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पशुधन उत्पादन में गैर-पारंपरिक चारे के रूप में मक्के की खेती Maize (Zea mays) is one of the most widely cultivated cereal crops worldwide, primarily used for human consumption and industrial purposes. However, its suitability as a feedstuff for livestock has gained attention due to its nutritional richness, affordability, and availability.  This paper explores maize cultivation techniques, its nutritional composition, and its diverse applications as a feed resource for various livestock species. Additionally, it discusses the benefits, challenges, and prospects associated with integrating maize into livestock diets to enhance animal nutrition and promote sustainable farming practices. This paper aims to provide insights into maize cultivation, its nutritional attributes, and its utilization as a non-conventional feedstuff in livestock production. Cultivation of Maize: Maize is a warm-season annual crop that thrives in diverse agro-climatic conditions, making it adaptable to various regions across the globe. It requires well-drained soils, ample sunlight, and adequate moisture for optimal growth and development. Maize cultivation involves selecting suitable varieties, proper land preparation, planting at the appropriate time, and implementing effective pest and weed management practices. Modern agricultural practices, including hybridization and biotechnology, have significantly enhanced maize yields and quality, ensuring a steady supply for both human and animal consumption. Nutritional composition of Maize: Maize is a rich source of carbohydrates, providing energy for livestock metabolism and...

बाकला की उन्नत खेती बाकला (विसिया फाबा, एल) एक अल्प उपयोगी रबी मौसम की दलहनी फसल है जो फेवेसी कुल के अन्तर्गत  आती है। बाकला की खेती मुख्यतः मिश्र, सीरिया, चीन और अमेरिका की जाती है। भारत में इसकी खेती हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ जाती है। भारतवर्ष में प्रतिदिन  दाल की आवश्यकता प्रति आदमी 200 ग्राम है जबकि दालों की उपलब्धता 42.9 ग्राम प्रति व्यक्ति है। इस प्रकार बहुत सारे भारतीय लोग संतुलित आहार से वंचित रह जाते हैं और प्रोटीन की कुपोषणता का शिकार हो जाते हैं। बाकला  के बीजों को दाल के रूप में प्रयोग किया जाता है इसमें प्रचुर मान्ना में कार्बोहाडड्रेट एवं प्रोटीन पाया जाता है तथा इसके हरे फलियों को सब्जियों के रूप में व्यहार में लाया जाता है जो पौष्टिक होने के साथ रेशा का अच्छा श्रोत्र् है। सुखे हुए बीजों को बेसन बनाकर विभिन्न प्रकार के सब्जी भी बनाया जाता है। बाकला के पौधें को हरे चारे की तरह प्रयोग में लाया जाता है। दाल की बढ़ती माँग को देखते हुए किसान बाकला की खेती कर दाल की आर्पूिर्त कर सकते हैं इसमें 26 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है तथा इसकी खेती कम सिंचित वाले क्षेन्नों में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है। इस फसल की खेती ठंढे जलवायु में की जाती है...

चारा फसल जायद बाजरा की वैज्ञानिक खेती बाजरा शुष्क एवं अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों में उगाई जाने वाली प्रमुख अनाजवर्गीय फसल है| इसकी खेती गर्मी और वर्षा ऋतू दोनों में की जाती है| यह अन्य चारा फसलो की अपेक्षा शीघ्रता से बढने वाली रोग निरोधक तथा अधिक कल्ले फूटने वाली चारे की फसल है। हरे चारे के लिए इससे कई कटाई ली जा सकती है| यह घनी पत्तीदार व सुकोमल होती है तथा इसका चारा स्वादिष्ट व पौष्टिक होता है| इसके चारे में प्रूसिक अम्ल नहीं होता है तथा ओक्सेलिक अम्ल भी कम होता है, इस वजह से गर्मियों में पशुओ के लिए यह अधिक सुरक्षित चारा रहता है| खरीफ के अलावा जायद में भी बाजरा की खेती सफलतापूर्व की जाने लगी है, क्योंकि जायद में बाजरा के लिए अनुकूल वातावरण जहॉ इसके दाने के रूप में उगाने के लिए प्रोत्साहित करता है वहीं चारे के लिए भी इसकी खेती की जा रही है। यह अकेले अथवा दलहनी फसलों के साथ मिलाकर इसकी खेती की जाती है। बाजरे की फसल से अधिक व गुणवत्तापूर्ण चारा उत्पादन हेतु किसान भाइयो को निम्न पहलू ध्यान में रखने चाहिए- भूमि का चुनाव व तैयारी: बलुई दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए अच्छी है। यह हल्की भूमि से भी भली प्रकार पैदा हो जाती है। भली भॉति समतल व...

