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ताप-संरक्षक (थर्मो-प्रोटेक्टेंट): मूँग में उच्च तापमान सहनशीलता और उपज बढ़ाने के लिए बूस्टर खुराक  सभी दालों में, मूँग का जल्दी परिपक्व,  उच्च दैनिक उत्पादकता और बहुउपयोगी होने के कारण, एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। हमारे देश के कुल दाल उत्पादन में मूँग का योगदान 11% है। मूँग एक पौष्टिक अनाज है जो पूरे भारत में अनाज आधारित आहार का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। मूँग का पौष्टिक मूल्य इसके उच्च और आसानी से पचने योग्य प्रोटीन में निहित है। मूँग आम तौर पर गर्म मौसम की फसल है जिसमें बुवाई से लेकर परिपक्वता तक गर्मियों में 60-65 दिनों की आवश्यकता होती है। मूँग गर्म मौसम की फसल होने के कारण अपनी अधिकांश वृद्धि अवधि के दौरान उच्च तापमान के प्रति अपेक्षाकृत अच्छी सहनशीलता दिखाती है। लेकिन, जब मूँग का  प्रजनन अवधि गर्मी के मौसम के दौरान असामान्य रूप से उच्च तापमान (> 40 ℃) के साथ संयोग होता है , तो इसपर  गर्मी  का प्रभाव गंभीर होता है। मूँग की वृद्धि  के लिए इष्टतम तापमान सीमा 27°C से 35°C के बीच होता है। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग (भूमंडलीय तापमान वृद्धि) के कारण, हाल ही में अत्यधिक उच्च तापमान (> 45 ℃) के लगातार और अप्रत्याशित घटना देखी जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) ने अपनी छठी मूल्यांकन रिपोर्ट, में...

राजस्थान में मूँग की उन्नत खेती  मूँग एक फलीदार फसल है जिसे मुख्य रूप से दाल के लिए प्रयोग किया जाता है। दाने के साथ-साथ फसल की पत्तियों और तने से पर्याप्त मात्रा में भूसा प्राप्त होता है, जो जानवरों के चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है। भारत में लगभग 308 मिलियन हेक्टेयर में मूंग की खेती की जाती है तथा इसका उत्पादन 1.31 मिलियन टन प्रति वर्ष है। मूंग की औसत उत्पादकता 4.25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। मूंग को हरी खाद के लिए भी प्रयोग किया जाता है। मूंग की जड़ों में सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं जो वायुमंडल की नाइट्रोजन को एकत्रित करते हैं जो अगली फसल के द्वारा प्रयोग की जाती है। इसे मृदा अपरदन अवरोधी तथा कैच क्रॉप के रूप में प्रयोग करते हैं। राजस्थान में मूंग खरीफ एवं ग्रीष्म दोनों मौसमों में कम समय में पकने वाली मुख्य दलहनी फसल है। मूंग में 24- 26% प्रोटीन, 55-60% कार्बोहाइड्रेट एवं 1.3% वसा पाया जाता है। मूंग की खेती राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार तथा पश्चिमी बंगाल में प्रायः की जाती है। उत्तरी भारत में मूंग की खेती ज्यादातर खरीफ ऋतु में की जाती है। वैसे तो मूंग की खेती को तीन वर्गो में बांटा गया है  1. बसंतकालीन मूंग ( spring season moong ) - इस सीजन की अवधि फरवरी-मार्च से मई-जून तक है। 2. ग्रीष्मकालीन मूंग ( summer season moong ) - इसकी अवधि अप्रैल से जून तक होती है। 3. खरीफ ऋतु की...

