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Management of degradation in groundwater level मिट्टी में जरूरत के मुताबिक नमी का होना बहुत जरूरी है । खेत की तैयारी से लेकर फसल की कटाई तक मिट्टी में एक निश्चित नमी रहनी चाहिए । कितनी नमी हो यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सा कार्य करना है और मिट्टी की बनावट कैसी है । जैसे बलुवाही मिट्टी में कम नमी रहने से भी जुताई की जा सकती है, लेकिन चिकनी मिट्टी में एक निश्चित नमी होने से ही जुताई हो सकती है । इसी तरह अलग-अलग  फसलों के लिए अलग-अलग  नमी रहनी चाहिए । जैसे -धान के लिए अधिक नमी की जरूरत है लेकिन बाजरा, कौनी वगैरह कम नमी में भी उपजाई जा सकती है| पौधों के लिए आवश्यक नमी का होना बहुत ही जरूरी है । क्योंकि नमी के चलते ही पौधों की जड़ें फैलती हैं और पौधे नमी के साथ ही मिट्टी से अपना भोजन लेते हैं । साथ ही मिट्टी के सूक्ष्म जीवाणु भी मिट्टी में हवा और पानी के एक निश्चित अनुपात में ही अपना काम कर पाते हैं और पौधों के लिए भोजन तैयार करते हैं । पठारी क्षेत्रों में सिचाई की क्षमता काफी कम है । यहाँ खरीफ में केवल सात प्रतिशत जमीन में ही सिंचाई हो सकती है, जबकि रबी के मौसम में...

Why should farmers adopt drip irrigation? ड्रिप सिंचाई व्यवस्था सिंचाई की एक उन्नत तकनीक है जो पानी की बचत करता है । इस विधि में पानी बूंद-बूंद करके पौधे या पेड़ की जड़ में सीधा पहुँचाया जाता है जिससे पौधे की जड़े पानी को धीरे-धीरे सोखते रहते है। इस विधि में पानी के साथ उर्वरको को भी सीधा पौध जड़ क्षेत्र में पहुँचाया जाता है जिसे फ्रटीगेसन कहते है । फ्रटीगेसन विधि से उर्वरक लगाने में कोई अतिरिक्त मानव श्रम का उपयोग नही होता है। अत% यह एक तकनीक है जिसकी मदद से कृषक पानी व श्रम की बचत तथा उर्वरक उपयोग दक्षता में सुधार कर सकता है।   ड्रिप सिंचाई कम पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों के लिए एक सफल तकनीक है। जिसमे स्थाई या अस्थाई ड्रिपर लाइन जो पौधे की जड़ के पास या निचे स्तिथ होते है । आज के परिद्रश्य में पानी की कमी से हर देश, हर राज्य, हर क्षेत्र जूझ रहा है तथा समय के साथ यह समस्या विकराल होती जा रही है। इसलिए जहाँ भी पानी का उपयोग होता है। वहाँ हमे जितना भी संभव हो इसकी बचत करनी चाहिए । पानी का अत्यधिक उपयोग कृषि में ही होता है। इसलिए इसकी सबसे अधिक बचत भी यहीं ही संभव है। और हमें इसे बचाना चाहिए । इस मुहीम...

Why farmers should adopt drip irrigation  ड्रिप सिंचाई क्या है ? यह सिंचाई का एक तरीका है जो पानी की बचत करता है और यह पौधे या पेड़ की जड़ में पानी के धीरे-धीरे सोखने में (चाहे वो पौधे के ऊपर वाली मिट्टी हो या फिर जड़ हो) मदद कर खाद और उर्वरक के अधिकतम उपयोगी इस्तेमाल में मदद करता है। ड्रिप सिंचाई वॉल्व्स, पाइप, ट्यूब्स और एमीटर्स से जुड़े एक नेटवर्क की मदद से कार्य करता है। यह काम संकरे ट्यूब से जोड़कर किया जाता है जो पौधे या पेड़ की जड़ तक पानी को सीधे पहुंचाता है। ड्रिप सिंचाई व्यवस्था में माइक्रो-स्प्रे हेड्स तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह मशीन एमीटर्स के मुकाबले पानी को छोटे से क्षेत्र में फैलाता है। आमतौर पर इस तरह के स्प्रे हेड का इस्तेमाल लंबे-चौड़े जड़ वाली शराब का उत्पादन की जाने वाली फसलों और पेड़ों के लिए किया जाता है जिसके जड़ें व्यापक रूप से फैली होती हैं। कम पानी की उपल्बधता या रीसाइकिल्ड या पुनरावर्तित पानी इस्तेमाल में सब सरफेस (उप सतह) ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल किया जाता है। इसमे स्थाई या अस्थाई गड़े हुए ड्रिपर लाइन या ड्रिप टेप जो पौधे की जड़ के पास या नीचे स्थित होते हैं उसका इस्तेमाल किया जाता है। अनुकूल ड्रिप सिंचाई व्यवस्था का पता...