ग्वार की वैज्ञानिक खेती तकनीक दलहन फसलों में ग्वार (क्लस्टर बीन) का विशेष योगदान है। यह गोंद (गम) और अन्य उत्पादों के लिए एक महत्वपूर्ण औद्योगिक फसल है। ग्वांर का उपयोग हरे चारे एंव इसकी कच्ची फलियों को सब्जी के रूप में किया जाता है। इसकी खेती राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश में की जाती है। भारत में राजस्थान ग्वार के क्षेत्र और उत्पादन में पहले स्थान पर है। ग्वार से ग्वार गम का उत्पादन होता है और जिसका निर्यात किया जाता है। इसके बीजों में 18 प्रतिशत प्रोटीन, 32 प्रतिशत फाइबर और भ्रूणपोष में लगभग 30-33 प्रतिशत गम होता है । खेत का चुनाव एंव तैयारी ग्वार की खेती मध्यम से हल्की बनावट वाली मिट्टी में सफलतापूर्वक की जा सकती है जिसका पीएच 7.0 से 8.5 तक का होता है। पानी भराव की स्थिति फसल की वृद्धि को प्रभावित करती है। भारी दोमट मिट्टी खेती के लिए उपयुक्त नहीं हैं। साथ ही उच्च नमी वाले क्षेत्र में फसल की वृद्धि प्रभावित होती है। सबसे पहले एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए तथा बाद में दो जुताइयाँ देशी हल से करनी चाहिए। ग्वार उगाने के लिए जलवायु ग्वार एक उष्णकटिबंधीय पौधा है। इसके लिए गर्म मौसम की आवश्यकता होती है। फसल को बुवाई के समय उचित अंकुरण के लिए 30 से 350 सेल्सियस...

चारा फसलों पर जैव उर्वरक का उपयोग पिछले ५० सालो में कृषि क्षेत्र में फसलों के लिए रासायनिक उर्वरको का अधिक उपयोग किया गया है जिसके प्रभाव से मिटटी की उपजाऊ क्षमता में कमी, पौधों में पोषक तत्वों की ज्यादा मात्रा, पौधों में रोग तथा किटो का आना , फलिय पौधों में नोडूलेसन की कमी, मिटटी के जीवाणुओं में कमी और प्रदुषण हुआ है| जिसके कारण किसानो को बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है | फसल की उत्पादकता कम हो गई है जिससे कि‍सानों की आमदनी कम हो गयी| ऐसी स्थिति में किसानो ने रासायनिक उर्वरक के बदले जैव उर्वरक का प्रयोग करना शुरू किया जो उनकी आशाओं पर खड़े उतरे है | जैविक उर्वरक के उपयोग के कारण रासायनिक उर्वरको के हानिकारक प्रभाव में कमी आई है तथा पर्यावरण में प्रदुषण भी कम हुआ है| किसान आज जैव उर्वरक का प्रयोग चारे की फसलों में भी करने लगे है जिससे किसानो को अधिक लाभ हुआ है| सण1895 में सबसे पहली जैव उर्वरक “नाइट्रैगिन’ की खोज हुई जिसे नोबे और हेल्टनर नामक वैज्ञानिकों ने खोजा था | इसके बाद एजोटोबैक्टर की खोज और फिर नीली-हरी शैवाल और अन्य तरह के जैव उर्वरक की खोज हुई |भारत में सबसे पहले जैव उर्वरकों पर अध्यन डॉ. डी.एन. जोशी ने किया था |जैव उर्वरकों का...

