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बीज उपचार: भरपूर फसल की ओर पहला कदम Seed treatment is essential for high-quality seed production and healthy crop growth. It protects crops from sap-sucking pests during the early stages and prevents diseases transmitted through seeds and soil. Various fungicides, insecticides and biological agents are used for seed treatment. This process not only improves seed germination rates but also ensures crops remain healthy and resilient against pests and diseases. Farmers, particularly those cultivating various crops in the rabi season, should select high-quality, disease-resistant crop varieties and ensure they perform seed treatment. Seed treatment in different crops: Rice : For rice farmers, if using wet nursery beds, mix 3 grams of Carbendazim per kilogram of seeds and coat them before spreading the seeds in the nursery bed. For dry nursery beds, soak the seeds for 24 hours in a solution of 1 gram of Carbendazim per liter of water, then spread the sprouted seeds in the nursery bed. One liter of this solution is sufficient to soak one kilogram of seeds. Treating seeds with this fungicide can prevent early-stage diseases such as blast and leaf spot. Additionally, before transplanting rice seedlings, soaking the seed bundles for 12 hours in a solution of 1.6 ml of Chlorpyrifos 50% EC per liter of water can protect the...

Effect of climate on growth and yield of soybean under natural farming conditions in Kangra district of Himachal Pradesh. Soybean (Glycine max L.) is the world's leading oil producing crop in terms of both area and production. Soybean is the world's most important seed, contributing 25 percent of the edible oil used globally, about two-thirds of the world's protein for livestock feed). Soybean oil contains 85 percent unsaturated fatty acids and is cholesterol free. Soybean seeds contain 43.2 percent protein, 19.5 percent fat, 20.9 percent carbohydrate and a good amount of other nutrients like calcium, phosphorus, iron and vitamins. सोयाबीन (ग्लाइसिन मैक्स एल.) क्षेत्रफल और उत्पादन दोनों की दृष्टि से विश्व की सर्वोत्तम अग्रणी तेल उपज देने वाली फसल है। सोयाबीन दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण बीज है, जो विश्व स्तर पर उपयोग किए जाने वाले खाद्य तेल के रूप में 25 प्रतिशत का योगदान देता है, पशुधन के भोजन के लिए दुनिया के प्रोटीन का लगभग दो-तिहाई हिस्सा)। सोयाबीन के तेल में 85 प्रतिशत असंतृप्त वसा अम्ल होता है और यह कोलेस्ट्रॉल मुक्त होता है। सोयाबीन के बीजों में 43.2 प्रतिशत प्रोटीन, 19.5 प्रतिशत वसा, 20.9 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट और कैल्शियम, फास्फोरस, लौह और विटामिन जैसे अन्य पोषक तत्व अच्छी मात्रा में होते हैं। रासायनिक उर्वरक फसल की पोषक तत्वों की आवश्यकताओं को पूरा...

सोयाबीन की सटीक खेती  सोयाबीन को बोनलेस मीट भी कहते है, जो कि लैग्यूम परिवार से है। इसका मूल उत्पति स्थान चीन माना जाता है। यह प्रोटीन के साथ साथ रेशे का भी उच्च स्त्रोत है। सोयाबीन से निकाले हुए तेल में कम मात्रा में शुद्ध वसा होती है। जलवायु :- सोयाबीन गर्म एवं नम जलवायु की फसल है। बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए 25° से. तथा फसल की बढोत्तरी के लिएलगभग25-30°से. तापमानकी आवश्यकताहोती है। सोयाबीन की अच्छीफसल के लिए वार्षिक वर्षा 60-70 सें.मी. होनी चाहिए।   उन्नतशील किस्में:- एस एल 525, एस एल 744, एस एल 958, अलंकार,अंकुर, ली , पी के  262, पी के   308, पी के   327, पी के   416, पी के   472, पी के   564, पन्त सोयाबीन 1024, पूसा 16 , शिलाजीत, वी एल सोया  47. भूमि:- सोयाबीन केअच्छे उत्पादन के लिएदोमट मिट्टी सर्वोत्तममानी जाती है। जिसकाpH 6 से 7.5 हो। खेत की तैयारी:- खेत की तैयारी के समय, दो-तीन बार कल्टीवेटर और देशी हल से जुताई करें| बुवाईका समय:- इसकी बुवाई जून के दुसरे सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताहमें की जाती है। बीज दर:- एक हेक्टेयर खेत में 70-80 किलोग्राम बीजों की आवश्यकता होती है। दुरी:- बुवाई के समय पंक्ति से पंक्ति व पौधे से पौधे कि दुरी क्रमशः 45 सैं.मी., 8-10 सैं.मी. रखी जाती है। बीज की गहराई:- बीज की गहराई3-5 सैं.मी. रखनी चाहिये। बीज उपचार :- बीजों को मिट्टी से होने...

