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Crop Cultivation

Main pulse crop of dry land - Moth bean मोठबीन  [विग्ना एकोनिटीफोलिया]  फैबेसी परिवार का एक प्रमुख संभावित दलहन है जिसकी क्रोमोजोम संख्या २एन =२२ है। अरोड़ा और नायर (१९८४) के अनुसार  दक्षिण एशियाइ क्षेत्र  मोठबीन  का उद्गमस्थल है। दुनिया के विभिन्न स्थानों में  मोठबीन  को मटकी एवं  तुर्की ग्राम के रूप में भी जाना जाता है। यह पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप के सूखा और गर्म क्षेत्रों में बोया जाता है ।  मोठबीन  १५ विग्ना प्रजातियों के बीच उच्चतम गर्मी सहिष्णुता दर्शाती है, यह १२ दिनों के लिए ३६ डिग्री सेल्सियस और ४० डिग्री सेल्सियस तापमान ११ दिन तक सहन कर सकने में कामयाब है, इसके विपरीत अन्य सभी विग्ना प्रजातियां ४० डिग्री सेल्सियस में मृत हो जाती हैं। राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में लगभग १६.२ लाख हेक्टेयर क्षेत्र और ७.९ लाख टन उत्पादन के साथ ४८६ किलो / हेक्टेयर की औसत उपज है। अकेले राजस्थान क्षेत्र (१३.६ लाख हेक्टेयर) और उत्पादन (३.७ लाख टन) में ९५ फीसदी से अधिक का योगदान देता है। इस फसल का वितरण ३०° उत्तर  और ३०° दक्षिण के बीच मैदानी इलाकों या बहुत कम ऊंचाई तक सीमित है।  इसे कई प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है लेकिन हल्की मिट्टी में सबसे अच्छा होता है। मटकी की खेती का दायरा शुष्क क्षेत्रों के लिए सीमित है,...

Improved cultivation method of Papaya पपीता बहुत ही पौष्टिक एवं गुणकारी फल है। पपीता स्वास्थ्यवर्द्धक तथा विटामिन ए व कई औषधियों गुणों से भरपूर होता है, साथ ही सेहत के लिए भी बहुत लाभदायक होता है. पपीते की सबसे बड़ी खासियत ये है कि ये बहुत कम समय फल दे देता है I पपीते का फल थोड़ा लम्बा व गोलाकार होता है तथा गूदा पीले रंग का होता है। गूदे के बीच में काले रंग के बीज होते हैं। कच्चा पपीता हरे रंग का और पकने के बाद हरे पीले रंग का होता है। एक पपीते का वजन 300, 400 ग्राम से लेकर 1 किलो ग्राम तक हो सकता है। पपीता न केवल सरलता से उगाया जाने वाला फल है, बल्कि जल्‍दी लाभ देने वाला फल भी है I पपीते में कई महत्वपूर्ण पाचक एन्ज़ाइम तत्व मौजूद रहते है I यह स्‍वास्‍थवर्धक तथा लोक प्रिय है, इसी से इसे अमृत घट भी कहा जाता है, इसके ताजे फलों को सेवन करने से लम्‍बी कब्‍जियत की बिमारी भी दूर की जा सकती है। इसलिए बाज़ार में पपीते की मांग लगातार बढ़ रही है. पपीते की फसल किसानों को कम समय में अधिक लाभ कमाने का अवसर देती है I इसकी खेती व्यवसायक रूप में की जाती है. इसे एक बार लगा देने पर दो फसल...

Cultivation of Isabgol (Plantago ovata) through scientific techniques Plantago ovata Forsk. एक अत्यंत महत्वपूर्ण औषधीय फसल है।औषधीय फसलों के निर्यात में इसका प्रथम स्थान हैं। वर्तमान में हमारे देश से प्रतिवर्ष 120 करोड़ के मूल्य का ईसबगोल निर्यात हो रहा है। विश्व में इसके प्रमुख उत्पादक देश ईरान, ईराक, अरब अमीरात, भारत, फिलीपीन्स इत्यादि हैं। भारत में इसका उत्पादन प्रमुख रूप से गुजरात,राजस्थान,पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश एवं मध्यप्रदेश में करीब 50 हजार हेक्टयर में हो रहा हैं। म. प्र. में नीमच, रतलाम, मंदसौर, उज्जैन एवं शाजापुर जिले प्रमुख हैं। ईसबगोल का उपयोग ईसबगोल का औषधीय उपयोग अधिक होने के कारण विश्व बाजार में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। ईसबगोल के बीज पर पाए जाने वाला छिलका ही इसका औषधीय उत्पाद है जिसे ईसबगोल की भूसी के नाम से जाना जाता है। भूसी और बीज का अनुपात 25:75 रहता है। इसकी भूसी में पानी सोखने की क्षमता अधिक होती है। इसलिए इसका उपयोग पेट की सफाई, कब्जीयत, दस्त आव पेचिस, अल्सर, बवासीर जैसी शारीरिक बीमारियों के उपचार में आयुर्वेदिक दवा के रूप में किया जाता है। इसके अलावा आइसक्रीम रंग रोगन, प्रिंटिंग आदि उद्योगों में भी इसका किया जाता है। इसकी मांग एवं उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए ईसबगोल की खेती वैज्ञानिक तकनीक से करना आवश्यक है। ईसबगोल के लिए जलवायु एवं भूमि ईसबगोल के लिए...