Water conservation and management techniques in fruits cultivation  खेती में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता धीरे - धीरे कम होती जा रही है, इसलिए यह अत्यावश्यक हो गया है की सिंचाई के लिए जल का उपयोग बहुत ही सोच समझकर एवं बुधिमतापुर्वक किया जाए । अभी भी किसान सिंचाई की पुरानी विधियां ही उपयोग में ला रहे है जिनकी सिंचाई जल प्रयोग की दक्षता बहुत कम होती है । इसलिए हमें सिंचाई की नयी तकनीको को अपनाना चाहिए जिसमें जल प्रयोग की दक्षता ज्यादा हो तथा हम जल संरक्षण की तारफ कदम बढा  सकें। जल संरक्षण के साथ साथ हमें उसके प्रबंधन पर भी ध्यान देना चाहिए क्योंकि जल प्रकाश- संश्लेशन एवं पौधों के विकास के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है । इसकी कमी फलों के उत्पादन  और हमारे मुनाफे को भी कम कर देगी  फल फसल में सिचाई का उचित समय सिंचाई की आवश्यकता फलों के रोपण विधि पर निर्भर करती है I खेतो में सीधे बीज को डालकर अथवा नर्सरी में तैयार  पौधों को पुन: खेतो में रोपाई की जाती है Iबीजो के प्रस्फुटन के समय खेतो की मिट्टी में उचित नमी होनी चाहिए अन्यथा बीजों के विकास बाधित हो जाएगा I जब हम पौधों को नर्सरी से लाकर खेतो में लगाते है उससमय खेतों में पानी का जमाव होना चाहिए जिससे...

Optimal planting geometry and fertilizer application method for drip irrigated vegetable crops फसलों की सिंचाई की विधियों में टपक सिंचाई पध्दति सर्वाधिक कुशल विधि है जिसमें जल का 80-90 प्रतिशत कुशल उपयोग होता है। इस पध्दति से सभी प्रकार की भूमि में कम समय एवं कम जल में सिंचाई की जा सकती  है। टपक सिंचाई पध्दति द्वारा सिंचाई में पौधों के सीमित नम क्षेत्र के कारण रोग की सम्भावना कम होती है तथा फसलों की पंक्तियों में खर-पतवार नहीं उग पाते हैं। सिंचाई की इस विधि का उपयोग पूरे विश्व में तेजी से बढ़ रहा है। सीमित जल संसाधनों और दिनों-दिन बढ़ती हुई जलावश्यकता के कारण टपक सिंचाई तकनीक सर्वाधिक उपयुक्तहै। टपक तंत्र एक अधिक आवृति वाला ऐसा सिंचाई तंत्र है जिससे जल को पौधों के मूल क्षेत्रजड़ाें के आसपास दिया जाता है। टपक सिंचाई पध्दति द्वारा सिंचाई में पौधों को आवश्यकतानुसर जल दिया जा सकता हैं। टपक सिंचाई पध्दति वाली फसलों के उत्पादन में पर्याप्त वृध्दि (20-80%) एवं गुणवत्ताा में सुधार देखा गया है। टपक सिंचाई वाली फसलों में 30-40 प्रतिशत तक उर्वरक की बचत, 80-90 प्रतिशत तक जल की बचत के साथ उत्पादन में 20-80 प्रतिशत तक की वृध्दि हो सकती है। इसके अतिरिक्त खरपतवारों में कमी, उर्जा की खपत में बचत और उत्पाद की गुणवता में बढ़ोत्तारी भी होती है। टपक सिंचाई पध्दति टपक सिंचाई...

