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हरे चारे के लिए मोरिंगा (ड्रमस्टिक) एक स्थायी विकल्प  मोरिंगा एक ऐसा पेड़ है जो हरे चारे की कमी को पूरा करने में अहम योगदान दे सकता है। मोरिंगा को लोकप्रिय रूप से ‘ड्रमस्टिक’ के नाम से जाना जाता है क्योंकि इसकी फलियां ड्रमर द्वारा उपयोग की जाती हैं। इसे हिन्दी में सेहजन/सहजना कहते हैं। इस तेजी से बढ़ने वाले वृक्ष को पूरे उष्णकटिबंधीय इलाके में आसानी से स्थापित होने एवं बहुउद्देश्यीय उपयोग जैसे सब्जी, पशुधन चारा, दवा मूल्य, डाई, जल शुद्धिकरण आदि के कारण उगाया जाता है। मोरिंगा की पत्तियों में बीटा केरोटीन, प्रोटीन, विटामिन सी, केल्शियम, मैग्नीशियम एवं लोहा प्रचूर मात्रा में उपस्थित होता है। चूंकि मोरिंगा प्रोटीन में समृद्ध है इसलिए इसे दुधारू जानवरों के पूरक चारे के रूप् में उपयोग में लाया जा सकता है। पारंपरिक प्रोटीन पूरकों जैसे कि नारीयल खल, कपास खल, मूंगफली खल, तिल खल, सूरजमुखी की खल आदि की तुलना में इसकी पत्तियों में प्रोटीन अधिक मात्रा में पाया जाता है। इसके अलावा इसकी पत्तियों में अनेक फफूंदी प्रजातियों के खिलाफ एंटीऑक्सीडेंट और एंटीमाईक्रावियल गुण होते हैं। मोरिंगा को बाड़, घेरे एवं बहुकट चारे के रूप में उगाया जा सकता है। पोष्टिक महत्त्व- पोषक तत्त्व जैसे p+, M, ca और Mg पशुधन की शारीरिक, चपाचय और जैव रासायनिक, संतुलन प्रक्रियाओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पशु...

बाकला की उन्नत खेती बाकला (विसिया फाबा, एल) एक अल्प उपयोगी रबी मौसम की दलहनी फसल है जो फेवेसी कुल के अन्तर्गत  आती है। बाकला की खेती मुख्यतः मिश्र, सीरिया, चीन और अमेरिका की जाती है। भारत में इसकी खेती हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ जाती है। भारतवर्ष में प्रतिदिन  दाल की आवश्यकता प्रति आदमी 200 ग्राम है जबकि दालों की उपलब्धता 42.9 ग्राम प्रति व्यक्ति है। इस प्रकार बहुत सारे भारतीय लोग संतुलित आहार से वंचित रह जाते हैं और प्रोटीन की कुपोषणता का शिकार हो जाते हैं। बाकला  के बीजों को दाल के रूप में प्रयोग किया जाता है इसमें प्रचुर मान्ना में कार्बोहाडड्रेट एवं प्रोटीन पाया जाता है तथा इसके हरे फलियों को सब्जियों के रूप में व्यहार में लाया जाता है जो पौष्टिक होने के साथ रेशा का अच्छा श्रोत्र् है। सुखे हुए बीजों को बेसन बनाकर विभिन्न प्रकार के सब्जी भी बनाया जाता है। बाकला के पौधें को हरे चारे की तरह प्रयोग में लाया जाता है। दाल की बढ़ती माँग को देखते हुए किसान बाकला की खेती कर दाल की आर्पूिर्त कर सकते हैं इसमें 26 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है तथा इसकी खेती कम सिंचित वाले क्षेन्नों में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है। इस फसल की खेती ठंढे जलवायु में की जाती है...

सहजन (मोरिंगा ओलीफेरा): भेंड़ व बकरी के लिए पौष्टिक हरा चारा विकासशील देशों में जुगाली करने वाले छोटे पशु जैसे भेंड़ व बकरी की मांग बढ़ रही है। भारत  में भेड़ और बकरी की आबादी विश्व में तीसरे और दुसरे स्थान पर है। चरागाह भूमि के सिकुड़न और छोटे जुगाली करने वाले पशुओं की आबादी में वृद्धि, गुणवत्ता वाले हरे चारे की सीमित या अनुपलब्धता है जो इन पशुओं की उत्पादकता में बाधा उत्पन्न करने वाला एक प्रमुख कारण है। इसके अलावा, उपलब्ध चारा पोषक तत्वों में बहुत खराब है, इनमे रेशा की मात्रा सर्वाधिक होती है, जिससे इसका स्वैच्छिक सेवन और इसे पचाने की शक्ति कम हो जाती है जिसके परिणाम स्वरूप उत्पादन और प्रजनन प्रदर्शन में कमी आ जाती है। अनुपलब्धता अवधि के दौरान पशुओं की पोषक मांग को पूरा करने के लिए पेड़ और झाड़ियाँ चारे के रूप में एक आशाजनक वैकल्पिक संसाधन हो सकते हैं। हरे चारे की पूर्ति और जानवरों के लिए पोषण की मांग को पूरा करने के लिए सहजन के पौधे को चारे के तौर पर एक चमत्कारी पेड़ माना गया है। सहजन के पत्ते उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन, कैरोटीनॉयड, विटामिन सी और अन्य एंटीऑक्सिडेंट से समृद्ध होते हैं, चारे की गुणवत्ता को बढ़ाते हैं और पाचनशक्ति में सुधार करते हैं जो आगे चलकर छोटे पशुओं...

