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Animal feed management in rainy and autumn season Due to sudden giving of excess fodder to the animals during rainy season, they start complaining of diarrhea because sudden change in diet affects the activities of the microorganisms in the stomach of the animal due to which problem of diarrhea and indigestion is seen in some animals. During the rainy season, animals and insects grow very fast and the incidence of fungus remains at its peak. Therefore, green fodder should not be dirty, smelly or muddy as this is the main cause of stomach diseases in animals. Animal feed management in rainy and autumn season हमारे भारत में पशुपालन कृषि का एक अभिन्न हिस्सा है और कृषि एवम् पशुपालन एक दूसरे के पूरक है । पशु पालन में पोषण व आहार पर प्रमुख रूप से 50-60 प्रतिशत खर्चा होता है और पोषण व आहार प्रमुखतः खेती/ कृषि से ही आता है पशु पोषण व आहार पशुपालन का एक ऐसा पहलू है जिसमें संतुलन रखने से पशुओं का रखरखाव एवम् उत्पादन सीधे तौर पर प्रभावित होता है। मौसम के अनुसार पशुओं, मवेशियों का आहार उनकी जरूरतों व मौसमी प्रभावों एवं बीमारियों के अनुसार संतुलित व सुपाच्य होना चाहिए जिससे कि दूध, ऊन व मांस के कम उत्पादन व क्वालिटी में दुष्प्रभाव से बचा जा सके। गाय, भैंस, भेड़,...

अजोला की खेती- हरे चारे की कमी को कम करने के लिए वैकल्पिक समाधान About 50–75 percent of the overall cost of producing milk, meat, and other livestock products goes toward feed and fodder, making them the most significant inputs. Grazing cattle in India are typically not supplemented with anything to satisfy their requirement for protein and minerals. Grazing lands are continuously degrading as a result of exploitative strain and are contracting as a result of conflicting demands for food and forage brought on by the pressure of an expanding population, urbanization, and industrialization. Due to the rising need for food and commercial crops, it is difficult to expand the area used for the production of fodder in India. Due to this, it is crucial to look for and use feed supplies that can help provide more nutrients with less input. Azolla a free-floating aquatic fern seems to hold the solution for this situation. Azolla is an excellent source of protein for animals since it fixes atmospheric nitrogen in association with the nitrogen-fixing blue-green alga Anabaena azollae. It belongs to the Pteridophyta order and family Azollaceae. Azolla pinnata is the most prevalent species of Azolla in India. In comparison to lucerne and hybrid Napier, it generates more than 4 to 5 times the amount...

हरे चारे के लिए मोरिंगा (ड्रमस्टिक) एक स्थायी विकल्प  मोरिंगा एक ऐसा पेड़ है जो हरे चारे की कमी को पूरा करने में अहम योगदान दे सकता है। मोरिंगा को लोकप्रिय रूप से ‘ड्रमस्टिक’ के नाम से जाना जाता है क्योंकि इसकी फलियां ड्रमर द्वारा उपयोग की जाती हैं। इसे हिन्दी में सेहजन/सहजना कहते हैं। इस तेजी से बढ़ने वाले वृक्ष को पूरे उष्णकटिबंधीय इलाके में आसानी से स्थापित होने एवं बहुउद्देश्यीय उपयोग जैसे सब्जी, पशुधन चारा, दवा मूल्य, डाई, जल शुद्धिकरण आदि के कारण उगाया जाता है। मोरिंगा की पत्तियों में बीटा केरोटीन, प्रोटीन, विटामिन सी, केल्शियम, मैग्नीशियम एवं लोहा प्रचूर मात्रा में उपस्थित होता है। चूंकि मोरिंगा प्रोटीन में समृद्ध है इसलिए इसे दुधारू जानवरों के पूरक चारे के रूप् में उपयोग में लाया जा सकता है। पारंपरिक प्रोटीन पूरकों जैसे कि नारीयल खल, कपास खल, मूंगफली खल, तिल खल, सूरजमुखी की खल आदि की तुलना में इसकी पत्तियों में प्रोटीन अधिक मात्रा में पाया जाता है। इसके अलावा इसकी पत्तियों में अनेक फफूंदी प्रजातियों के खिलाफ एंटीऑक्सीडेंट और एंटीमाईक्रावियल गुण होते हैं। मोरिंगा को बाड़, घेरे एवं बहुकट चारे के रूप में उगाया जा सकता है। पोष्टिक महत्त्व- पोषक तत्त्व जैसे p+, M, ca और Mg पशुधन की शारीरिक, चपाचय और जैव रासायनिक, संतुलन प्रक्रियाओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पशु...