जायद में मूंग का उत्पादन दलहनी फसलों में मूंग की बहुमुखी भूमिका है। इससे पौष्टिक तत्व प्रोटीन पर्याप्त होने के कारण स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। मूंग के दानों में 25 प्रतिशत प्रोटीन, 60 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 13 प्रशित वसा तथा अल्प मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है। इसमें वसा की मात्रा कम होती है और इसमें विटमिन बी कम्पलेक्स, कैल्शियम, खाद्य रेशा एवं पोटेशियम भरपूर होता है। मूंग की दाल से दही बडे, हल्वा, लड्डू, खिचड़ी, नमकीन, चीला, पकोडे़ आदि बनाये जाते हैं। बीमार होने पर डाॅक्टर मूंग की खिचड़ी या मूंग की दाल खाने का परामर्श देते हैं क्योकि यह जल्दी पच जाती है। फली तोड़ने के बाद फसलों को भूमि में पलट देने से यह हरी खाद की पूर्ति भी करता है। उत्तर देश के एटा, अलीगढ़, देवरिया, इटावा, फरूखाबाद, मथुरा, ललितपुर, कानपुर देहात, हरदोई एवं गाजीपुर जनपद प्रमुख मूंग उत्पादन के रूप में उभरें है। जिला ललितपुर में वर्ष 2017 के अनुसार मूंग का कुल आच्छादन क्षेत्रफल 4988 हे0, उत्पादन 1890 मे0 टन तथा उत्पादकता 3.79 कु0/हे0 था (कृषि विभाग, ललितपुर के कृषि उत्पादन कार्यक्रम खरीफ 2018-19 के अनुसार)। इसकी महत्ता को देखते हुए ही भारत सरकार ने रु0 7050.0 प्रति कु0 न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया है। किसान मूंग की उन्नत कृषि क्रियाएं अपनाकर उत्पादकता को बढ़ा सकता...

Management of Whitegrub in Kharif Crops सफ़ेद लट (whitegrub) खरीफ की फसलों जैसे मूंगफली, मूंग, मोठ, बाजरा, सब्जियों इत्यादि पौधों की जड़ो को काटकर हानि पहुँचती है। ये मूंगफली जैसी मुसला जड़ो वाली फसलों में,  बाजरा जैसे झकड़ा जड़ वाली फसलों की अपेक्षा अधिक नुकसान करती है । राजस्थान के हल्के बालू मिटटी वाले क्षेत्रो में होलोट्राइकिया नामक भृंगो की सफ़ेद लटें अत्यधिक हानि करती है । सफ़ेद लट का जीवन चक्र :  राजस्थान के हल्के बालू मिटटी वाले क्षेत्रो में होलोट्राइकिया नामक भृंगो की सफ़ेद लटें एक वर्ष में केवल एक ही पीढ़ी पूरी करती है । मानसून अथवा मानसून पूर्व की पहली अच्छी वर्षा के पश्चात इस किट के भृंग सांयकाल गोधूलि वेला के समय प्रतिदिन भूमि से बाहर निकलते है|  सूर्य के तीव्र प्रकाश में यह भृंग भूमि से बाहर नहीं निकलते| मादा भृंग समागम के 3-4 दिन पश्चात गीली मिटटी में लगभग 10 सेमि गहराई पर अंडे देना शुरू कर देती है परन्तु यह सारे अंडे एक साथ न देकर थोड़े थोड़े अंडे 4-5 सप्ताह तक देती रहती है अंडो में से 7-13 दिन पश्चात छोटी लटें निकलनी प्रारम्भ हो जाती है  जो निम्न प्रकार से है- प्रथम अवस्था की लट 15 मिलीमीटर लम्बी होती है । यह अवस्था 2 सप्ताह तक रहती है द्वितीय अवस्था की लट 35 मिलीमीटर लम्बी होती है । यह अवस्था...