आधुनिक पशु आहार में अजोला का योगदान  राजस्थान की अर्थव्यस्था में पशुपालन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है तथा पशुपालन कृषि का एक महत्वपूर्ण भाग है। पशुपालन किसानो को विभिन्न प्रकार के रोजगार के अवसर प्रदान करता है  जिससे किसानो की आय में वर्द्धि होती है एवं उनकी अर्थवयवस्था में भी  सुधार होता है। अजोला पशुओ के लिये जैविक चारे का काम करता है जिससे उनके दूध में बढ़ोतरी होती है और दूध की गुणवत्ता में भी बढ़ोतरी होती है अजोला एक जलीय फर्न है, जो पानी में तेजी से  बढ़ती है एवं पानी की सतह पर तैरती रहती है धान की फसल में अजोला को भी नील हरित शैवाल की तरह हरी खाद के रूप में उगाया जा सकता है हरी खाद भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाती है  तथा फसल उत्पादन भी बढ़ाती है। एजोला की सतह पर नील हरित शैवाल सहजैविक के रूप में पाया जाता है। यह अद्वितीय पारस्परिक सहजैविक संबंध अजोला को एक अदभुद पौधे के रूप में विकसित करता है, जिसमें कि उच्च मात्रा में प्रोटीन उपलब्ध होता है। अजोला प्राकृतिक रूप से उष्ण व गर्म उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है। देखने में अजोला शैवाल से मिलती जुलती होती है और आमतौर पर उथले पानी में अथवा धान के खेत में पाई जाती है। अजोला के गुण:...

हाईब्रिड नेपियर घास से वर्षभर हरा चारा उत्पादन  नेपियर घास  का जन्म स्थान अफ्रीका का जिम्बाबे देश बताया जाता है | यह  बहुत ही तेज बढ़ने वाली पौष्टिक चारा घास है इसलिए इसे हाथी घास भी कहा जाता है | इसका  नेपियर नाम, कर्नल नेपियर (रोडेसियन कृषि विभाग, रोडेसिया) के नाम पर पड़ा | सबसे पहली नेपियर हाईब्रिड घास अफ्रीका में बनाई  गयी |  इसे चारे के  रूप में बहुत तेजी से अपनाया जा रहा है|  भारत में यह घास 1912 में आई | भारत में प्रथम बाजरा-नेपियर हाईब्रिड  घास कोइम्बतुर, तमिलनाडू (1953) में और फिर नयी दिल्ली में 1962 में बनाई गयी| कोइम्बतुर के हाईब्रिड  का नाम कोम्बू नेपियर और नयी  दिल्ली में बनाये गए पहले हाईब्रिड का नाम पूसा जियंत नेपियर रखा गया  | इससे पुरे वर्ष 6-8 कटाईयो द्वारा हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है | एक बार लगाने के बाद यह घास 3-4 वर्षो तक हरा चारा देती रहती है एवं कम उत्पादन की स्थिति में , इसे पुनः खोद कर लगा दिया जाता है पोषक तत्व:   संकर नेपियर घास में क्रुड प्रोटीन 8-10 प्रतिशत, क्रूड रेशा 30 प्रतिशत और  कैल्सियम 0.5 प्रतिशत, शुष्क पदार्थ 16-20 प्रतिशत, पाचक क्षमता 60 प्रतिशत और औक्सालेट 2.5 - 3 प्रतिशत तक होता है | इसके चारे को दलहनी चारे के साथ मिला...

