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बाजरा Tag

बाजरेे का संकर बीज उत्पादन Pearl millet is a highly cross-pollinated crop due to its protogyny condition of flower. In this condition stigma of the flower emerges first and mature before pollen shedding this condition of flower promote cross pollination. This nature of flowering facilitates the breeding of hybrids and open-pollinated varieties (OPVs). For hybrid seed production two methods are used first parental line growing in crossing block and harvest seed. The resultant seed contained approximately 40% hybrid seed when the two parental lines had synchronous flowering. This is called chance hybrid. In second method cytoplasmic-nuclear male-sterility lines like male-sterile lines Tift 23A and Tift 18A are used. These lines shows short stature, profuse tillering, uniform flowering and good combining ability are used in current breeding programme of pearl millet. In hybrid seed production chain, nucleus seed, breeder seed, foundation seed and certified seed are produce. Certified seed is the progeny of foundation seed and must meet the standards of seed certification prescribed in the Indian Minimum Seeds Certification Standards, 1988. Certified seed production is organized through State Seeds Corporations, Departmental Agricultural Farms, and Cooperatives etc. The efforts of the State Governments are also supplemented by NSC which produces seed of varieties of national importance. The production of certified seed by NSC and State Seed Corporations is...

Management of Whitegrub in Kharif Crops सफ़ेद लट (whitegrub) खरीफ की फसलों जैसे मूंगफली, मूंग, मोठ, बाजरा, सब्जियों इत्यादि पौधों की जड़ो को काटकर हानि पहुँचती है। ये मूंगफली जैसी मुसला जड़ो वाली फसलों में,  बाजरा जैसे झकड़ा जड़ वाली फसलों की अपेक्षा अधिक नुकसान करती है । राजस्थान के हल्के बालू मिटटी वाले क्षेत्रो में होलोट्राइकिया नामक भृंगो की सफ़ेद लटें अत्यधिक हानि करती है । सफ़ेद लट का जीवन चक्र :  राजस्थान के हल्के बालू मिटटी वाले क्षेत्रो में होलोट्राइकिया नामक भृंगो की सफ़ेद लटें एक वर्ष में केवल एक ही पीढ़ी पूरी करती है । मानसून अथवा मानसून पूर्व की पहली अच्छी वर्षा के पश्चात इस किट के भृंग सांयकाल गोधूलि वेला के समय प्रतिदिन भूमि से बाहर निकलते है|  सूर्य के तीव्र प्रकाश में यह भृंग भूमि से बाहर नहीं निकलते| मादा भृंग समागम के 3-4 दिन पश्चात गीली मिटटी में लगभग 10 सेमि गहराई पर अंडे देना शुरू कर देती है परन्तु यह सारे अंडे एक साथ न देकर थोड़े थोड़े अंडे 4-5 सप्ताह तक देती रहती है अंडो में से 7-13 दिन पश्चात छोटी लटें निकलनी प्रारम्भ हो जाती है  जो निम्न प्रकार से है- प्रथम अवस्था की लट 15 मिलीमीटर लम्बी होती है । यह अवस्था 2 सप्ताह तक रहती है द्वितीय अवस्था की लट 35 मिलीमीटर लम्बी होती है । यह अवस्था...