Adopt Shower (Sprinkler) irrigation techniques - get bumper crop बौछारी  या स्प्रिंकलर विधि से सिंचाई में पानी को छिड़काव के रूप में दिया जाता है। जिससे पानी पौधों पर वर्षा की बूंदों जैसी  पड़ती हैं। पानी की बचत और उत्पादन की अधिक पैदावार के लिहाज से बौछारी सिंचाई प्रणाली अति उपयोगी और वैज्ञानिक तरीका मानी गई है। किसानों में सूक्ष्म सिंचाई के प्रति  काफी उत्साह देखी गई है। इस सिंचाई  तकनीक से कई फायदे हैं। हमारे यहां बौछारी  या स्प्रिंकलर और बूंद.बूंद या ड्रि‍प सिंचाई पर ज्यादा ध्यान दिया जाए तो न केवल उत्पादन बढ़ाया जा सकता हैए बल्कि  कृषि की उन्नत तकनीक भी विकसित की जा सकती है। असमतल भूमि  और ऊंचाई वाले क्षेत्र में भी बौछारी प्रणाली से खेती की जा सकती है। इस तकनीक से श्रम की भी बचत होती है। बौछारी से पानी सीधी पौधों पर ही गिरता है। ऎसे में खरपतवार पर नियंत्रण रहता है। बीमारियों और कीड़े.मकोड़ों की संभावनाएं कम रहती हैं। कृषि में इस तकनीक के उपयोग से फसल पैदावार एवं गुणवत्ता में वृद्धि के साथ उत्पादन लागत में भी कमी आएगी। बौछारी सिंचाई प्रणाली के मुख्य घटक: बौछारी सिंचाई पद्धति में मुख्य भाग पम्प, मुख्य नली, बगल की नली, पानी उठाने वाली नली एवं पानी छिड़काव वाला फुहारा होता है। बौछारी सिंचाई प्रणाली की क्रिया विधि: बौछारी सिंचाई में नली...

शीत शुष्क कृषि के लिए एक संभावित माइक्रो सिंचाई प्रणाली - ड्रिप सिंचाई Agriculture sector is considered as the back bone of Indian economy contributing directly and indirectly to the growth and development of our country. Since independence our country has attained significant achievements standing self sufficient in food grain production. The achievement is because of the scientific technological interventions and the utilization of the available natural resources which were in abundance. Hence Irrigation water availability predominantly being the major contributing factor in this regard.With the advancement in the agriculture sector, it now becomes imperative to utilize the available natural wealth of resources in a manageable way for sustaining agricultural production and productivity. Efficient utilization of water resources forms the basis of survival of the ever increasing population of our country.Ladakh region of India is a cold arid desert placed on high altitudes with scarce water resources, high evapo-transpirational losses, harsh dry winds, and totality of climatic conditions harsh and tough, hindering the agricultural advancement(Fig.1). The annual precipitation is between 100 to 150 mm, quite inadequate to meet the average moisture requirements of the crop plants. Thus supplementary irrigation becomes essential to raise the food crops. The only source of available irrigation water available is the glaciers placed on high altitudes...

Solar Power Drip Irrigation System - Best way to save energy & water भारत एक कृषि प्रधान देश है हमारे देश की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि गतिविधियों से जुडी हुई है। कृषि उत्पादन में निवेश के रूप में ऊर्जा की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। सामान्यतया: ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि कार्यों में पंप सेट को चलाने के लिए डिजल का उपयोग किया जाता है जो कि आज कल प्रतिदिन महंगा हो रहा है तथा उसके धुंए और ध्वनि से जैविक पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । दूसरी ओर हम देंखे तो पायेंगे कि किसान अभी भी सिंचाई कि परम्परागत (बाढ़ सिचाई) विधियों का उपयोग कर रहे है जिससे पानी की  क्षति अधिक व सिंचाई  की दक्षता भी कम रहती है । आज हमारे देश की 22 प्रतिशत उर्जा (Non-Renewable Energy Consumption) एवं 80 प्रतिशत पानी का उपयोग अकेले कृषि क्षेत्र में होता है । हमारे देश में इस ऊर्जा एवं पानी के अपव्यय को रोकने की बहुत ज्यादा आवश्यकता  है । इन दोनों के अपव्यय को रोकने की सबसे अच्छी प्रणाली "सौर ऊर्जा संचालित ड्रिप सिंचाई प्रणाली" है । इस प्रणाली के प्रयोग से हम ऊर्जा के साथ-साथ पानी के अपव्यय  को भी कम कर सकते है । सौर ऊर्जा संचालित ड्रिप सिंचाई दो प्रणालियों, अर्थात सौर ऊर्जा चालित पंप और ड्रिप सिंचाई प्रणाली का...