Agriculture Knowledge for Everyone

Miscellaneous

Solar Energy Based Irrigation System: A Modern Technique कृषि कायों में लगातार यांत्रिक उपकरणो के उपयोग से खेती मे उर्जा की खपत बढती जा रही है फलस्वरूप कृृषि लागत भी वढ रही है। खेती में विभिन्न प्रकार के कृषि कार्यों के लिए विद्युत उर्जा का उपयोग होता है।  उर्जा की बढती कीमत में भी खेती को लाभदायक बनाने के लिए सस्ती वैकल्पिक उर्जा श्रोत की आवश्यकता है जिसे आजकल सौर ऊर्जा के द्वारा पूरा किया जा रहा है  सौर यंत्र एक ऐसा यंत्र है जो सूर्य की तेज किरणों को अवशोषित करके विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है जिससे विभिन्न प्रकार के कृषि यंत्र चलाए जाते हैं। इससे न केवल विद्युत व विद्युत बिल की बचत होती है बल्कि यह किसानों के लिए भी बहुत सुरक्षित मानी जाती है साथ ही साथ पर्यावरण प्रदूषण को भी कम करती है। आधुनिक समय में कृषि में इस तरह  के नवीनीकरण ऊर्जा का प्रयोग बहुतायत में किया जाता है किसान अपने प्रक्षेत्र पर ही इस प्रकार के पैनल को लगाते हैं तथा सूर्य के तेज प्रकाश को सौर ऊर्जा मैं परिवर्तित कर कृषि कार्य में प्रयोग करते हैं। इस तरह विद्युत की बचत करने से किसानों की अपनी कुल आय में अतिरिक्त आय का इजाफा हो जाता है क्योंकि विद्युत में आने वाले बिल की बचत होती...

Consuming Spiny gourd for good health कंटोला (मोमोर्डिका डायोइका) एक बारहमासी कुकुरबिटेसी कुल की लता है, जिसे आमतौर पर काकरोल, कंकोड़ा, ककोरा, पपोरा, खेक्सा, कांक्रों, चठैल, कारटोली, कंटोली, बन करौला, भात करोला, काक्सा, स्पाइनी लौकी एवं जंगली करेला आदि के नाम से जाना जाता है। यह पादप जगत में खाद्य पौधों के अनुवांशिक विविधता वाले समूहों में से एक है। इस परिवार का पौधा वन-संवेदनशील, सूखा सहिष्णु, नम एवं खराब जल निकासी वाली मिट्टी के प्रति असहिष्णु होता है। समय के साथ-साथ उपभोक्ताओं की बढ़ती मांग के कारण कंटोला के उत्पादन में वृद्धि हुई है। यह फाइटोकेमिकल (अल्कलॉइड) की उपस्थिति के कारण कड़वे स्वाद के लिए जाना जाता है, तथा इनमें औषधीय गुणों की एक विस्तृत श्रृंखला होती है। इसकी उत्पत्ति इंडो-मलयाई क्षेत्र में मानी जाती है, अब यह भारत, बंग्लादेश, श्रीलंका, म्यानमार, चीन, जापान, दक्षिण पूर्व एशिया, पोलिनेशिया, उष्णकटिबंधीय अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में पाया जाता है। असम और मेघालय की गारो पहाडियों पर 1500 मीटर की ऊंचाई तक इसकी खेती की जाती है। इसका उपयोग न केवल विभिन्न रोगों के लिए निवारक और उपचारात्मक एजेंट के रूप में किया जाता है, बल्कि हजारों वर्षों से महत्वपूर्ण पोषण मूल्य वाली सब्जी के रूप में भी किया जा रहा है। कंटोला की लम्बाई लगभग 5-7 मीटर होती है। यह गर्मियों की एक लोकप्रिय सब्जी...

Global warming is a growing threat to the environment पूरे विश्व में इंसानों की लापरवाही और निजी स्वार्थ से हमारी धरती की सतह दिनों-दिन गर्म होती जा रही है। पिछले 50 वर्षों में, औसत वैश्विक तापमान रिकॉर्ड इतिहास में सबसे तेज दर से बढ़ गया है और वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग उत्सर्जन को नहीं रोका गया, तो अगली शताब्दी तक औसत तापमान 10 डिग्री फ़ारेनहाइट तक बढ़ सकता है। ग्लोबल वार्मिंग के क्या कारण है? ग्लोबल वार्मिंग के कारण होने वाले जलवायु परिवर्तन के लिये सबसे अधिक जिम्मेदार ग्रीन हाउस गैस हैं। ग्रीन हाउस गैसें, वे गैसें होती हैं जो बाहर से मिल रही गर्मी या ऊष्मा को अपने अंदर सोख लेती हैं। ग्रीन हाउस गैसों का इस्तेमाल सामान्यतः अत्यधिक सर्द इलाकों में उन पौधों को गर्म रखने के लिये किया जाता है जो अत्यधिक सर्द मौसम में खराब हो जाते हैं। यह गैस सूरज से आने वाली किरणों की गर्मी सोख लेती है और पौधों को गर्म रखती है। ठीक यही प्रक्रिया पृथ्वी के साथ होती है। सूरज से आने वाली किरणों की गर्मी की कुछ मात्रा को पृथ्वी द्वारा सोख लिया जाता है। इस प्रक्रिया में हमारे पर्यावरण में फैली ग्रीन हाउस गैसों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। अगर इन गैसों का अस्तित्व हमारे में न होता तो...

