Agriculture Knowledge for Everyone

Crop Cultivation

रसभरी या केप करौदा: भारत में एक नई नकदी फसल Introduction and adaptations of new crops contribute to an increase in diversity of agricultural systems. It offers new opportunity and alternatives to farmers and markets. New crops can result in an increase of income for farmers. The Cape gooseberry (Physalis peruviana L.) करौदा is a new herbaceous crop which comes under minor fruit. The genus Physalis, of the family Solanaceae, contains around more than 100 species of annual and perennial herbs. Several species of Physalis are grown for their edible fruits like, P. peruviana L. (Cape gooseberry) , P. pruinosa L. (strawberry tomato), or P. ixocarpa Brot. (husk tomato). This crop can be grown successfully in kitchen garden. In India, Cape gooseberry grown ‘throughout the plains and hills. In temperate region it grow as a annul while in tropical and subtropical grow as perennial due to absence of frost. It is also called golden berry, teparee, tiparee, makowi, poha, uchuba etc. Gooseberry reaches 2 to 3 ft (1.6 - 0.9 m) in height but occasionally may attain 6 ft (1.8) m.  Cape gooseberry can also be grown as an intercrop with other fruit crops. The Cape gooseberry fruits are cherry size, golden-yellow, like a small globe and is deliciously sweet. The fruit type is berry with the diameter about 12.5 to...

Improved technology for cluster bean cultivation ग्वार, लेग्युमिनेसी कुल की, खरीफ ऋतु में उगाई जाने वाली एकवर्षीय फसल है। ग्वार यानि‍ क्‍लस्‍ट्रबीन का वैज्ञानिक नाम साइमोपसिस टेट्रागोनोलोबा  है। इसका पौधा बहु-शाखीय व सीधा बढ़ने वाला है। पौधे की लम्बाई 30-90 सेमी तक होती है। इसकी जड़ें मृदा में काफी गहराई तक जाती हैं। ग्वार के फूल आकार में छोटे व गुलाबी रंग के होते हैं। फलियां लम्बी व रोएंदार होती हैं। ग्वार एक स्वपरांगित फसल है। ग्वार की फसल में बुवाई के 70-75 दिनों बाद फलियां आनी शुरू हो जाती हैं। सामान्यतः 110-133 फलियां प्रति पौधा आ जाती हैं। ग्वार की खेती कम वर्षा और विपरीत परिस्थितियों वाली जलवायु में भी आसानी की जा सकती  है।  ग्वार की ताजा व नर्म-मुलायम फलियों को सब्जी और भुरता बनाने के काम में लाया जाता है। कच्ची सुखाकर रखी हुई फलियों का प्रयोग भी सब्जी बनाने में किया जाता है। फलियों को सुखाकर व नमक मिलाकर लम्बे समय तक उपयोग के लिए रखा जा सकता है। ग्वार की हरी फलियों में रेशे की मात्रा अधिक पायी जाती है। हरी फलियों के 100 ग्राम भाग में 81.0 ग्राम पानी, 3.2 ग्राम प्रोटीन, 0.4 ग्राम वसा, 1.4 ग्राम खनिज, 3.2 ग्राम रेशा और 10.8 ग्राम कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है। इसके अतिरिक्त हरी फलियों में कैल्शियम (130 मि.ग्रा.), फास्फोरस (57 मि.ग्रा.), लोहा...

Scientific cultivation of Cowpea and its integrated disease and pest management. लोबिया एक महत्वपूर्ण सब्जी की फसल है लोबिया की खेती मैदानी क्षेत्रों में फरवरी से अक्टूबर तक सफलतापूर्वक की जाती है। दलहनी फसल होने के कारण यह वायुमण्डलीय नत्रजन को भुमि में संचित करती है जिससे जमीन की उर्वरता बढ़ती है एवं आगामी फसल को इस नत्रजन का लाभ मिलता है। लोबिया प्रोटीन के लिहाज से एक उत्तम फसल है तथा इसकी खेती दानें, सब्जी (हरी फली), चारे एवं हरी खाद के  लिये की जाती है। कुपोषण दूर करने के लिए शाकाहारी भोजन में लोबिया का उपयोग बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अन्य हरी सब्जियों की तुलना में प्रोटीन, फास्फोरस एवं कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है। इसमें पाये जाने वाले विभिन्न तत्वों प्रति 100 ग्राम हरी फली में नमी 84.6 ग्रा., प्रोटीन 4.3 ग्रा., कार्बोहाइड्रेट 8.0 ग्रा., कैल्शियम 80.0 ग्रा. एवं मैगनेशियम  54.0 ग्राम इत्यादी । लोबिया की खेती मक्का, बाजरा, ज्वार या दलहनी फसलों के साथ सह-फसली खेती के रूप में की जा सकती है। भूमि एवं जलवायुः लोबिया की खेती सभी प्रकार की भूमि में जहाँ पानी नहीं रूकता है, की जा सकती है। परन्तु अच्छी उपज के लिए उचित जल निकास युक्त बलुई दोमट मिट्टी अच्छी रहती है। अधिक ठंड़ की अवधि नबम्बर, दिसम्बर एवं जनवरी महीने छोड़कर साल में बाकी...