नैपियर बाजरा एवं दलहनी चारा फसलों के अन्तः फसलीकरण से सालभर गुणात्मक हरे चारे का उत्पादन  प्राचीनकाल से ही भारत की ख्याति एक कृषि प्रधान देश के रूप में रही है तथा पशुपालन इसकी उन्नति एवं सफलता में एक अभिन्न घटक के रूप में उभर कर सामने आ रहा है। दुग्ध उत्पादन के स्तर में आज हम 180 मिलियन टन के आंकड़े को पार कर चुके है।  प्रति पशु दूध उत्पादकता के स्तर में आज भी हमारे देश की गणना बहुत निचे के स्तर पर दर्ज की जाती रही है जो हमारे लिए एक महत्वपूर्ण शोध का विषय है तथा हमें इसमें सुधार करने की आवश्यकता है। इस कम उत्पादकता के लिए विधमान अनेकों महत्वपूर्ण कारणों में से संतुलित एवं गुणवत्ता युक्त पशु आहार का अभाव एक अहम कारण है। विभिन्न आंकड़ों के अनुसार वर्तमान स्थिति में हमारे देश में लगभग 35 प्रतिशत हरा चारा, 10 प्रतिशत सूखा चारा और 44 प्रतिशत दाना राशन की कमी दर्ज की गई है। जो पशुओ की दुग्ध उत्पादकता को सीधा प्रभावित करता है। पशुपालन की कुल लागत का लगभग 65 -70 प्रतिशत खर्च केवल उसके आहार प्रबंधन के कारण आता है। जो इस क्षेत्र की लाभदायक भूमिका बनाये रखने में बहुत जरुरी अंश माना जाता है। पशुओं के पोषण में हरे चारे की भूमिका सबसे अहम मानी...

आधुनिक पशु आहार में अजोला का योगदान  राजस्थान की अर्थव्यस्था में पशुपालन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है तथा पशुपालन कृषि का एक महत्वपूर्ण भाग है। पशुपालन किसानो को विभिन्न प्रकार के रोजगार के अवसर प्रदान करता है  जिससे किसानो की आय में वर्द्धि होती है एवं उनकी अर्थवयवस्था में भी  सुधार होता है। अजोला पशुओ के लिये जैविक चारे का काम करता है जिससे उनके दूध में बढ़ोतरी होती है और दूध की गुणवत्ता में भी बढ़ोतरी होती है अजोला एक जलीय फर्न है, जो पानी में तेजी से  बढ़ती है एवं पानी की सतह पर तैरती रहती है धान की फसल में अजोला को भी नील हरित शैवाल की तरह हरी खाद के रूप में उगाया जा सकता है हरी खाद भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाती है  तथा फसल उत्पादन भी बढ़ाती है। एजोला की सतह पर नील हरित शैवाल सहजैविक के रूप में पाया जाता है। यह अद्वितीय पारस्परिक सहजैविक संबंध अजोला को एक अदभुद पौधे के रूप में विकसित करता है, जिसमें कि उच्च मात्रा में प्रोटीन उपलब्ध होता है। अजोला प्राकृतिक रूप से उष्ण व गर्म उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है। देखने में अजोला शैवाल से मिलती जुलती होती है और आमतौर पर उथले पानी में अथवा धान के खेत में पाई जाती है। अजोला के गुण:...

