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धान के खेत में मछली पालन यानी Rice Fish Farming खेती का ऐसा तरीका है जिसमें किसान धान की फसल के साथ उसी खेत के पानी का इस्तेमाल मछली पालन के लिए भी करता है। सही खेत और सही प्रबंधन हो तो एक ही जमीन से धान के साथ मछली का अतिरिक्त उत्पादन लिया जा सकता है। इसी वजह से पिछले कुछ वर्षों में Rice Fish Farming, Paddy Fish Farming और Integrated Rice-Fish Farming जैसे तरीकों पर किसानों और कृषि संस्थानों का ध्यान बढ़ा है। यह कोई नया विचार भी नहीं है। भारत में paddy-cum-fish culture पर वैज्ञानिक स्तर पर कई दशकों से काम किया जा रहा है। ICAR के दस्तावेजों में paddy-cum-fish culture के package of practices के विकास का उल्लेख 1970 से मिलता है। लेकिन एक बात शुरुआत में साफ समझ लेना जरूरी है। धान के खेत में मछली डालने का मतलब यह नहीं है कि हर किसान की कमाई अपने आप दोगुनी हो जाएगी। फायदा खेत में पानी की उपलब्धता, मछली की प्रजाति, stocking, मछली की survival और growth, चारा, श्रम, धान की खेती की लागत और स्थानीय बाजार भाव पर निर्भर करता है। सीधी बात: Rice-Fish Farming का फायदा यह है कि किसान एक ही खेत और पानी से एक से ज्यादा उत्पादन लेने की कोशिश करता है।...

Importance of fish farming in rural areas For the social and economic upliftment of rural areas, it is necessary to make good use of all available resources. At present, fish farming has been established as a profitable employment in other agriculture related businesses. Protein-rich food can be obtained in the form of fish by utilizing the water of ponds and ponds. Importance of fish farming in rural areas हमारे देश की अधिकतम जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों से है, जो कि अपनी आजीविका कृषि आधारित कार्यों से प्राप्त करती है। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी एवं कुपो षण आदि अनेक तरह की परेशानियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में देखी जा सकती है। केवल कृषि से समस्त ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक एवं आर्थिक परेशानियों को दूर किया जाना सम्भव नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान हेतु सभी तरह के उपलब्ध संसाधनों का सदुपयोग आवश्यक है। वर्तमान समय में कृषि संबंधित अन्य व्यवसायों में मछली पालन एक लाभप्रद रोजगार के रूप में स्थापित हुआ है। पोखरों तालाबों के पानी का सदुपयोग कर प्रोटीन युक्त भोजन, मछली के रूप में प्राप्त किया जा सकता है। देश में लगभग हर गाँव में तालाब/ पोखर होते है। जिनका सदुपयोग मछली पालन के लिये किया जा सकता है। इनका स्वामित्व ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत, नगर निगम एवं जिला पंचायत के पास होता है। ये...

कार्प मछली बीज बनाना Katla, Rohu, Mrigal, Silver Carp, Grass Carp and Common Carp are called Major Carp. Carp seed farming is generally divided into two life phases called nursery and rearing phase. कार्प मछली बीज बनाना कतला, रोहू, मृगल, सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प और कॉमन कार्प को मेजर कार्प कहा जाता है । कार्प के बीज पालन में आम तौर पर दो जीवन चरणों में बाटा गया है  जिसे नर्सरी (Nursery) और पालन चरण (Rearing phase) कहा जाता है।  नर्सरी पालन (Nursery Rearing): स्पॉन पालन (Spawn Rearing) के लिए 0.5 से 1.0 एकड़ क्षेत्र वाली भूमि और 1 मीटर पानी की गहराई वाले तालाब को आदर्श माना जाता है। मीटर पानी की गहराई के साथ 50-100 मीटर2 की बड़ी कंक्रीट टैंक नर्सरी भी उच्च घनत्व के पालन के लिए मुख्यतः  उपयोग किया जाता  है। सूखे तालाब में 30 से.मी. की गहराई तक पानी डालने के बाद 12 क्विंटल की दर से कच्ची गाय के गोबर से खाद दी जाती है । 2 दिनों के बाद, जल स्तर 1 मीटर तक बढ़ दिया जाता है। बारहमासी तालाब (Perennial pond) के मामले में जलीय खरपतवारों का उन्मूलन (Eradication) पहले किया जाना चाहिए। चूंकि नर्सरी पालन के लिए छोटे तालाबों का उपयोग किया जाता है, इसलिए खरपतवारों को मैन्युअल रूप से मिटाया जा सकता है ताकि शाकनाशियों (Herbicides) के उपयोग...

Biofloc technology of Fish farming in water tank निरंतर बढती आबादी के कारण देश में मछली की खपत दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। जिसको ध्यानमें रखते हुए मत्स्य पालक उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नयी तकनीक को अपना रहें है। इसके लिए कम पानीऔर कम खर्च में अधिक से अधिक मछली उत्पादन करने हेतु बायोफ्लॉक तकनीक का विकास किया गया है। बायोफ्लॉक तकनीक एक आधुनिक व वैज्ञानिक तरीका है जिसका प्रदर्शन एवं प्रचार मत्स्य विज्ञान विभाग, नारायण कृषि संस्थान, गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय, जमुहार, सासाराम, रोहतास, बिहार के द्वारा प्रतिपादित किया जाता है।  मछली पालन के इस तकनीक को अपनाते हुए मत्स्य पालक न सिर्फ नीली क्रांति के अग्रदूत बनेंगे बल्कि बेरोजगारी से भी मुक्ति मिलेगी। बायोफ्लॉक तकनीक के माध्यम से किसान बिना तालाब की खुदाई किए एक टैंक में मछली पालन कर सकेंगे। चित्र 1 - बायोफ्लॉक यूनिट को देखते मत्स्य विज्ञान विभाग, नारायण कृषि संस्थान, कल्याणपुर, सासाराम, बिहार के छात्र -छात्राऐं। चित्र 2- बायोफ्लॉक टैंक बायोफ्लॉक तकनी की क्या है यह कम लागत और सीमित जगह में अधिक उत्पादन देने वाली तकनीकी है। इस तकनीकी में टैंक सिस्टम में उपकारी बैक्टीरिया के द्वारा मछलियों की विष्ठाऔरअतरिक्त भोजन को प्रोटीन सेल में परिवर्तित कर मछलियों के भोज्य पदार्थ के रूप में रूपांतरित कर दिया जाता है। बायोफ्लोक्स, शैवाल, बैक्टीरिया, प्रोटोजोअन और कार्बनिक पदार्थों जैसे- मछली की विष्ठा...