अलसी (फ्लैक्‍स रेशा फसल) की खेती कैसे करें? Flax is a fibre crop, which is a member of the genus Linum and belongs to the family Linaceae. Botanically, flax and linseed are same but when it is cultivated for oil then it is known as Linseed and when it is cultivated for fibre it known as Flax. Oilseed and fiber varieties are specialized development of this species. The flax cultivars grown primarily for seed/ oil purpose are relatively short in height and possess more secondary branches and seed capsule. The flax cultivars grown for fiber purpose are tall growing with straight with 100-125 cm height and have fewer secondary branches. Flax or linseed is an annual herbaceous plant with shallow root. Flax fibre is strong, non-lignified, soft, flexible, lustrous, shining, pale yellow colour and possesses high water absorbency quality. Flax contain 80-90% cellulose. It is valued for strength and durability excelling cotton and stronger than cotton, rayon or wool. The ‘Linen’ obtained from flax fibre is one of the best raw materials for textile. In India, Flax is commonly known as Alsi, Tisi, Avise Jinjalu, Jawas, Ali Vidai, Agasi, Pesi  and Cheruchana Vithu. At present India imports large amount of flax fibre while flax can be grown successfully in Himanchal Pradesh, Jammu and Kashmir, Uttrakhand, Tarai region of Uttar Predesh,...

Cultivation of Kusumi Natural Resin (Kusumi Lac) लाख (Lac) एक प्राकृतिक राल है जो मादा लाख कीट द्वारा मुख्य रुप से प्रजनन के पश्‍चात स्त्राव के फलस्वरुप बनता है। लाख कीट की दो प्रजातियां होती हैं जिन्हें कुसमी और रंगीनी कहते हैं। प्रत्येक प्रजाति से वर्ष में दो फसलें ली जाती हैं लेकिन पष्चिम बंगाल के कुछ समुद्री क्षेत्र के आस-पास बिलायती सिरिस पर एक वर्ष में तीन फसलें भी ली जाती हैं। लाख की खेती ग्रामीणों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत है। हमारे देष में कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहोॅं लाख का उत्पादन नियमित रुप से होता आ रहा है तथा दूसरे क्षेत्र भी हैं जहाॅं संसाधन तो उपलब्ध हैं लेकिन अज्ञानता के कारण संसाधनों का उपयोग नहीं हो रहा है। लाख उत्पादक क्षेत्रों में भी आधुनिक तकनीकी ज्ञान न होने के कारण उत्पादन उतना नहीं हो रहा है जितना हो सकता है। लाख की खेती के लिए मुख्य पोषक वृक्षों/ पौधों में कुसुम, पलास, बेर एवं सेमियालता का नाम प्रचलित है। इसके अलावा भी कई अन्य वृक्षों/ पौधों जैसे एकेसिया ऐरेबिका, ग्रेविया, अल्बीजिया ल्युसिडा, अल्बीजिया प्रोसेरा, सोरिया रोबस्टा, सोरिया तालुरा, कजानस कजन पर लाख का उत्पादन किया जाता है परन्‍तू इन वृक्षों या पौधों पर लाख का उत्पादन वाणिज्यिकी रुप से बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। लाख पोषक वृक्षों में कुसुम (श्‍लेइचेरा ओलिओसा) वृक्ष का...

Cultivation technique of Swarnamukhi or Sonamukhii or Senna सोनामुखी या सनाय बहुवर्षीय कांटे रहित झाड़ीनुमा, औषधीय पौधा है जो लैग्यूमीनेसी (दलहनी) कुल के अन्तर्गत आता है। पूर्णतया बंजर भूमि में उगाये जा सकने वाले इस पौधे के लिए ज्यादा पानी एवं खाद की आवश्यकता नहीं होती है। इस प्रकार भारत के बंजर भूमि वाले भागों में सोनामुखी की खेती करके पर्याप्त लाभ कमाया जा सकता है। सोनामुखी एक औषधीय पौधा है जो एक बार लगा देने के उपरान्त 4-5 वर्ष तक उपज देता है। इसका पौधा 4 डिग्री से 50 डिग्री सेल्सियस तक तापमान सहन करने की क्षमता रखता है। एक बार लगा देने के बाद इस फसल के पौधों को न तो कोई जानवर एवं पशु पक्षियों से नुकसान होता है और ना ही कीटों का प्रकोप  बहुत होता है। दलहनी पौधा होने के कारण भूमि की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाने में सहायक होता है। इसकी पत्तिायों, फलियों को विदेशों को निर्यात करके विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है। सोनामुखी की खेती भारत में मुख्य रूप से होती है। देश में सोनामुखी का उत्‍पादन राजस्थान, तमिलनाडु, गुजरात में विशेष रूप से होता है। सनाय के लिए जलवायु एवं मृदा : सोनामुखी शुष्क जलवायु एवं कम वर्षा वाले क्षेत्रों (30-40 सेमी) के लिए उपयुक्त है। रेतीली दोमट मिट्टी जिसका पी.एच.मान 7.0-8.5 के मध्य हो उपयुक्त रहती है। सोनामुखी के खेत की तैयारी: सोनामुखी...