Improved technology for cultivation of Mungbean मूंग भारत में उगायी जाने वाली, कम समय मे पकने वाली, महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। इन फसल में वातावर्णीय नाइट्रोजन को पौधों द्वारा ग्रहण करने योग्य बनाने की अदभुत क्षमता होती हैं। जिससे पौधों को कम उर्वरक की आवश्यकता पड़ती है, और उत्पादन लागत कम हो जाती है। इनकी खेती लगभग सभी राज्यों मे की जाती है। परन्तु महाराष्ट, आन्ध्र प्रदेश,  उत्तर प्रदेश , राजस्थान, मध्य प्रदेश तमिलनाडु तथा उड़ीसा, मूंग तथा उड़द उत्पादन के प्रमुख राज्य हैं। मूंग की खेती के लि‍ए भूमि की तैयारी मूंग की खेती के लिए दोमट एवं बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। भूमि में उचित जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चहिये। पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल या डिस्क हैरो चलाकर करनी चाहिए तथा फिर एक क्रॉस जुताई हैरो से एवं एक जुताई कल्टीवेटर से कर पाटा लगाकर भूमि समतल कर देनी चाहिए। मूंग की  बीज की बुवाई मूंग की बुवाई 15 जुलाई तक कर देनी चाहिए।  देरी से वर्षा होने पर शीघ्र पकने वाली किस्म की वुबाई 30 जुलाई तक की जा सकती है। स्वस्थ एवं अच्छी गुणवता वाला तथा उपचरित बीज बुवाई के काम लेने चाहिए। वुबाई कतरों में करनी चाहिए। कतरों के बीच दूरी 45 से.मी. तथा पौधों से पौधों की दूरी 10 से.मी. उचित है। मूंग फसल में खाद...

Agricultural work to be carried out in the month of April मूंग: इस समय मूंग की फसल में 10 दि‍न के अन्‍तराल पर सि‍ंचाई करें। मूंग की फलि‍यां यदि‍ हल्‍के भूरे रगं की हो गयी हैं तो समझें की फसल पक कर तैयार है। गेंहूॅ: अनाज के भण्‍डारण से पहले गेंहूॅ को अच्‍छी तरह सुखा लें जि‍ससे उसमें नमी बाकी ना रहे। सब्‍जि‍यॉं : भि‍ण्‍डी व टमाटर की फसल को छेदक सूंडी के प्रकोप से बचाने के लि‍ए 0.1 प्रति‍शत टोपास या कैलि‍क्‍सि‍न  (400- 500 मि‍.लि‍./ 1000 लि‍टर पानी के हि‍साब से) का छि‍डकाव खडी फसल में कर दें। फल मक्‍खी के नि‍यंत्रण के लि‍ए मि‍थाइल यूजि‍नोल के फेरोमोन ट्रैप का प्रयोग करें। कद्दू वर्गीय फसले: कद्दू वर्गीय फसलों में कीट नि‍यंत्रण के लि‍ए यलो स्‍टि‍की ट्रैप , 20 से 25 प्रति‍ हैक्‍टेयर के हि‍साब से लगाऐं। कद्दू एवं चप्‍पन कद्दू में फूल आने पर 1 प्रति‍शत यूरि‍या के घोल का छि‍डकाव करें। खरपतवार से बचाव के लि‍ए नि‍राई गुडाई करें। तापमान बढने पर आवश्‍यकतानुसार सि‍ंचाई करें। यदि‍ बेल बढ गयी है तो सहारा लगा दें एवं मचान बना दें।   फल वाली फसलें: आम के पेडों में इस समय फल गि‍रने लगता है। इसके बचाव के लि‍ए 20 पी.पी.एम. की दर से नैफथलीन एसि‍टि‍क एसि‍ड का छि‍डकाव करें। आम, अंगूर व अमरूद के बाग में जि‍कं, कॉपर, मैंगनीज, लौहा व बोरॉन के सूक्ष्‍म पोषक तत्‍वों का...