तितली मटर की खेेेेती, चराहगाह विकास हेतु एक उत्तम विकल्प तितली मटर (क्लाइटोरिया टेर्नेटा एल.) एक बहुउद्देशीय दलहनी कुल का पौधा है इसका चारा पशु पोषण के हिसाब से अन्य दलहनी कुल के पौधों की अपेक्षा बहुत अधिक पौष्टिक, स्वादिष्ट एवं पाचनशील होता है। जिस कारण सभी प्रकार के पशुओं इसके चारे को बड़े चाव से खाते है। तितली मटर का तना बहुत पतला एवं मुलायम होता है, एवं इसमें पत्तियाँ चौड़ी एवं अधिक संख्या में होती है जिस कारण इसका चारा “हे” एवं “साइलेज” बनाने के लिए उपयुक्त माना गया है। अन्य दलहनी फसलों की तुलना में इसमें कटाई या चराई के बाद कम अवधि के भीतर ही पुनर्वृद्धि शुरू हों जाती है एवं इसमें चारा पैदावार की क्षमता अन्य दलहनी फसलों की तुलना में अधिक होती है। तितली मटर की खेती के लिए कम उपजाऊ भूमिया सबसे उपयुक्त मानी जाती है, जिस कारण इसे कम उत्पादक चरागाहों एवं बंजर भूमियों के विकास के लिए घास + दलहनी फसल मिश्रण के रूप में उगाते है। दलहनी कुल का पौधा होने के कारण यह मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ाता है एवं इसका पौधा जमीन पर बेल की तरह फैलता है जिससे यह मृदा संरक्षण का काम करता है। अतः यह उतम अपरदन अवरोधी फसल भी है। इसके अलावा तितली मटर को सजावटी पौधे के रूप...

खेजड़ी या सांगरी की खेती के साथ पशुपालन कर आय बढ़ाएं  राजस्थान का सतह क्षेत्र 342290 वर्ग किलोमीटर है जबकि थार 196150 वर्ग किलोमीटर तक फैला हुआ है। यह राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 60% से अधिक है। मानव आबादी 17.5 मिलियन है जिसमें से 77% ग्रामीण और 23% शहरी हैं। इस क्षेत्र में उत्पादन और जीवन समर्थन प्रणाली जैव-संबंधी और पर्यावरणीय सीमाओं से बाधित है । जैसे कि कम वार्षिक वर्षा (100-400 मिमी)  मानसून आने से पहले, बहुत अधिक तापमान (45 से 47 डिग्री तापमान) और औसतन बहुत तेज हवा और आँधियाँ जो कि 8 से 10 किलोमीटर की रफ़्तार से चलती है जिससे की स्वेद-वाष्पोतसर्जन (वार्षिक 1500 से 2000 मिमी) बहुत अधिक होता है । यहां की मृदा रेतीली, कंकरीली एवं लवणीय होती है जिसमे पोषक तत्व भी बहुत कम होते है और करीब 58 प्रतिशत रेत के टिल्ले है जिसमे खेती करना किसानों के लिए और भी मुश्किल होता है । राजस्थान मुख्यत: एक कृषि व पशुपालन प्रधान राज्य है, अल्प व अनियमित वर्षा के बावजूद, यहाँ लगभग सभी प्रकार की फ़सलें उगाई जाती हैं। रेगिस्तानी क्षेत्र में बाजरा, कोटा में ज्वार व उदयपुर में मुख्यत: मक्का उगाई जाती हैं। राज्य में गेहूँ व जौ का विस्तार अच्छा-ख़ासा (रेगिस्तानी क्षेत्रों को छोड़कर है। ऐसा ही दलहन (मूंग, मोठ, चना, मटर,...

चारा फसल के रूप मे शहतूत की खेती पशु आहार के पूरक के रूप में हरी पत्तियों की भूमिका का महत्व निर्विवाद है। विकासशील देशों में, अनाज फसलों के भूसे और घास को पशुओं को खिलाया जाता है, लेकिन इनके कम पोषक मान के कारण पशुओं अपनी उत्पादक क्षमता का पूर्ण प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं। इस कारण अधिकांश स्थानों पर पशुओं को चारे के साथ रातिब (दाना)भी खिलाया जाता है, परन्तु पशु आहार, रातिब से भी संतुलित नहीं हों पाता है। अत:इन परिस्तिथियों में शहतूत की पत्तियों को पशु आहार में मिलकर आहार की दक्षता में सुधार किया जा सकता है। बढ़ती मानव आबादी की भोजन आपूर्ति को पूरा करने के लिए कृषि योग्य भूमि पर खाद्य फसलों के उत्पादन के लिए दबाव बढ़ रहा है जिससे भविष्य के लिए चारा फसलों को लगाने के लिए कृषि योग्य भूमि कम उपलब्ध हो रहीं है। शहतूत का एक और लाभ यह भी है कि इसे इच्छा अनुसार पेड़ या झाड़ी के रूप में लगाया जा सकता है और साल में कई बार चारे के लिए काटा जा सकता है। भारत जैसे देशों में, जहां शहतूत मुख्य रूप से सेरीकल्चर (रेशम उत्पादन) के लिए उगाया जाता है, इसकी अतिरिक्त बची हुई पत्तियाँ एवं कोमल टहनियाँ को  गाय, भेस, भेड़ और बकरियों को खिलाए जाते हैं।...