बाजरे की वैज्ञानिक तरीके से खेतीे बाजरा गरीब का भोजन कहा जाता है। मोटे दाने वाली खाद्यान फसलों में बाजरे का महत्वपूर्ण स्थान है। इसकी खेती दाने व चारे दोनो के लिए कि जाती है। शुष्क व कम वर्षा वाले क्षैत्रों के लिए एक महत्वपूर्ण फसल है। और यह राजस्थान की मुख्य फसल है। बाजरे का 90 प्रतिशत क्षैत्रफल राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, उतर प्रदेश, एवं हरियाणा राज्यों के अन्तर्गत आता है। बाजरे के दानों में लगभग 12.4 प्रतिशत नमी, 11.6 प्रतिशत प्रोटीन, 5.0 प्रतिशत वसा, 67.0 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट एवं 27.0 प्रतिशत लवण होते है। खेत कि तैयारी:- खेत की तैयारी फसल की समय से बुवाई सुनिश्चित करती है। खेत की तैयारी इस प्रकार करनी चाहिए कि पूर्व फसल अवशेष एवं अवांछित खरपतवार अच्छी तरह मिट्टी के नीचे दब जाये एवं मिट्टी भुरभुरी हो जाये। एक गहरी जुताई, मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए उसके बाद 2-3 जुताई, डिस्क द्वारा की जा सकती है। खेत से अतिरिक्त पानी की निकासी के लिए खेत का समतल होना अतिआवष्यक है। बाजरे की उन्नत प्रमुख संकर एवं संकुल किस्में:- राज-171, एच.एच.बी.-67, एच.एच.बी.-60, एच.एच.बी.-216, एच.एच.बी.-226, एच.एच.बी.-234, आई.सी.एम.एच.-356, आर.एच.बी.-154, आर.एच.बी.-177, आर.एच.बी.-90, आर.एच.बी.-58, जी.एच.बी.-757, जी.एच.बी.-538, मण्डोर बाजरा कम्पोजिट-2, आर.एच.बी.-121, सी.जेड.पी.-9802, एम.एच.-169, डब्ल्यू.सी.सी.-75. बुवाई का समय:- खेत में बुवाई के समय पर्याप्त नमी होनी चाहिए। सिंचित क्षेत्रों में जुलाई के प्रथम पखवाड़े तक बाजरे...

Major diseases of Sorghum and Millet and their management ज्वार भारत की एक महत्वपूर्ण खाद्य और चारा फसल है। जवार में अन्न-कंड, अरगट (गदाकरस), एन्थे्रकनोज (काला धब्बा रोग) इत्यादी अधिक हानिकारक है। इसलिए इन रोगों का नियंत्रण आवष्यक है। (1) अन्न कंड (ग्रेइन स्मट) रोगजनक: स्फासेलोथेका सोर्गी (लिंक) यह रोग सभी कंड रोगों में सबसे अधिक हानिकारक है, जिससे पूरे भारत में अनाज की उपज को अत्याधिक नुकसान होता है। यह रोग ज्यादातर बरसाती और सिंचित ज्वार मे पाया जाता है। रोग के लक्षण: यह रोग केवल दाने बनने के समय में आता है। रोग ग्रस्त बालियों में कुछ दाने सामान्य दाने से बडे होते है। जब रोग की तीव्रता बढ जाती है उस वक्त पुरी बालियॉ कंड रोग से प्रभावित हो जाता है। स्वस्थ दाने के स्थान पर गोल अंडाकार काले रंग की बीजानुधानी बन जाती है जीसमें रोग को फैलाने वाले बीजाणु होते है। इस रोग के कारण कुछ क्षेत्रों में 25 प्रतिशत तक नुकसान दर्ज करने की सूचना है। रोग चक्र एवं अनुकूल वातावरण: बीजाणु बीज के तल पर जुडे होते है। वे बीज के साथ अंकुरित होते है और मूल क्षेत्र को भेदकर रोपाई (पौधे) को संक्रमित करते है। यदि रोग ग्रस्त बालिया स्वस्थ बालिया के साथ में काटा जाता है और एकसाथ थ्रेशींग कीया जाता है तो बीजाणुधानी फटने से स्वस्थ दाने भी...