राजस्थान में ग्रीष्मकालीन बाजरे की खेती खरीफ के अलावा जायद में भी बाजरा की खेती सफलतापूर्वक की जाने लगी है, क्योंकि जायद में बाजरा के लिए अनुकूल वातावरण जहॉ इसके दाने के रूप में उगाने के लिए प्रोत्साहित करता है वहीं चारे के लिए भी इसकी खेती की जा रही है। बाजरे के दानो की पौष्टिक गुणवत्ता ज्वार से अधिक होती है इसमें लगभग 67-68 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 11-12 प्रतिशत प्रोटीन , 2.7 प्रतिशत खनिज लवण , 5 प्रतिशत वसा आदि पाए जाते है | भूमि की चुनाव :- बलुई दोमट या दोमट भूमि जिसका पी.एच. मान 6.5-8.5 हो बाजरा के लिए अच्छी रहती है। व जीवांश वाली भूमि में बाजरा की खेती करने से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। भूमि की तैयारी :- पलेवा करने के बाद मिट्टी पलटने वाले हल से 10–12 सेमी. गहरी एक जुताई तथा उसके बाद कल्टीवेटर या देशी हल से दो–तीन जुताइयॉ करके पाटा लगाकर मृदा भुरभुरी व समतल कर लेते है | भूमिगत कीटो को नष्ट करने के लिए 12 किग्रा कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत प्रति है . की दर से बुवाई के समय मिट्टी में मिला देना चाहिए | प्रजातियां :- बाजरा की उन्नतशील प्रजातियां। प्रजाति पकने की अवधि (दिन) ऊंचाई (सेमी.) उपज (कु./हे.) संकुल     दाना चारा राज -171 80-85 170-200 20-25 45-48 सीजेड पी – 9802 70-75 185-200 12-15     संकर         एच एच बी – 67 65-70 140-195 15-20 15-20 एम पी एम एच – 17 78-80 175-185 26-28 60-70 एम पी एम एच – 21 72-75 170-175 24-25 46-50 जी एच बी...

चारा फसल के रूप मे शहतूत की खेती पशु आहार के पूरक के रूप में हरी पत्तियों की भूमिका का महत्व निर्विवाद है। विकासशील देशों में, अनाज फसलों के भूसे और घास को पशुओं को खिलाया जाता है, लेकिन इनके कम पोषक मान के कारण पशुओं अपनी उत्पादक क्षमता का पूर्ण प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं। इस कारण अधिकांश स्थानों पर पशुओं को चारे के साथ रातिब (दाना)भी खिलाया जाता है, परन्तु पशु आहार, रातिब से भी संतुलित नहीं हों पाता है। अत:इन परिस्तिथियों में शहतूत की पत्तियों को पशु आहार में मिलकर आहार की दक्षता में सुधार किया जा सकता है। बढ़ती मानव आबादी की भोजन आपूर्ति को पूरा करने के लिए कृषि योग्य भूमि पर खाद्य फसलों के उत्पादन के लिए दबाव बढ़ रहा है जिससे भविष्य के लिए चारा फसलों को लगाने के लिए कृषि योग्य भूमि कम उपलब्ध हो रहीं है। शहतूत का एक और लाभ यह भी है कि इसे इच्छा अनुसार पेड़ या झाड़ी के रूप में लगाया जा सकता है और साल में कई बार चारे के लिए काटा जा सकता है। भारत जैसे देशों में, जहां शहतूत मुख्य रूप से सेरीकल्चर (रेशम उत्पादन) के लिए उगाया जाता है, इसकी अतिरिक्त बची हुई पत्तियाँ एवं कोमल टहनियाँ को  गाय, भेस, भेड़ और बकरियों को खिलाए जाते हैं।...

अल्फाल्‍फा वीविल (Hypera postica Gyllenhal) के फैलने के लिए जिम्मेदार कारक का विश्लेषण   Alfalfa adult weevil   Forage production occupies a top priority by a farmer in cold arid region because long severe winter of 7-8 months is devoid of any vegetation greenery. Alfalfa (Medicago sativa L.) also called as the "Queen of fodder or Green Gold" is the most important fodder crop grown in Ladakh region owing to its well adaptability in the region. It is locally named as 'Buksukh". The crop being highly suited to the farming community, the cropping area has picked up and covered almost the entire area under fodder crops. It is a very important leguminous fodder grown as a perennial crop in cold arid zone. Once sown it continues to show good re-growth for 6-8 years with least management and cares in the subsequent years. It is one of the wonder plants of cold deserts that nurture soil, animals and human beings. The crop is well adapted to vagaries of cold arid climate and provides safety and security through ensured returns to the farmers. It is a persistent, productive as well as heat and drought resistant crop which provides better seasonal distribution than berseem. Alfalfa is a traditional crop in cold arid region and so far no new variety has been...