Crop Cultivation

Scientific cultivation of Lentil pule मध्यप्रदेश के असिंचित क्षेत्रों में चने की फसल के बाद रबी में उगाई जाने वाली दलहनी फसलों में, मसूर मुख्य फसल है। मसूर (lentil) की संरचना ही कुछ ऐसी है कि ये पानी का उपयोग इसके जीवनकाल में कम से कम करती है। इसकी पूरी ब्राहयाकृति छोटी सी झाड़ी जैसी है, तने पर सूक्ष्म रोयें पाये जाते है एवं पत्तियां भी बारीक व लंबी होती है, यही कारण है कि अन्य दलहनी फसलों की अपेक्षा मसूर की खेती को प्रति इकाई उत्पादन में पानी की कम मात्रा की आवश्‍यकता होती है। मसूर की फसल पाले तथा ठंड के लिये अति संवेदनशील है, फिर भी अन्य रबी दलहन फसल...

उच्च पोषण और आय के लिए फूलगोभी उगाऐं Cauliflower is one of the most important winter vegetable grown by the farmers of our country. The edible part is the vegetative portion of the plants known as curd. It is rich in vitamins, minerals, fiber and bioactive compounds such as anthocyanins, beta-carotene, glucosinolate. Besides these, it is also high in folate, potassium and calcium.  It is considered as cancer (colon cancer, bladder cancer, breast cancer) fighting super vegetables due to high vitamin C, potassium, soluble fiber, folate, carotenoids and glucosinolates. It also helps in reducing serum cholesterol and also curing progeria disease, osteoarthritis. The mean glucosinolate content of is given in Table 1. Table 1: Mean...

सतत आय के लिए नारियल की खेती The coconut tree is called as "Kalpavriksha" which essentially means all parts of a coconut tree is useful some way or other. Coconut cultivation is the source of sustainable income especially for small and marginal farmers.  Coconut is essentially a tropical plant but has been found to grow under varying agro climatic conditions. The coconut palm can tolerate wide range of soil conditions. Soil with a minimum depth of 1.2m and fairly good water holding capacity is preferred for coconut cultivation. Preparation of land for Coconut farming:-  Size of the pit depends on the soil type and water table. In laterite soils large pits of the size 1.2m x...

Techniques for Carrot cultivation and its seed production गाजर की खेती पुरे भारत मे की जाती है इसका उपयोग सलाद,अचार एवं हल्वा के रूप मे किया जाता है। गाजर का रस कैरोटीन का महत्वपूर्ण स्त्रोत माना जाता है। कभी कभी इसका उपयोग मक्खन को रंग करने के लिये भी किया जाता है। गाजर मे विटामिन जैसे थियामीन एवं राबोफलेविन प्रचुर मात्रा मे पाया जाता है। संतरे रंग के गाजर मे कैरोटीन की मात्रा अधिक पाई जाती है। गाजर की खेती के लिये मिटटी एवं जलवायु गाजर की खेती के लिये अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट मिटटी जिसमे कार्बनिक पदार्थ हयुमस की मात्रा अधिक हो तथा पी.एच. मान 5.5-7.0 होनी चाहिए। हल्की मिटटी...

Modern techniques of Groundnut cultivation मूँगफली (peanut) एक ऐसी फसल (crop) है जिसका कुल लेग्युमिनेसी होते हुये भी यह तिलहनी के रूप मे अपनी विशेष पहचान बनाये हुये है। इसमे गुणशुत्रो की संख्या 2n=4x=40 होती  है। मूँग फली के दाने मे 48-50 % वसा और 22-28 % प्रोटीन पायी जाती है मूँगफली की खेती 100 सेमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में आसानी से की जा सकती है। उत्तर प्रदेश मे मूंग्फली की खेती मुख्य रूप से झांसि, हरदोई, सीतापुर, उन्नव आदि जिलो मे होती है। मूंगफली की खेती (cultivation) करने से भूमि की उर्वरता  भी बढ़ती है। यदि किसान भाई मूंगफली की आधुनिक खेती करता है तो उस से किसान की भूमि सुधार...

धान की सीधे बीज (डायरेक्ट सीडेड) से बुआई: पानी की खपत और श्रम को कम करने के लिए एक दृष्टिकोण In India, rice field covers an area of 43.94 million hectares (mha) with production of 106.54 mt and has the share of 21% in global rice production during 2013-14. Of the total rice area, 49.5% (22 mha) is irrigated, 13.5% (6 mha) is upland, and 32.4% (14.4 mha) is rainfed lowland. In Asia, 90% of fresh water has been exploited by agriculture and more than 50% is utilized to irrigate rice. More than 75% of the rice supply comes from 79 mha of irrigated land. Therefore, food security is challenged and threatened...

Improved agronomical techniques of Ashwagandha or Winter cherry cultivation अश्वगंधा (withania somnifera) की पौधा सीधा 1.25 मीटर उॅचा होता हैं तथा इसके तने में बारीक रोम पाये जाते हैं। इसके पत्तिायों का आकार अण्डाकार एवं पत्तिायों में रोम पाये जाते है जिसे छूने से मुलायम महसूस होता है। फूल छोटे हरे या हल्के पीले रंग के तथा फल छोटे गोले नारंगी या लाल रंग के होते है। जड़ो को मसलकर सूॅघने से अश्व (घोड़े) के पसीने एवं मूत्र जैसी गंध आती है। जड़ों का रंग सफेद सा भूरा होता हैं। इसका संस्कृत नाम: अष्वगंधा, हिन्दी नाम :  असगंध, अंग्रेजी : विन्टरचेरी (Winter cherry), इंडियनगिनसेंग  (Indian ginseng)  हैैै। । भोगौलिक वितरण: अशवगंधा  का वितरण अफ्रीका, भूमध्यसागरीय से भारत एवं...

Scientific cultivation of Cow pea. लोबिया की खेती के लिए गर्म व आर्द्र जलवायु उपयुक्त है। तापमान 24-27 डिग्री सें.ग्रे. के बीच ठीक रहता है। अधिक ठंडे मौसम में पौधाों की बढ़वार रूक जाती है। लगभग सभी प्रकार की भूमियों में इसकी खेती की जा सकती है। मिट्टी का पी.एच. मान 5.5 से 6.5 उचित है। भूमि में जल निकास का उचित प्रबंधा होना चाहिए तथा क्षारीय भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं है। लोबिया की किस्में : पूसा कोमल : यह किस्म बैक्टीरियल ब्लाईट प्रतिरोधाी है  इसे बसंत, ग्रीष्म तथा वर्षा तीनो मौसम लगाते है। फली का रंग हल्का हरा, मोटा गुदेदार 20-22 से.मी. लम्बा होता है। इसकी उपज 100-120 क्ंविटल/हेक्टेयर होती है। अर्का...