सोयाबीन की सटीक खेती  सोयाबीन को बोनलेस मीट भी कहते है, जो कि लैग्यूम परिवार से है। इसका मूल उत्पति स्थान चीन माना जाता है। यह प्रोटीन के साथ साथ रेशे का भी उच्च स्त्रोत है। सोयाबीन से निकाले हुए तेल में कम मात्रा में शुद्ध वसा होती है। जलवायु :- सोयाबीन गर्म एवं नम जलवायु की फसल है। बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए 25° सेल्सियस तथा फसल की बढोत्तरी के लिए लगभग 25-30° सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। सोयाबीन की अच्छी फसल के लिए वार्षिक वर्षा 60-70 सें.मी. होनी चाहिए। उन्नतशील सोयाबीन किस्में :-  एस एल 525, एस एल 744, एस एल 958, अलंकार,अंकुर, ली , पी के  262, पी के   308, पी के   327, पी के   416, पी के   472, पी के   564, पन्त सोयाबीन 1024, पूसा 16 , शिलाजीत, वी एल सोया  47. भूमि :- अच्छे जल निकास वाली उपजाऊ दोमट मिट्टी उपयुक्त है। सोयाबीन की अच्छी पैदावार के लिए मिट्टी का pH 6 से 7.5  अनूकूल होता है। जल जमाव, खारी और क्षारीय मिट्टी सोयाबीन की खेती के लिए अनुकूल नहीं होती। खेत की तैयारी :- खेत की तैयारी के समय, दो-तीन बार कल्टीवेटर और देशी हल से जुताई करें| बिजाई का समय व बीज दर:- बिजाई के लिए जून के पहले पखवाड़े से जुलाई के शुरू का समय उचित होता है। एक हेक्टेयर खेत...

सोयाबीन (ग्लाइसीन मैक्स) की प्रमुख किस्में और उनकी विशेषतायें सोयाबीन एक दलहन कुल की मुख्य तिलहनी फसल है| इसमें 30-40 प्रतिशत प्रोटीन तथा 20-22 प्रतिशत तेल की मात्रा पाई जाती है| यह भोजन और पशु आहार के लिए प्रोटीन का एक अच्छा स्रोत है| इसका वनस्पति तेल खाद्य व औधोगिक अनुप्रयोगों में उपयोग किया जाता है| सोयाबीन एक प्रमुख खरीफ फसल है, इसकी बुआई जून-जुलाई में और कटाई सितम्बर-अक्टूबर में की जाती है| राजस्थान में इसकी खेती झालावाड़, कोटा, बारां, चित्तौडगढ़ आदि जिलों में की जाती है| सोयाबीन की प्रमुख किस्में और उनकी विशेषतायें: राजस्थान में उगाई जाने वाली सोयाबीन की विभिन्न किस्में जो सोयाबीन के उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देती है, निम्न प्रकार है - 1. पी. के. 472: यह मध्यम आकार के पीले दानों वाली, मध्यम ऊँचाई (40 से. मी.) की किस्म हैं| सिंचित अवस्था में इस किस्म में 60-65 दिन में फूल आ जाते हैं और 100-115 दिन में फसल पककर तैयार हो जाती हैं| इसकी औसत उपज असिंचित क्षेत्रों में 9-10 तथा सिंचित क्षेत्रों में 20-25 क्विंटल प्रति हैक्टर होती हैं 2. एन. आर. सी. 37: इस किस्म के दानें पीले व उत्तम अंकुरण क्षमता वाले होते है तथा इसकी फलियों और पत्तियों पर सलेटी रंग के रोयें पाए जाते हैं| यह मध्यम ऊँचाई की 90-95 दिन में पकने वाली किस्म...