Increase profits by scientific cultivation of sunflower सूरजमुखी एक महत्वपूर्ण तिलहनी फसल है यह पहले भारत में अलंहत पौधे के रूप में उगाई जाती थी। सूरजमुखी को तिलहनी फसल के रूप में 1969 में परिचय कराया गया। पिछले कुछ वर्षों से अपनी उत्पादन क्षमता व अधिक मूल्य के कारण सूरजमुखी की खेती, हरियाणा के किसानों में दिनोंदिन लोकप्रिय होती जा रही है। सूरजमुखी को बड़े पैमाने पर उगाने से न केवल खाद्य तेल उपलब्ध होगा बल्कि विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी। सूरजमुखी जल्दी पकने वाली फसल है, सूखा को सहन कर सकती है, तापमान एवं प्रकाश के प्रति असंवेदनशील है अतःसूरजमुखी को खरीफ, रबी एवं ज़ायद मौसम में उगा सकते हैं। लेकिन उत्तरी भारत के लिए सबसे सही मौसम ज़ायद का है क्योंकि इस मौसम में मधुमक्खी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होती है, जो इसकी पैदावार के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है इसके तेल से वनस्पति घी एवं बीमारियों के उपचार के लिए बहुत उपयोगी है। सूरजमुखी की प्रमुख किस्में:- समय पर बिजाई के लिए सूरजमुखी की प्रमुख किस्में: (1) एच.एस.एफ.एच.848 : यह किस्म चै.चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय,हिसार द्वारा विकसित की गई है। यह अधिक उपज देने वाली संकर किस्म है इसकी औसत पैदावार 22-25 किवंटल/हैक्ट. है । इसके दानों में तेल की मात्रा 40 प्रतिशत होती है यह किस्म पकने में 95-100 दिन लेती हैं...

Production technology of Coriander धनिया अम्बेलीफेरी या एपिएसी कुल का पौधा है। इसके वंश को कोरिएन्डम एवं प्रजाति सटाइवम है। इसका गुणसूत्र संख्या 2n = 22 होता है। धनिया के पौधे चिकनी सतह वाले 20-90 सेमी0 ऊॅंचाई के होते हैं। इसके नीचे की पत्तियाँ साधारणतया 2.5-10 सेमी0 लम्बी एवं 2.75 सेमी0 चौड़ी होती है। ऊपर की पत्तियाँ छोटे-छोटे भागों में विभक्त होकर पतले पर्ण फलकों में बदल जाती है। इसके पुष्प छोटे आकार के छत्रक में आते हैं। पत्ती वाली सब्जियों में धनिया का प्रमुख स्थान है। इसकी मुलायम पत्तियाँ को चटनी एवं सॉस आदि बनाने में प्रयोग किया जाता है। इसकी हरी पत्तियों को सब्जी एवं अन्य व्यजंनों को सुगन्धित करने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसके दाने को मसाले के रूप् में प्रयोग किया जाता है। धनिया की पत्तियाँ पोषण की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं।  इसमें पर्याप्त मात्रा में विटामिन सी, कैरोटीन एवं अन्य खनिज तत्व पाये जाते हैं। इसकी पत्तियों में पाये जाने वाले पोषक तत्व की सारणी निम्नलिखित है पौष्टिक तत्व पत्ती (प्रति 100 ग्राम खाने योग्य भाग) नमी 86.3 ग्राम प्रोटीन 3.3 ग्राम वसा 0.6 ग्राम खनिज लवण 2.3 ग्राम रेशा 1.2 ग्राम कार्बोहाइडेटस 6.3 ग्राम ऊर्जा 44 किलो कैलोरी कैल्शियम 184 मि0ग्रा0 फास्फोरस 7.0 मि0ग्रा0 आयरन 1.42 मि0ग्रा0 कैरोटीन 6918 माइक्रोग्राम मैग्नीशियम 31.0 मि0ग्रा0 सोडियम 583 मि0ग्रा0 पोटैशियम 256 मि0ग्रा0 कॉपर 0.14 मि0ग्रा0 मैंगनीज 0.50 मि0ग्रा0 मालिब्डेनम 1.12 मि0ग्रा0 जिंक 0.32 मि0ग्रा0 क्रोमियम 0.014 मि0ग्रा0 सल्फर 49.0 मि0ग्रा0 क्लोरीन 43.0 मि0ग्रा0 धनि‍ये की खेती के लि‍ए जलवायु एवं भूमि: धनिया की खेती शीतोष्ण एवं उपोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में की जाती...