये। जुताई करने के बाद खेत को समतल करना चाहिये व साथ - साथ खेत के चारो तरफ मेड़ भी बनाई जाए, उसके बाद खेत को पानी से भरकर उसमें कम से कम 50 मि.मी. (2 इंच) पानी का स्तर 24 घंटे तक बनाए रखना चाहिए। तत्पश्चात् पडलर का प्रयोग करें और इसको एक बार आड़े में एवं एक बार तिरछे में अच्छी तरह चलाएं, जिससे मिट्टी व पानी अच्छी तरह से मिल जाए। यह ध्यान रखे कि उथली मताई के लिये 50 - 100 मि.मी. (2 से 4 इंच) से अधिक गहराई तक मताई न करें। खेत मताई का क्रमवार तरीका मिट्टी में हल्की नमी होने पर जुताई 75- 100 मि.मी. (2.5 से 4 इंच) गहराई तक करें। खेत को समतल करें तथा खेत केचारों तरफ मेढ़ बनाए। खेत में 24 - 36 घंटे तक पानी...