Agricultural work to be carried out in the month of July धान फसल: धान की मध्‍यम व देर से पकने वाली प्रजाति‍यों की रोपाई पहले पखवाडे में, शीघ्र पकने वाली कि‍स्‍मों की रोपाई दूसरे पखवाडे में तथा सुगन्‍धि‍त कि‍स्‍मों की रोपाई अन्‍ति‍म पखवाडे मे कर दें। धान की रोपाई से पूर्व 25 कि‍ग्रा / हैक्‍टेअर की दर से जि‍ंक सल्‍फेट खेत में मि‍ला दें परन्‍ते ध्‍यान रखें कि‍ फास्‍फोरस वाले उर्वरकों के साथ जि‍ंक सल्‍फेट कभी भी ना मि‍लाऐं। धान में खैरा रोग के लक्षण दि‍खाई देने पर प्रति‍ हैक्‍टेयर 5 कि‍ग्रा जि‍ंक सल्‍फेट व 2.5 कि‍ग्रा चूना 800 लि‍टर पानी में घोलकर छि‍डकाव करें। सब्‍जि‍यॉं : भि‍ण्‍डी, सेम, लोबि‍या, चौलाई तथा कद्दू वर्गीय सब्‍जि‍यों की नि‍म्‍न प्रजाति‍यों की बुआई करे। लोब्‍ि‍ाया- पूसा सुकोमल लौकी- पूसा नवीन, पूसा संतुष्‍टि‍, पूसा हाईब्रि‍ड 3 करेला- पूसा दोमौसमी, पूसा औषधि‍, पूसा हाईब्रि‍ड 2 चि‍कनी तोरई- पूसा स्‍नेहा धारीदार तोरई- पूसा नूतन पेठा- पूसा उज्‍जवल, पूसा उर्मी, पूसा श्रेयाली फल फसलें:   आम की आम्रपाली, मल्‍लि‍का, दशहरी, पूसा सूर्य व पूसा अरूणि‍मा कि‍स्‍में तोडने के लि‍ए तैयार हो जाती हैं। फलों को इथ्रेल के घोल (1.8 मि‍ली प्रति‍ लीटर गुनगुने पानी मे) में 5 मि‍नट रखकर समान रूप से पकाऐं। आम, अमरूद तथा पपीते में फल मक्‍खी की रोकथाम के लि‍ए इमि‍डाक्‍लोप्रि‍ड 3 मि‍ली दवा 10 लीटर पानी में घोलकर छि‍डकाव करें तथा मि‍थाईल युजि‍नोल फेरामोंन ट्रैप का प्रयोग...

Major Diseases of Fodder Crops And Their Management भारत विश्व में सबसे अधिक पशु जनसंख्या वाले देशों में से एक है। दुधारू पशुओं के अधिक दुध उत्पादन के लिए हरे चारे वाली फसलों की भूमिका सर्वविदित है। इन फसलों में अनेक प्रकार के रोग आक्रमण करते है जो चारे की उपज एवं गुणवत्ता में ह्रास करते है एवं हमारे पशुओं के स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक सिद्ध होते हैं। अतः इन रोगों का प्रबन्धन अति आवश्यक है। चारे की फसलों में प्रमुख रोग एवं उनका प्रबन्धन इस प्रकार हैः बाजरे की मॄदुरोमिल आसिता या हरित बाली रोगः रोगजनक: यह एक मृदोढ रोग है। इसका रोगकारक स्क्लेरोस्पोरा ग्रैमिनिकॉला नामक कवक है। मॄदुरोमिल आसिता या हरित बाली रोग केे लक्षणः दोनों सर्वांगी और स्थानीय संक्रमण होते हैं। मिट्टी जनित बीजाणु युवा पौध में सर्वांगी संक्रमण करते है। रोग के विशिष्ट लक्षण पत्तियों पर पीलापन, हरिमाहीनता, और आधार से सिरे तक चौड़ी धारियाँ बनना हैं। संक्रमित हरिमाहीन पत्ती क्षेत्रों की निचली सतह पर प्रचुर मात्रा में एक भूरी-सफेद कोमल कवक वृद्धि विकसित होती है जिससे अलैंगिक बीजाणुजनन होता हैं। इसमें विकसित बीजाणुधानीधर आगे स्थानीय संक्रमण उत्पन्न कर सकते है। इन्टरनोड्स एवं और टिलर के जरूरत से ज्यादा छोटा रह जाने की वजह से रोगग्रस्त पौधें बौने रह जाते हैं। गंभीर रूप से संक्रमित पौधें आम तौर पर बौने हो...

