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ताप-संरक्षक (थर्मो-प्रोटेक्टेंट): मूँग में उच्च तापमान सहनशीलता और उपज बढ़ाने के लिए बूस्टर खुराक  सभी दालों में, मूँग का जल्दी परिपक्व,  उच्च दैनिक उत्पादकता और बहुउपयोगी होने के कारण, एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। हमारे देश के कुल दाल उत्पादन में मूँग का योगदान 11% है। मूँग एक पौष्टिक अनाज है जो पूरे भारत में अनाज आधारित आहार का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। मूँग का पौष्टिक मूल्य इसके उच्च और आसानी से पचने योग्य प्रोटीन में निहित है। मूँग आम तौर पर गर्म मौसम की फसल है जिसमें बुवाई से लेकर परिपक्वता तक गर्मियों में 60-65 दिनों की आवश्यकता होती है। मूँग गर्म मौसम की फसल होने के कारण अपनी अधिकांश वृद्धि अवधि के दौरान उच्च तापमान के प्रति अपेक्षाकृत अच्छी सहनशीलता दिखाती है। लेकिन, जब मूँग का  प्रजनन अवधि गर्मी के मौसम के दौरान असामान्य रूप से उच्च तापमान (> 40 ℃) के साथ संयोग होता है , तो इसपर  गर्मी  का प्रभाव गंभीर होता है। मूँग की वृद्धि  के लिए इष्टतम तापमान सीमा 27°C से 35°C के बीच होता है। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग (भूमंडलीय तापमान वृद्धि) के कारण, हाल ही में अत्यधिक उच्च तापमान (> 45 ℃) के लगातार और अप्रत्याशित घटना देखी जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) ने अपनी छठी मूल्यांकन रिपोर्ट, में...

प्रचुर मात्रा में मसूर उत्पादन के लिए उन्नत खेती  रबी मौसम में उगाई जाने वाली दलहनी फसलों में मसूर का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि इसके दानों में 24-26% प्रतिशत प्रोटीन, 3% प्रतिशत वसा, 2% प्रतिशत रेशा, 57% प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, कैल्सियम 68 मिली ग्राम/ 100 दाने, स्फुर 300 मिलीग्राम / 100 दाने, लौह तत्व 7 मिलीग्राम / 100 दाने, विटामिन C 450 IU पाई जाती है।  इन विशेषताओ के कारण इसका उपयोग दाल के अलावा अन्‍य कई प्रकार के व्यंजनों में , पूर्ण दाने या आटे के रूप, में किया जाता हैं। मसूर की खेती के लि‍ए भूमि एवं खेत की तैयारीः- मसूर की खेती प्रायः सभी प्रकार की भूमियों मे की जाती है। किन्तु दोमट एवं बलुअर दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। जल निकास की उचित  व्यवस्था वाली काली मिट्टी मटियार मिट्टी एवं लैटराइट मिट्टी में इसकी अच्छी खेती की जा सकती है। खेत की तैयारी के लिये वर्षाकालीन फसल की कटाई के बाद भूमि में उपलब्ध नमी के अनुसार एक या दो बार देशी हल या बरवर से जुताई कर मिट्टी भुरभुरी बना ली जाती हैं। इसके तुरन्त बाद पाटा चला कर खेत समतल करने से नमी सुरक्षित रहती हैं एवं बुवाई के समय बीज एक समान गहराई पर बोया जाता हैं। जिससे बीज का अंकुरण भी अच्छा होता हैं। हल्की अम्लीय (4.5.- 8.2 पी.एच.) की भूमियों में मसूर की खेती की...