Green fodder production with guinea grass  बहुवर्षीय हरे चारे के लिए गिनी घास का महत्वपूर्ण योगदान है| गिनी घास (Panicum maximum Jacq.) का जन्म स्थान गिनी, अफ्रीका को  बताया जाता है| ये बहुत ही तेजी से बढने वाली और पशुओ के लिए  एक स्वादिस्ट घास है|   इससे वर्ष मैं 6-8 कटाई तक कर सकते है| भारत में यह घास 1793 में आई| इसमें 10-12 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन, रेशा 28-36 प्रतिशत, NDF 74-75 प्रतिशत , पत्तो की पाचन क्षमता  55-58 %, लिगनिन  3.2-3.6 प्रतिशत होती है| गिनी घास के लि‍ए जलवायु गिनी घास  गर्म मौसम की फसल है घास के लिए उपयुक्त तापमान, 31 डिग्री सेंटीग्रेड  चाहिए और 15 डिग्री सेंटीग्रेड के नीचे इसकी बढवार कम हो जाती है| यह 38 डिग्री सेंटीग्रेड तक बहुत  अच्छी तरह से बढवार करती है| यह घास छाया को बहुत हद तक सहन कर सकती है इसलिए पेडो के बीच में बहुत अच्छी तरह से हो जाती है यह 60 प्रतिशत तक छाया सहन कर सकती है  | जिन क्षेत्रो में नमी 70 प्रतिशत तक होती है, वो क्षेत्र गिनी के लिए अनुकूल होते है | गिनी घास के लि‍ए भूमि और भूमि की तैयारी  हलके विन्यास वाली भूमि इसके लिए उचित होती है, जैसे के बलुई दोमट भूमि| उ़चित जल निकास वाली उपजाऊ भूमि अधिक उत्पादन के लिए उपयुक्त होती है|...

Improved technology for cultivation of Mungbean मूंग भारत में उगायी जाने वाली, कम समय मे पकने वाली, महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। इन फसल में वातावर्णीय नाइट्रोजन को पौधों द्वारा ग्रहण करने योग्य बनाने की अदभुत क्षमता होती हैं। जिससे पौधों को कम उर्वरक की आवश्यकता पड़ती है, और उत्पादन लागत कम हो जाती है। इनकी खेती लगभग सभी राज्यों मे की जाती है। परन्तु महाराष्ट, आन्ध्र प्रदेश,  उत्तर प्रदेश , राजस्थान, मध्य प्रदेश तमिलनाडु तथा उड़ीसा, मूंग तथा उड़द उत्पादन के प्रमुख राज्य हैं। मूंग की खेती के लि‍ए भूमि की तैयारी मूंग की खेती के लिए दोमट एवं बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। भूमि में उचित जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चहिये। पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल या डिस्क हैरो चलाकर करनी चाहिए तथा फिर एक क्रॉस जुताई हैरो से एवं एक जुताई कल्टीवेटर से कर पाटा लगाकर भूमि समतल कर देनी चाहिए। मूंग की  बीज की बुवाई मूंग की बुवाई 15 जुलाई तक कर देनी चाहिए।  देरी से वर्षा होने पर शीघ्र पकने वाली किस्म की वुबाई 30 जुलाई तक की जा सकती है। स्वस्थ एवं अच्छी गुणवता वाला तथा उपचरित बीज बुवाई के काम लेने चाहिए। वुबाई कतरों में करनी चाहिए। कतरों के बीच दूरी 45 से.मी. तथा पौधों से पौधों की दूरी 10 से.मी. उचित है। मूंग फसल में खाद...

