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Current status and list of some important medicinal plants in Himachal Pradesh The importance of medicinal plants in traditional health care practices as well as in providing clues to new areas of research and biodiversity conservation is now widely acknowledged. Himachal Pradesh has a rich variety of medicinal plants, which are widely used. However, information on medicinal applications of plants in many Himalayan interior locations is limited. Keeping this in mind, the present study has been undertaken to explore some important medicinal plants and their enlightening resources in different areas of Himachal Pradesh. पौधे और पौधों से प्राप्त उत्पाद दुनिया भर में औषधि का प्रमुख स्रोत और अत्यधिक मूल्यवान संसाधन हैं। पादप घटक औषधि का एक आवश्यक घटक हैं और औषधि अनुसंधान के क्षेत्र में इन्हें नवीन यौगिकों का स्रोत माना जाता है। दुनिया भर में लगभग 35,000 से 70,000 पौधों की प्रजातियाँ हैं जिनका उपयोग चिकित्सा प्रयोजनों के लिए किया गया है, जिनमें से 6,500 से अधिक प्रजातियाँ एशिया में पाई जाती हैं। हिमालय क्षेत्र बड़ी संख्या में औषधीय और सुगंधित पौधों (एमएपी) का भंडार है और इसे वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट के रूप में मान्यता दी गई है, जहां पारिस्थितिक, पादप-भौगोलिक और विकासवादी चर उच्च प्रजातियों की विविधता को प्रोत्साहित करते हैं। यह भारत के 18% से अधिक हिस्से को कवर...

अश्वगंधा उगायें और अधि‍क लाभ पाऐं भारत में अश्वगंधा अथवा असगंध जिसका वानस्पतिक नाम वीथानीयां सोमनीफेरा है, यह एक महत्वपूर्ण औषधीय फसल के साथ-साथ नकदी फसल भी है। अश्वगंधा आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में प्रयोग किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण पौधा है। सभी ग्रथों में अश्वगंधा के महत्ता के वर्णन को दर्शाया गया है। इसकी ताजा पत्तियों तथा जड़ों में घोंड़े की मूत्र की गंध आने के कारण ही इसका नाम अश्वगंधा पड़ा। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में अश्वगंधा की माँग इसके अधिक गुणकारी होने के कारण बढ़ती जा रही है। अश्वगंधा एक औषधि है। इसे बलवर्धक, स्फूर्तिदायक, स्मरणशक्ति वर्धक, तनाव रोधी, कैंसररोधी माना जाता है। इसकी जड़, पत्ती, फल और बीज औषधि के रूप में उपयोग किया जाता है। यह पौधा ठंडे प्रदेशो को छोड़कर अन्य सभी भागों में पाया जाता है।  संस्कृत नाम: अष्वगंधा (Ashwagandha), हिन्दी नाम :  असगंध (Asgandh), अंग्रेजी : विन्टरचेरी (Winter Cherry), इंडियन गिनसेंग (Indian ginseng)  अश्‍वगंधा उगाने के लि‍ए उपयुक्त जलवायु यह पछेती खरीफ फसल है। यह उष्णकटिबंधी और समशीतोष्ण जलवायु की फसल है। अशवगंधा को शुष्क मौसम की आवश्यकता होती है। बारिश के महीने के अंतिम दिनों में इसे बोया जाता है। फसल के विकास के लिए शुष्क मौसम अच्छा रहताहै। जिन स्थान में वर्षा 660-750 मिमी की होती है वे स्थान फसल के विकास के लिए उपयुक्त होते है।  वार्षिक वर्षा...