स्मार्ट फ़ूड और स्मार्ट फ़सल के रूप में बाजरा India celebrated the national year of millets in 2018. The U.N. General Assembly recently adopted a resolution, sponsored by India and supported by more than 70 countries, declaring 2023 as the International Year of Millets. The main objective of declaring this resolution is  to increase public awareness about health benefits of millets and their suitability for cultivation under harsh conditions under changing climatic senerio. Millet is a common term to categorize small-seeded and known for high nutritive value that are often termed nutri-cereals, and includes sorghum (jowar), pearl millet (Bajra), Finger millet (ragi ), small millet (Sama), foxtail millet, proso millet (Variga), barnyard millet, kodo millet and other millets. Nowadays, there are many global issues like the rapid increase in population, global climate change, increasing food prices, water scarcity, environmental contamination, and other socio-economic impacts. These factors could adversely affecting regional agricultural developments and reduced grain production, resulting in high food prices and major food security issues worldwide. Millets are also know as  “poor man food” as it is easily available, highly nutritious, very cheap, especially for those who live in hot and dry areas. As per report of the World Bank, about 815 million people worldwide are facing the problem of hunger and malnutrition....

Methods for nutrient conservation of food भोजन बनाते समय उसकी पौष्टिकता टिकाये रखना भी एक कला है। आहार से पौष्टिक तत्वों की प्राप्ति हमें तभी होगी जब उसमे पौष्टिकता बरकरार होगी। अज्ञानता व लापरवाही के कारण हम भोजन के पौष्टिक तत्वों को नष्ट कर देते हैं। कुछ ऐसे सुझाव, जिनका पालन करके आप कम खर्च में अधिक विटामिन, खनिज तथा प्रोटीन प्राप्त कर सकती हैं, इस प्रकार है।  प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ - सोयाबीन, फलियां व दालें प्रोटीन के अच्छे व सस्ते स्रोत हैं। अगर इन्हें पकाने और खाने से पहले अंकुरित भी कर लिया जाए तो इनमें विटामिनों की मात्रा और भी बढ़ जाती है। अंडे भी प्रोटीन का एक अच्छा स्रोत है। अन्य मांसों की अपेक्षा गुर्दे, कलेजी तथा जीगर सस्ते लेकिन उतने ही पौष्टिक होते हैं। अन्न जैसे गेहूँ, चावल व अन्य अन्न तब अधिक पौष्टिक होते हैं जब कुटाई करके उनका चोकर बाहरी सतह अलग न कर दी जाए। फल सब्जियां - इनको तोड़ने के बाद अगर इनका शीघzता शिघz प्रयोग किया जाए तो इनमें अधिक पौष्टिकता होती है। अगर आप इनका भंडारण करते हैं तो इनके विटामिन बचाये रखने के लिए इन्हें ठंडे व छायादार वाले स्थान में रखें। सब्जियां पकाते समय कम से कम पानी का प्रयोग करें क्योंकि पकाते समय सब्जियों के विटामिन पानी में मिल जाते हैं।...

Modern system of agricultural market कृषि बाजार के वर्तमान स्वरूप में किसानों (उत्पादकों) तथा उपभोक्ताओं के मध्य बिचौलियों (मध्यस्थों) का जरूरत से अधिक दखल होने से किसानों के हितों को भारी नुकसान हो रहा है। किसी भी प्रकार के बाजार में मध्यस्थों की सेवाओं को अत्यंत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। मगर जब उनका दखल जरूरत से अधिक होने लगता है तब यह नुकसानदायक होता है। आज की स्थिति में कुल लाभ का 50 से 60 प्रतिशत बाजार खर्च तथा मध्यस्थों के भेंट चढ़ जाता है तथा मात्र 40 से 50 प्रतिशत रकम ही किसानों तक पहुंच पाती है। कृषि उपज के संग्रह तथा उनके विक्रय के लिये जिस तरह के सहकारी बाजार व्यवस्था की आवश्यकता है उसका आज भी अभाव महसूस हो रहा है। बाजार व्यवस्था में कई प्रकार की कमियां देखने को मिलती है उदाहरण के लिये नियमित बाजारों में नियमों के अनुसार नीलामी नहीं होती है। कई व्यापारी समूह बनाकर पहले से ही कृषि उत्पादों का भाव निर्धारित कर लेते है। परिणामस्वरूप किसानों को उत्पादों का सही भाव नहीं मिल पाता है तथा वे ठगा सा महसूस करते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में कृषि उत्पाद को बेचने के लिये कई व्यवस्थाएं प्रचलन में हैं । ये सभी वैकल्पिक रूप किसानों को उनकी उपज का किफायती मूल्य प्रदान करवाने और उनको अधिक सक्षम बनाने...