Green fodder production technique पशुओं की उत्पादन क्षमता उनको दिए जाने वाले आहार पर निर्भर करती है। पशुओं को संतुलित आहार दिया जाय तो पशुओं की उत्पादन क्षमता को निश्चित ही बढ़ाया जा सकता है।  हरे चारे के प्रयोग से पशुओं को आवश्यकतानुसार शरीर को विटामिन ’ए’ एवं अन्य विटामिन मिलते हैं।  इसलिए प्रत्येक पशुपालक को अपने पशुधन से उचित उत्पादन लेने के लिए वर्ष पर्यन्त हरा चारा खिलाने का प्रबन्ध अवश्य करना चाहिए। पशुओं से अधिक दुग्ध उत्पादन लेने के लिए किसान भाईयों को चाहिए कि वे ऐसी बहुवर्षीय हरे चारे की फसले उगाऐं  जिनसे पशुओं को दलहनी एवं गैरदलहनी चारा वर्ष भर उलब्ध हो सकें।  रबी एवं खरीफ के लिए पौष्टिक हरा चारा उगाने की योजना कृषकों को अवश्य बनानी चाहिए।  खरीफ एवं रबी के कुछ पौष्टिक हरे चारे उगाने की विधि इस प्रकार हैंः 1. लोबिया चारा फसल उगाने की तकनीक इसका चारा अत्यन्त पौष्टिक है जिसमें 17 से 18 प्रतिशत प्रोटीन पाई जाती है।  कैल्शियम तथा फास्फोरस पर्याप्त मात्रा में होता है।  यह अकेले अथवा गैल दलहनी फसलों जैसे ज्वार या मक्का के साथ बोई जाती है।  लोबिया चारे की फसल के लि‍ए भूमि व भूमि की तैयारीः  इसकी खेती दोमट या बलुई और हल्की काली मिट्टी में की जाती है।  भूमि का जल निकास अच्छ होना चाहिए।  एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3...

Seed Production Techniques of Sorghum and Millet ज्वार की बीज उत्पादन तकनीक ज्वार दुनिया में पाँचवें नम्बर का खाद्यान है  ज्वार को 55 प्रतिशत रोटी व दलिया के रूप में तथा पौधे को जानवरों के खाने के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। अमेरिका में 33 प्रतिशत ज्वार दाने को जानवरों के खाद्यान के रूप में प्रयोग किया जाता है। भारत वर्ष में 1970 में 9 मि. टन ज्वार पैदा होती थी जो 1980 में बढ़कर 12 मि. टन पहुँच गई तथा 1990 में इतनी ही पैदावार स्थिर रही जो 2006 तक स्थिर रही लेकिन इसका क्षेत्रफल काफी कम हो गया। क्षेत्रफल कम होने के बावजूद पैदावार में कमी न आने का कारण उन्नत किस्में व तकनीकी रही। भारत में ज्वार 8.7 मि.है. क्षेत्रफल में जिसमें 3.9 मि.है. खरीफ में तथा 4.8 मि.है. रबी मौसम में उगाई जाती है। दुनिया में ज्वार के अन्तर्गत, कुल क्षेत्रफल का 20 प्रतिशत क्षेत्र भारत में आता है। खरीफ के मौसम में उत्पादकता 1345 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर तथा रबी में 480 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर होती है। अधिक उत्पादन देने वाली किस्मों का योगदान 0.7 मि.है. से बढ़कर 6.5 मि.है. हो गया है। इसके बावजूद 80 मि.टन हरे चारे की तथा 660 मि.टन सूखे चारे की कमी प्रति वर्ष रहती है। ज्वार, पूसा चरी - 9, उंचाई 15 से 16...