Improved agronomical techniques of Ashwagandha or Winter cherry cultivation अश्वगंधा (withania somnifera) की पौधा सीधा 1.25 मीटर उॅचा होता हैं तथा इसके तने में बारीक रोम पाये जाते हैं। इसके पत्तिायों का आकार अण्डाकार एवं पत्तिायों में रोम पाये जाते है जिसे छूने से मुलायम महसूस होता है। फूल छोटे हरे या हल्के पीले रंग के तथा फल छोटे गोले नारंगी या लाल रंग के होते है। जड़ो को मसलकर सूॅघने से अश्व (घोड़े) के पसीने एवं मूत्र जैसी गंध आती है। जड़ों का रंग सफेद सा भूरा होता हैं। इसका संस्कृत नाम: अष्वगंधा, हिन्दी नाम :  असगंध, अंग्रेजी : विन्टरचेरी (Winter cherry), इंडियनगिनसेंग  (Indian ginseng)  हैैै। । भोगौलिक वितरण: अशवगंधा  का वितरण अफ्रीका, भूमध्यसागरीय से भारत एवं श्रीलंका में पहुॅचा है। भारत के हिमालय पहाड़ के तटों में 1000 मीटर की उंचाई तक पाई जाती है। भारत मे हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, हरयाणा, उत्तारप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र एवं मध्यप्रदेश आदि क्षेत्रों में पाये जात है। अश्वगंधा के लि‍ए जलवायू: अश्वगंधा को उष्णकटिबंधी और समशीतोष्ण जलवायु वालें क्षेत्रो में उगाया जाता है और साथ ही शुष्क मौसम की आवश्यकता होती है। वार्षिक वर्षा 600 से 750 मिलीलीटर में अश्वगंधा की वृद्वि अच्छी से होती है बीच में 1-2 बार ठण्ड में बर्षा होने से अश्वगंधा की जड़ो की पूर्ण विकास होता है। अश्वगंधा की खेती के लिए रेतीली दोमट से हल्की...

Cultivation of Ashwagandha (Withania somnifera) to get more income अशवगंधा (असगंधा) जिसे अंग्रेजी में विन्टर चैरी कहा जाता है तथा जिसका वैज्ञानिक नाम विदानिया सोमनिफेरा है, भारत में उगाई जाने वाली महत्वपूर्ण औषधीय फसल है जिसमें कई तरह के एल्केलाइड्स पाये जाते है। अशवगंधा को शक्तिवर्धक माना जाता है। भारतवर्ष में यह पौधा मुख्यतया गुंजरात, मध्यप्रदेष, राजस्थान, पष्चिमी उत्तरप्रदेष, पंजाब, हरियाणा के मैदान, महाराष्ट्र, पष्चिमी बंगाल, कर्नाटक, केरल एवं हिमालय में 1500 मीटर की ऊंचाई तक पाया जाता हैं। मध्यप्रदेष में इस पौधे की विधिवत् खेती मन्दसौर जिले की भानपुर, मनासा एवं जावद तथा नीमच जिले में लगभग 3000 हेक्टर क्षेत्रफल में की जा रही है। भारत के अलावा यह औषधीय पौधा स्पेन, फेनारी आइलैण्ड, मोरक्को, जार्डन, मिस्त्र, पूर्वी अफ्रीका, बलुचिस्तान (पाकिस्तान) और श्रीलंका में भी पाया जाता है।  अशवगंधा के औषधीय गुण एवं उपयोग अशवगंधा के पौधे 3 से 6 फीट तक ऊंचे होते हैं इसके ताजे पत्तों तथा इसकी जड़ को मसल कर सूंघने से उनमें घोडें के मूत्र जेसे गंघ आती है। संभवतया इसी वजह से इसका नाम अशवगंधा पड़ा होगा। इसकी जड़ मूली के जैसी परन्तु उससे काफी पतली (पेन्सील की मोटाई से लेकर 2.5 से 3.75 सेमी. मोटी) होती है तथा 30 से 45 से.मी. तक लम्बी होती है। यद्यपि यह जंगली रूप में भी मिलती हैं परन्तु उगाई गई अशवगंध ज्यादा अच्छी होती है। अशवगंघा...