Soybean Crop and its 6 Major Insects सोयाबीन (ग्लाइसिन मैक्स), जिसे कई जगह सोजाबीन के नाम से भी जाना जाता है,एक खरीफ की वार्षिक फसल है|  इसे व्यापक रूप से खाद्य बीन के लिए उगाया जाता है तथा यह दलहन के बजाय तिलहन की फसल मानी जाती है | इसके मुख्य घटक प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, एवं वसा होते हैं | प्रोटीन की अधिक मात्रा होने के कारण इससे दूध उत्पाद बनाए जाते हैं | यह पशु आहार और भोजन के लिए प्रोटीन का एक अच्छा और सस्ता स्रोत है |  इससे बनने वाले खाद्य पदार्थो में सोया सॉस,और किण्वित बीन पेस्ट, नाटो,और टेम्पेह शामिल हैं|  सोयाबीन का वनस्पति तेल, खाद्य और औद्योगिक अनुप्रयोगों में उपयोग किया जाता है| इसकी फलियों में महत्वपूर्ण फायटिक अमल,आहार खनिज और विटामिन बी अधिकांश मात्रा में पाये जाते हैं| सोयाबीन में वसा बहुत कम मात्रा में तथा कोलेस्ट्रॉल बिलकुल नहीं होता| इसके प्रमुख आहार खनिज, कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन और सेलेनियम हैं| यह बहुत सी बीमारियों जैसे कैंसर ,ह्रदय रोग को दूर करता है तथा शरीर में हड्डियों को मजबूत करता है| सोयाबीन की खेती – उत्तराखंड मे सोयाबीन  खरीफ की मुख्य तिलहनी फसल है| सोयाबीन में 40% प्रोटीन व 20% तेल की मात्रा पायी जाती है| प्रदेश के बुंदेलखंड के सभी जनपदों एवं बदायु ,रामपुर, बरैली, मेरठ एवं शाहजहांपुर जिलों में...

Improved cultivation of Soybean: Boon for Farmers सोयाबीन खरीफ मौसम की एक प्रमुख फसल है। यह दलहन के बजाय तिलहन की फसल मानी जाती है। क्यूकि तेल के रूप से इसका आर्थिक उद्देश्य सबसे ज्यादा है | सोयाबीन मानव पोषण एवं स्वास्थ्य के लिए एक बहुउपयोगी खाद्य पदार्थ है। सोयाबीन एक महत्वपूर्ण खाद्य स्रोत है। इसके मुख्य घटक प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा होते है। सोयाबीन में 44 प्रतिशत प्रोटीन, 22 प्रतिशत वसा, 21 प्रतिशत कार्बोहाइडेंट, 12 प्रतिशत नमी तथा 5 प्रतिशत भस्म होती है। सोयाबीन की पौष्टिक गुडवत्ता   प्रतिशत प्रोटीन 44 वसा 22 कार्बोहाइडेंट 21 तेल 16-18 भस्म 5 छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से सोयाबीन राजनांदगांव, दुर्ग, महासमुंद, बेमेतरा, धमतरी, और कबीरधाम में उगाये जाते है. इस क्षेत्र में फसल पद्धति के रूप में या मुख्य फसल के रूप में भी उगाये जाते है किसान इस उन्नत तकनीक का उपयोग कर अपनी फसल की उत्पादकता बढ़ा सकते है और अपनी वार्षिक आय में वृद्धि कर सकते है जिसका वर्णन नीचे दिया गया है     Soybean crop in field सोयाबीन की खेती के लि‍ए भूमि का चुनाव एवं तैयारी सोयाबीन की खेती अधिक हल्‍की रेतीली व हल्‍की भूमि को छोड्कर सभी प्रकार की भूमि में सफलतापूर्वक की जा सकती है परन्‍तु पानी के निकास वाली चिकनी दोमट भूमि सोयाबीन के लिए अधिक उपयुक्‍त होती है। जहां भी खेत में पानी रूकता हो वहां सोयाबीन ना लें। ग्रीष्‍म कालीन जुताई 3 वर्ष में...

उत्तर-पूर्व भारत में सोयाबीन की कीट-पतंग समष्‍टि‍ और उनका पर्यावरण-अनुकूल प्रबंधन The soybean [Glycine max (L.) Merill] is one of the oldest cultivated crops of the world. It also is known as “Golden bean”, “Miracle crop” and “Crop of the planet” etc., because of its several uses. The first record of this crop is available in Chinese literature, where it is mentioned to be one of the five sacred grains of china. The middle and lower Yellow river valley in China has been reported to be the place of origin (Chang, 1980). Since the first century AD, this ancient domesticate became widely introduced and land races developed in China, Korea, India and other parts of Asia (Zeven and De Wet, 1982). Soybean is one of the most important crops in the world, with great economic and social value due to the fact that it is a source of protein for feed at low cost (Fortunato et al., 2007) and soybean oil is highly digestible and has almost no saturated fats. In North east India, soybean is attacked by about two dozens of insect pests among which leaf folders, Nacoleia vulgalis Guen and N. Diemenalis Guen are one of the destructive insect pests at medium altitudes of mid hills of Meghalaya (Sachan and...