Multi harvesting sorghum fodder crop cultivation techniques  भारत में  मात्र 4 प्रतिशत भूमि पर चारे की खेती की जाती है तथा एक गणना के अनुसार भारत में 36 प्रतिशत हरे चारे एवं 40 प्रतिशत सूखे चारे की कमी है | अत: बढती हुई आबादी एवं घटते हुए कृषि क्षेत्रफल को ध्यान में रखते हुए हमें उन चारा फसलों की खेती करनी होगी जो लम्बे समय तक पशुओं को पोष्टिक चारा उपलब्ध कराने के साथ साथ हमारी जलवायु में आसानी से लगाई जा सके | शरद ऋतू में बरसीम, जई, रिजका, कुसुम आदि की उपलब्धता मार्च के पहले पखवाड़े तक बनी रहती है किन्तु बहु कट चारा ज्वार से पशुओं को लम्बे समय तक हरा चारा आसानी से मिल सकता है  ज्वार का चारा स्वाद एवं गुणवत्ता में बहुत अच्छा होता है | शुष्क भार के आधार पर  ज्वार चारे में औसत 9 से 10 प्रतिशत प्रोटीन, 8-17 प्रतिशत शर्करा, 30-32 प्रतिशत फाइबर, 65-72 प्रतिशत एन.डी. एफ., 36 प्रतिशत सेलुलोज एवं 21 से 26 प्रतिशत हेमी सेलुलोज पाया जाता है | ज्वार की पानी उपयोग करने की क्षमता भी अन्य चारा  फ़सलों की तुलना में अधिक है। शीघ्र बढवार एवं अधिक चारा उत्पादन क्षमता एवं कम पानी में भी अधिक उत्पादन देने के कारण यह  एक आदर्श चारा फसल है| सामान्यत: एक कटान वाली ज्वार में...

Mustard cultivation with scientific technique सरसों राजस्थान की प्रमुख तिलहनी फसल हैं। सरसों की फसल सिंचित क्षेत्रों एवं संरक्षित नमी के बारानी क्षेत्रों में ली जा सकती हैं। यह फसल कम सिंचाई सुविधा और कम लागत में भी अन्य फसलों की तुलना में अधिक लाभ प्रदान करती है। इसकी पत्तियॉ हरी सब्जि के रूप में प्रयोग की जाती है तथा सूखे तनो को ईधन के रूप में प्रयोग किया जाता हैं। सरसों के तेल में तीव्र गंध सिनिग्रिन नामक एल्केलॉइड के कारण होती हैं। मृदा :- सरसों की खेती रेतिली से लेकर भारी मटियार मृदाओ में की जा सकती हैं। बुलई दोमट मृदा सर्वाधिक उपयुक्त होती हैं। खेत की तैयारी :- खरीफ फसल की कटाई्र के बाद एक गहरी जुताई करनी चाहिए तथा इसके बाद 3-4 बार देशी हल से जुताई करना लाभप्रद होता हैं। जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत को तैयार करना चाहिए असिंचित खेत्रो में वर्षा के पहले जुताई करके खरीफ मौसम में खेत पडती छोडना चाहिए जिससे वर्षा के पानी का संरक्षण हो सके। उन्नत किस्में :- पूसा बोल्ड :- मध्यम कद कद वाली इस किस्म के 1000 दानो का वजन 6 ग्राम के लगभग होता हैं। यह किस्म 103-135 दिन मे पककर तैयार हो जाती है व औसत वजन 12-15 क्ंविटल प्रति हैक्टयर तक देती हैं इस किस्म में तेल की की...

Improved cultivation of Blackgram (Urad) हमारे देश में उड़द का उपयोग मुख्य रूप से दाल के लिये किया जाता है। इसकी दाल अत्याधिक पोषक होती है। विशेष तौर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसे लोग अधिक पसन्द करते है। उड़द को दाल के साथ-साथ भारत में भारतीय व्यंजनों को बनाने में भी प्रयुक्त किया जाता है तथा इसकी हरी फलियाँ से सब्जी भी बनायी जाती है। उड़द का दैनिक आहार में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर कैल्शियम व विटामिन बी काम्पलेक्स तथा खनिज लवण भी बहुतायत पाये जाते है। इसके साथ - साथ अन्य दालो की तुलना में 8 गुणा ज्यादा फास्फोरस अम्ल के अलावा आरजिनीन, ल्यूसीन, लाइसीन, आइसोल्यूसीन आदि एमिनो एसिड के पूरक सम्बन्ध के कारण जैव वैज्ञानिक मान अत्याधिक बढ़ जाता है। उड़द की जड़ो में गाठो के अन्दर राइजोबियम जीवाणु पाया जाता है जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर पौधे का नाइट्रोजन की आपूर्ति करता है। इसलिए उड़द की फसल से हरी खाद भी बनायी जाती है, जिसमें लगभग 40-50 किग्रा. प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन प्राप्त होती है।  उड़द, देश की एक मुख्य दलहनी फसल है इसकी खेती मुख्य रूप से खरीफ में की जाती है लेकिन जायद मे समय से बुवाई सघन पध्दतियो को अपनाकर भारत में उड़द मैदानी भाग उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाण, मध्य प्रदेश, पश्चिमी...