Agricultural work to be carried out in the month of February सब्‍जि‍यॉं : भि‍ण्‍डी की पूसा ए-4 कि‍स्‍म की बुआई फरवरी माह में कर दें। भि‍ण्‍डी बुवाई के 8-10 दि‍न बाद सफेद मक्‍खी व जैसि‍ड कीटो से बचाव के लि‍ए 1.5 मि‍ली मोनेाक्रोटोफास दवा प्रति 1 ‍लि‍टर पानी के हि‍साब से  या 4 मि‍ली इमकडक्‍लोप्रि‍ड दवा प्रति‍ 10 लीटर पानी की दर से का छि‍डकाव करें। भि‍ण्‍डी में उर्वरक की पूर्ति‍ के लि‍ए 15 टन प्रति‍ हैक्‍टेयर गोबर की खाद के साथ 100:50:50 की दर से NPK डालें। इस माह में लौकी की पूसा संतुष्‍टि‍, पूसा संदेश (गोल फल) , पूसा समृध्‍दि‍ एवं पूसा हाईबि‍ड 3 की बुवाई करें। खीरे की पूसा उदय , पूसा बरखा की बुवाई करें। चि‍कनी तोरई की पूसा स्‍नेध व धारी दार तोरई की पूसा नूतन कि‍स्‍मों की बुआई करे। करेले की पूसा वि‍शेष पूसा औषधि‍ एवं पूसा हाइब्रि‍ड 1,2 की बुआई करें। दलहनी फसल जायद में बुआई के लि‍ए मूंग की पूसा रतना, पूसा वि‍शाल का प्रयोग करें। मूंग में कीट नि‍यंत्रण के लि‍ए इमि‍डाक्‍लोप्रि‍ड 17.8 एसएल दवा की 3 मि‍ली मात्रा को प्रति‍1 कि‍लो बीज की दर से बीजोपचार करें।  मूंग में खरपतवार नि‍यंत्रण के लि‍ए बेसालीन नामक दवाई को 1 लि‍टर दवा प्रति‍ हैक्‍टेयर की दर से 600 लि‍टर पानी में घोलकर बुवाई से पहले छि‍डकाव करे दें। फल फसलें:   आम मे चुर्णि‍ल आसि‍ता रोग से...

Agricultural work to be carried out in the month of March सब्‍जि‍यॉं : कद्दू, चप्‍पन कद्दू, लौकी , करेला, तोरर्इ , खीरा, खरबूजा, तरबूज आदि‍ बेल वाली सब्‍जि‍यों की बुआई करें। पूसा की नि‍म्‍न प्रजाति‍यों का चयन करें। कद्दू:  पूसा वि‍श्‍वास, पूसा हाईब्रि‍ड 1 खीरा: पूसा उदय खरबूजा: पूसा मधुरस तरबूज: शुगर बेबी चप्‍पन कद्दू:  ऑस्‍ट्रेलि‍यन ग्रीन एवं पूसा अलंकार कद्दू वर्गीय फसलों में 100-50-50 कि‍ग्रा/ हैक्‍टेयर की दर से नाईट्रोजन-फॉस्‍फोरस-पोटेशि‍यम की मात्रा डालें। तथा 5-6 दि‍न के अंतराल पर सि‍चांई करते रहे। भि‍ण्‍डी में फली व तना भेदक कीट के नि‍यंत्रण के लि‍ए 2 मि‍ली इमि‍डाक्‍लोप्रि‍ड दवा को 10 लि‍टर पानी में घोलकर छि‍डकाव करें। भि‍ण्‍डी रस चुसने वाले कीडों के नि‍यंत्रण के लि‍ए ट्राइजोफॉस और डेल्‍टामेथ्रि‍न 1 मि‍ली दवा / लि‍टर पानी में घोलकर बारी बारी से 10-15 दि‍नों के अंतराल पर छि‍डकाव करें।   मूंग फसल खरपतवार नि‍यंत्रण  के लि‍ए 1 कि‍ग्रा प्रति‍ हैक्‍टेअर की दर से पेन्‍डामि‍थालि‍न दवा 500 लि‍टर पानी में घोलकर बुआई के एक दो दि‍न बाद छि‍डकाव करे। मूंग के लि‍ए 20:40:20 kg/ ha की दर से NPK की मात्रा को आधार खुराक के रूप में दें। मूंग में आवश्‍यकता अनुसार सि‍चांई करे। फल फसलें:   आम में चूणि‍ल आसि‍ता रोग की रोकथाम के लि‍ए डाइनोकेम दव 1 मि‍ली प्रति‍ 1 लि‍टर पानी में मि‍लाकर छि‍डकाव करें। आम में एथ्रेक्‍नोज (पत्‍ति‍यों व मंजरि‍यों पर काले धब्‍बे) की रोकथाम के लि‍ए 2 ग्राम कार्बेन्‍उाजि‍म...