हाईब्रिड नेपियर घास से वर्षभर हरा चारा उत्पादन  नेपियर घास  का जन्म स्थान अफ्रीका का जिम्बाबे देश बताया जाता है | यह  बहुत ही तेज बढ़ने वाली पौष्टिक चारा घास है इसलिए इसे हाथी घास भी कहा जाता है | इसका  नेपियर नाम, कर्नल नेपियर (रोडेसियन कृषि विभाग, रोडेसिया) के नाम पर पड़ा | सबसे पहली नेपियर हाईब्रिड घास अफ्रीका में बनाई  गयी |  इसे चारे के  रूप में बहुत तेजी से अपनाया जा रहा है|  भारत में यह घास 1912 में आई | भारत में प्रथम बाजरा-नेपियर हाईब्रिड  घास कोइम्बतुर, तमिलनाडू (1953) में और फिर नयी दिल्ली में 1962 में बनाई गयी| कोइम्बतुर के हाईब्रिड  का नाम कोम्बू नेपियर और नयी  दिल्ली में बनाये गए पहले हाईब्रिड का नाम पूसा जियंत नेपियर रखा गया  | इससे पुरे वर्ष 6-8 कटाईयो द्वारा हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है | एक बार लगाने के बाद यह घास 3-4 वर्षो तक हरा चारा देती रहती है एवं कम उत्पादन की स्थिति में , इसे पुनः खोद कर लगा दिया जाता है पोषक तत्व:   संकर नेपियर घास में क्रुड प्रोटीन 8-10 प्रतिशत, क्रूड रेशा 30 प्रतिशत और  कैल्सियम 0.5 प्रतिशत, शुष्क पदार्थ 16-20 प्रतिशत, पाचक क्षमता 60 प्रतिशत और औक्सालेट 2.5 - 3 प्रतिशत तक होता है | इसके चारे को दलहनी चारे के साथ मिला...

अज़ोला: पशुधन के लिए एक वैकल्पिक और स्थायी चारा एजोला पानी की सतह पर एक नि: शुल्क चल, तेजी से बढ़ती जलीय फ़र्न है। अज़ोला की खेती किसान को पशुधन आहार पूरक की लागत को कम करने में मदद करती है और यह पशुधन, मुर्गी पालन और मछली के लिए पूरक आहार खिलाने के लिए उपयोगी है। यह एक छोटे, सपाट, सघन हरे द्रव्यमान की तरह तैरता है। आदर्श परिस्थितियों में, एजोला संयंत्र तेजी से बढ़ता है, हर तीन दिन में इसका बायोमास दोगुना हो जाता है। भारत में एजोला की सामान्य प्रजाति अज़ोला पिन्नता है। यह ल्यूसर्न और संकर नैपियर की तुलना में उत्कृष्ट गुणवत्ता के प्रोटीन का 4 से 5 गुना से अधिक उत्पादन करता है। इसके अलावा, संकर नेपियर और ल्यूसर्न की तुलना में, बायोमास उत्पादन लगभग 4 से 10 गुना है। दूध का सबसे बड़ा उत्पादक होने के बावजूद, भारत में डेयरी पशुओं के लिए चारा और चारे की भारी कमी है। सूखे चारे, हरे चारे और सांद्रता की कमी क्रमशः 12 से 14 प्रतिशत, 25 से 30 प्रतिशत और 30 से 35 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया गया है। चारे की कमी की पूर्ति बने बनायेे वाणिज्यिक आहार के उपयोग से होती है, जिसके परिणामस्वरूप दूध उत्पादन की लागत बढ़ जाती है। हरे चारे के विकल्प की तलाश और...

साइलेज: वर्ष भर हरे चारे का विकल्प  हरे चारे की कुट्टी करके वायु रहित (एनारोबिक) परिस्थितियों में 45 से 50 दिन तक रखने पर किण्वन प्रक्रिया द्वारा हरे चारे को संरक्षित करना ही “साइलेज” बनाना कहलाता है । आम भाषा में इसे “चारे का अचार” भी कहा जाता है क्योंकि इससे हरे चारे को साल भर संरक्षित करके रखा जा सकता है । साइलेज की पौष्टिकता भी चारे की तरह बरकरार रहती हैं क्योंकि किण्वन प्रक्रिया से चारे में उपस्थित चीनी या स्टार्च लैक्टिक अम्ल में बदल जाता है, जो चारे को कई वर्षो तक ख़राब होने से बचाए रखता है। दुधारू पशुओं को वर्ष भर हरे चारे की आवश्यकता होती है परन्तु वर्ष भर इसका उत्पादन कर पाना संभव नहीं होता है l जिससे गर्मी के मौसम में पशु को सिर्फ सूखा हुआ चारा या दाना ही खिलाया जाता है l इससे गर्मी में पशु का दूध उत्पादन भी कम हो जाता है l इस समस्या का हल चारे का साइलेज बनाकर किया जा सकता है l जिस मौसम में हरे चारे की उपलब्धता अधिक हो तब उसका साइलेज बना लिया जाए तो हरे चारे की कमी पड़ने पर पशुओं को साइलेज खिलाया जा सकता है l साइलेज में हरे चारे के सामान ही सभी पौष्टिक तत्व मौजूद होने से पशु अच्छा दूध...