Weed management in pulse crops दलहनी फसलों की पैदावार में कमी होने के प्रमुख कारकों में खरपतवारों की समस्या बहुत जटिल है। दलहनी फसलों की शुरूआती धीमी बढ़वार एवं कम ऊँचाई के कारण खरपतवार फसलों के ऊपर हावी हो जाते हैं तथा उपज को प्रभावित करते हैं। दलहनी फसलों में खरपतवारों की समय पर रोकथाम से न केवल पैदावार बढ़ाई जा सकती है अपितु उसमें गुणवत्ता को भी बढ़ाया जा सकता है। दलहनी फसलों के प्रमुख खरपतवार निम्नलिखित है तालिका-1 दलहनी फसलों के प्रमुख खरपतवार खरपतवारों की श्रेणी खरपतवार रबी खरीफ सकरी पत्ती वाले      गेंहूँ का मामा, (फेलोरिस्प माइनर), जंगली जई (ऐवेना फेच्वा), दूब घास (साइनोडोंन डेक्टीलोन)    संवा (इकानोक्लोआ कालोना)  दूब घास (साइनोडान डेक्टीलान)कोदों (इल्यूसिन इण्डिका)बनरा (सिटैरिया ग्लाऊका) चैड़ी पत्ती वाले कृष्णनील (एनागोलिस आरवेनसिस), बथुआ (चिनोपोडियम एल्बम), सेंजी (मेलीलोटस प्रजाति), प्याजी (एस्फोडिलस टेन्यूफोलियस), हिरणखुरी (काॅनवोलवुलस आर्वेनसिस), पोहली (कार्थेमस आम्सीकैन्था), सत्यानाशी (आर्जीमोन मेक्सीकाना), अकरी (विसिया सटाइवा), जंगली मटर (लेथाइरस सटाइवा) पत्थरचट्टा (ट्रायन्ािमा पोस्टलाकैस्ट्रम), कनकवा (कामेलिना बेचालेनसिस), महकुआ (एजीरेटम कोना ज्वाडिस), तन मकोथ (फाइजेलिस मिनीमा), सफेद मुर्ग (सिलोसिया अर्जेन्सिया) और हजार दाना (फाइलेन्थिस निरूरी)  मोथाकुल परिवार के खरपतवार मोथा (साइप्रस रोटेन्डस्) मोथा (साइपेरसरोटन्डस) दलहन में खरपतवारों से होने वाली हानियाँ खरपतवार दलहनी फसलों के लिए अत्यन्त हाँनिकारक है। ये पोषक तत्वों एवं अन्य महत्वपूर्ण अवयवों को ग्रहण कर लेते है। तथा उत्पादकता को प्रभावित करते है। खरीफ मौसम में उच्च तापमान एवं अधिक नमी के कारण खरपतवार की रबी मौसम की अपेक्षा अधिक खरपतवार उगते है। खरपतवार फसलों में लगने वाले...

Insect Pests of Moong bean and their control 1- बलिस्टर बीटल  पहचान   इसकी व्यस्क मध्यम आकार की होती है सिर उदर एवं वक्ष गहरे काले रंग का होता हैA पंख में नारंगी रंग के पट्टीनूमा संरचना लिये हुये होते है। इसकी व्यस्क मृदा में अण्डे देती है। लक्ष्ण  व्यस्क भृंग हरे फलियों के फूलों एवं हरे दानों पर आक्रमण करते है इससे दाने भरने की अवस्था प्रभावित होती है। ये भृंग एक प्रकार का पीला द्रव स्त्रावित करते है जिसे बिलिस्टर कहते है।  नियंत्रण 1- नाईट्रोजन का समुचित उपयोग करें। 2- फ्युरोमॉन एवं प्रकाश प्रंपच का उपयोग रात्री के समय व्यस्क कीटों की संख्या को नियंत्रित करने के लिये इस्तेमाल करें। 3- जालीयुक्त नेट का इस्तेमाल करें। 4- वयस्क कीटों को केरोसीनयुक्त पानी में डालकर नष्ट करें।   2- चने की इल्ली पहचान इसकी लार्वा 3-5 से.मी. लम्बी हरा भूरा रंग लिये हुये रोमयुक्त गहरे पीले धारीनूमा होती है। इसकी वयLक मध्यम आकार की हल्के भूरा उभार लिये हुये मूखवाला अग्र पंख सुनहरा हरा&पीला एवं गहरा भूरा तथा शरीर के मध्य में गोल धब्बानूमा प”च् पंख सफेद रंग का एवं किनारा चौडे काले रंग का होता है। लक्षण लार्वा पत्तियों पर खुरचननूमा संरचना बनाकर दानो की फलियों को छेदकर बीज को खाती है। इसका सिर अंदर की तरफ एवं शरीर का भाग बाहर की तरफ लटका रहता है। नियंत्रण गहरी ग्रीष्मकालीन जुताई करे जिससे लार्वा एवं प्यूपा सूर्य...