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Precision Agriculture, Present Status & Scope: A Review भारत में 328.7 मिलियन हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र है, जिसमें से 182 मिलियन हेक्टेयर भूमि, भूमि क्षरण से प्रभावित होती है, 141.33 मिलियन हेक्टेयर भूमि जल के क्षरण के साथ-साथ हवा के कटाव, जल-जमाव और रासायनिक क्षरण अर्थात लवण और क्षरण के कारण प्रभावित होती है। प्रौद्योगिकी में क्रांति ने भारतीय परिवेश को बदल दिया है और साथ ही साथ खेती के लिए नई उम्मीदें पैदा की हैं। इसलिए, स्थिरता और आर्थिक दृष्टिकोण से, इन विकासशील नई तकनीकों पर काबू पाने और कृषि क्षेत्र में संसाधनों के समुचित उपयोग के साथ कुशलतापूर्वक लागू किया जाना आवश्यक है। सटीक कृषि एक ऐसी नई और अत्यधिक आशाजनक तकनीक है, जो विकसित देशों में तेजी से फैल रही है। कृषि प्रौद्योगिकी मापदंडों (जैसे मिट्टी, बीमारी) की स्थानिक और लौकिक परिवर्तनशीलता की पहचान, विश्लेषण और प्रबंधन करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) और उपग्रह आधारित प्रौद्योगिकी (जैसे वैश्विक स्थिति प्रणाली, रिमोट सेंसिंग आदि) के अनुप्रयोग द्वारा कृषि प्रबंधन में सुधार के लिए यह एक वैज्ञानिक प्रयास है। सटीक खेती की आवश्यकता- विकसित देशों में प्रिसिजन फार्मिंग की लोकप्रियता के परिणामस्वरूप कृषि उत्पादकता में अधिकतम वृद्धि होती है, जिसमें विभिन्न तकनीकों जैसे उपग्रह और भौगोलिक सूचना प्रणाली का उपयोग किया जाता है। किसानों को सीधे कृषि उत्पादन के लिए इनपुट की आपूर्ति...

Zero Budget Natural Farming जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग मूल रूप से महाराष्ट्र के एक किसान सुभाष पालेकर द्वारा विकसित रसायन मुक्त कृषि का एक रूप है।सुभाष पालेकर के नाम पर इसे सुभाष पालेकर नेचुरल फार्मिंग यानी जीरो बजट प्राकृतिक खेती कहा जाता है. यह विधि कृषि की पारंपरिक भारतीय प्रथाओं पर आधारित है। इस खेती के पैरोकारों का कहना है कि यह खेती देसी गाय के गोबर और मूत्र पर आधारित है. इस विधि में कृषि लागत जैसे कि उर्वरक, कीटनाशक और गहन सिंचाई की कोई आवश्यकता नहीं होती है। जिससे कृषि लागत में आश्चर्यजनक रूप से गिरावट आती है, इसलिये इसे ज़ीरो बजट नेचुरल फार्मिंग का नाम दिया गया है।इस विधि के अंतर्गत किसी भी फसल का उत्पादन करने पर उसका लागत मूल्य शून्य (ज़ीरो) ही आता है। जीरो बजट प्राकृतिक खेती के अंतर्गत घरेलू संसाधनों द्वारा विकसित प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल किया जाता है जिससे किसानों को किसी भी फसल को उगाने में कम खर्चा आता है और कम लागत लगने के कारण उस फसल पर किसानों को अधिक लाभ प्राप्त होता है। जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग का आधार है जीव-अमृत. यह गायब के गोबर, मूत्र और पत्तियों से तैयार कीटनाशक का मिक्सचर है. सुभाष पालेकर  सुभाष पालेकर एक पूर्व कृषि वैज्ञानिक हैं और इन्होंने पारंपरिक भारतीय कृषि प्रथाओं को लेकर कई रिसर्च...

Wheat's contribution in prevention of malnutrition विश्व में गेहूँ सबसे व्यापक रूप से खेती की जाने वाली खाद्यान्न फसल है। यह दुनिया की 40 प्रतिशत आबादी के लिए कुल आहार कैलोरी एवं प्रोटीन का 20 प्रतिशत योगदान देने वाला एक मुख्य भोजन है। भारत में उत्पादित कुल खाद्यान्न में 36.7 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ खाद्य टोकरी की खपत में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा गेहूँ को बड़े पैमाने पर खरीदा जाता है, जिसे खाने के लिए अधिकांश आबादी को वितरित किया जाता है। अनाजों से मिलने वाली ऊर्जा में गेहूँ सबसे सस्ते स्रोतों में से एक है, इसकी खपत से प्रोटीन (20 प्रतिशत) और कैलोरी (19 प्रतिशत) उपयोग का एक बड़ा हिस्सा प्राप्त होता है। मनुष्यों के समुचित विकास एवं उचित वृद्धि के लिए पौष्टिक आहार अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए शरीर के चयापचय को बनाए रखने के अलावा, बीमारियों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। भोजन हमारी दैनिक उपापचय आवश्यकता को पूरा करने के लिए ऊर्जा, प्रोटीन, आवश्यक वसा, विटामिन, एंटीऑक्सिडेंट एवं खनिज लवण प्रदान करता है। इनमें से अधिकांश को मानव शरीर में संश्लेषित नहीं किया जा सकता है, इसलिए आहार के माध्यम से पूरा किया जाता है। इसके अतिरिक्त, इसमें मौजूद पोषण-विरोधी तत्व मानव...