Importance of Integrated Farming System समन्वित कृषि प्रणाली, न्यूनतम प्रतिस्पर्धा और अधिकतम पूरकता के सिद्धान्त पर आधारित है और इसमें कृषि-अर्थशास्त्रीय प्रबन्धन के परिष्कृत नियमों का उपयोग करते हुए किसानों की आमदनी, पारिवारिक पोषण के स्तर और पारिस्थितिकीय प्रणाली सम्बन्धी सेवाओं का टिकाऊ और पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल विकास करने का लक्ष्य रखा जाता है। समन्वित कृषि प्रणाली कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ाने परिवार के लिये सन्तुलित पौष्टिक आहार जुटाने, पूरे साल आमदनी व रोजगार का इन्तजाम करने तथा मौसम और बाजार सम्बन्धी जोखिम कम करने में भी मदद मिलती है। इससे खेती में काम आने वाली वस्तुओं के लिये किसानों की बाजार पर निर्भरता भी कम होती है। भारत में खाद्य और पौष्टिक आहार सुरक्षा सुनिश्चित करने की कुंजी छोटे किसानों (2 हेक्टेयर से कम) के पास है और ग्रामीण क्षेत्रों में खुशहाली लाने के लिये खेती की टिकाऊ प्रणालियों के साथ उन्हें सही दिशा में विकसित होने का मौका देना भी अत्यन्त आवश्यक है। समन्वित कृषि प्रणाली के अनिवार्य घटक मिट्टी की जीवन्तता को बनाए रखना और प्राकृतिक संसाधनों के कारगर प्रबन्धन से खेत को टिकाऊ आधार प्रदान करना। इसके अन्तर्गत महत्वपूर्ण निम्न प्रकार से हैं:. कृषि आधान में आत्मनिर्भरता : अपने लिये बीजों का अधिक-से-अधिक उत्पादन करना, अपने खेतों के लिये खुद कम्पोस्ट खाद बनाना, वर्मी कम्पोस्ट, वर्मीवॉश,...

Nitrate leaching and ground water contamination in maize based cropping system of Bihar मक्का, चावल और गेहूं के बाद तीसरी सबसे महत्वपूर्ण फसल है। मक्का उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए नाइट्रोजन और पानी दो महत्वपूर्ण कारक हैं। उच्च उत्पादन को आगे बढ़ाने के लिए, उत्पादकों द्वारा अत्यधिक नाइट्रोजन उर्वरक (400 से 600 किग्रा नाइट्रोजन/ हेक्टेयर) को वर्तमान रोटेशन प्रणाली में लागू किया गया है, जो फसल की मांग से अधिक है। फसल में दिया गया, नाइट्रोजन उर्वरक या तो फसलों द्वारा अवशोषित या जड़ क्षेत्र में संग्रहीत किया जाता है, या अमोनिया वाष्पीकरण, नाइट्रोजन लीचिंग, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन गैस उत्सर्जन से कम होजाता है। जड़ क्षेत्र में जमा नाइट्रोजन मिट्टी से,पानी के नीचे की ओर बढ़ता है, और अंततः भूजल में प्रवेश करता है। नाइट्रोजन उर्वरकों और बाढ़ सिंचाई के अति प्रयोग से नाइट्रोजन का गंभीर निक्षालन हुआ और नाइट्रेट के साथ भूजल के दूषित होने का खतरा बढ़ गया। इसलिए उपज क्षमता और भूजल संसाधनों के सतत उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए पानी और नाइट्रोजन उर्वरक का प्रबंधन करना आवश्यक है। वर्तमान स्थिति पत्र का उद्देश्य भूजल में नाइट्रेट संदूषण के बारे में जानकारी प्रदान करना है। मिट्टी में नाइट्रेट-नाइट्रोजन के संचय और मिट्टी से उनके निक्षालन को नियंत्रित करने और मक्का की उपज क्षमता को बनाए रखने के लिए रणनीति...