रासायनिक उर्वरको के उपयोग से उत्पन्न ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का अल्पीकरण भारत में बढ़ती आबादी के लिए उर्वरक का बढ़ता उपयोग दोगुना कृषि उत्पादन के लिए अपरिहार्य हो गया है। हालांकिए कृषि में उर्वरक की बढ़ती खपत भी पर्यावरण प्रदूषण के लिए चिंता का कारण है। पर्यावरण पर उर्वरक उपयोग के विभिन्न प्रभाव ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन, भूजल में नाइट्रेट प्रदूषणए कृषि भूमि में भारी धातु का निर्माण और यूट्रोफिकेशन हैं। विभिन्न पर्यावरणीय प्रभावों के बीच, उर्वरक उपयोग से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन वैश्विक और भारतीय जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण ड्राइवरों में से एक है। वायुमण्डलीय ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती हुई सघनता के कारण जलवायु परिवर्तन होना निष्चित है। मानवजनित ग्रीनहाउस गैसों के कुल उत्सर्जन का लगभग 24 प्रतिषत हिस्सा कृषि क्षेत्र का है तथा बढ़ती हुई वैष्विक जनसंख्या के भोजन की आपूर्ति हेतु भविष्य में कृषि उत्पादन की मात्रा अधिक रहेगी। कार्बन डाइ ऑक्साइड (CO2), मीथेन (CH4), तथा नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) का मिश्रित रूप ग्रीन हाउस गैसें कहलाती है, जो पृथ्वी के बढ़ते हुए तापमान के लिए उत्तरदायी है। वैष्विक स्तर पर खेती में प्रयुक्त मिट्टी से लगभग 60 प्रतिषत N2O तथा लगभग 50 प्रतिषत CH4 का उत्सर्जन होता है। राष्ट्रीय स्तर पर भारत में इस उर्वरक से युक्त खेती की मिट्टी से लगभग 23 प्रतिषत कुल उत्सर्जन होता...

Increase dietary quality with nutritious Samai or barnyard millet वर्तमान समय में जहाँ एक तरफ कोविड-19 महामारी अपने पैर पसारती जा रही है वहीं दूसरी तरफ लोग जीवन शैली संबंधी बीमारीयों जैसे - मधुमेह, मोटापा, हृद्यघात, ब्लडप्रेशर आदि से जूझ रहे हैं. अत: इनसे बचने हेतु उत्तम गुणवत्ता युक्त आहार का सेवन बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है. आहार की गुणवत्ता विभिन्न प्रकार के पोष्टिक खाद्य पदार्थो का समावेश द्वारा बढ़ाई जा सकती है. सांवा या सामा या सांवक के चावल (sanwa rice) जिसे अंग्रेजी में बार्नयार्ड मिलेट (barnyard millet) नाम से जाना जाता है, पोष्टिकता से भरपूर एक छोटा मिलेट (उपेक्षित अनाज) है. इसमें पर्याप्त प्रोटीन, उच्च फाइबर, बी-विटामिन एवं उपयोगी मिनरल्स पाए है. इसे स्वास्थ्य लाभ पाने हेतु आहार में आसानी से सम्मलित किया जा सकता है.   सांवा मिलेट के उपयोगी गणु : सांवा प्रोटीन का एक अच्छा स्त्रोत है. प्रोटीन शारीर के निर्माण वृद्धि, विकास, मरम्म्त एवं प्रतिरक्षी के रूप में शरीर को रोगप्रतिरोधक प्रदान करने में महत्वपूर्ण होता है. इसमें प्रचुर मात्रा में घुलनशील व अघुलनशील पाचक रेशे होते है. रेशे कब्ज को कम करते है एवं अच्छे कोलेस्ट्रोल (एच. डी. एल.) का अनुपात बढ़ाते है जिससे वजन नियंत्रित होता है. इसमें काबोहाइड्रेट की मात्रा काफी कम होती है व धीमी पाच्कता होती है जिसकी वजह से सांवा कम क्रियाशील जीवन शैली वाले एवं मोटापे...

कृषि में इलेक्ट्रोसपिनिंग नैनोफिब्रिज के अनुप्रयोग  Nanofibres are able to form a highly porous mesh and their large surface-to-volume ratio improves performance for many applications. Electrospinning has the unique ability to produce nanofibres of different materials in various fibrous assemblies. Electrospinning was first patented in the US in 1902. However, the process was largely forgotten until the 1990s. With interest in the field of nanoscience and nanotechnology, researchers began new investigations of nanofiber production using electrospinning (Seeram et al. 2006). The number of patents and applications for processes and applications based on electrospinning has also grown in recent years. Types of Electrospinning Although fibers produced by different electrospinning methods have attracted increasing attention in the field of biomedical applications, challenges persist for the selection of an appropriate method, as well as for optimizing multiple parameters to generate robust cargo loaded nanofibres. Electrospinning techniques can be classified into five categories: Blend electrospinning Coaxial electrospinning Emulsion electrospinning Melt electrospinning Gas jet electrospinning Blend electrospinning can be used to develop nanofibres with burst release, while co-axial and emulsion electrospinning can be used to generate core-shell nanofibres that can assist in sustained drug release. Melt electrospinning is a cleaner fabrication method that has been used extensively to produce highly ordered electrospun nanofibres. However, melt electrospinning results in the generation of fibers with a larger...

Compilation of meteorological data and their importance in agricultural research कृषि मौसम विज्ञान वह विज्ञान है जिसमे मौसम और जलवायु विज्ञान के आंकड़ों (डेटा) व नियमों का उपयोग कृषि उत्पादन में गुणात्मक और मात्रात्मक सुधार के लिए किया जाता है । विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार जलवायु संबंधी सामान्य गणना के लिए ने कम से कम 30 वर्षों के मौसम के आंकड़ों की आवशयकता होती है। उदाहरण के लिए ≥ 30 वर्षो के तापमान का औसत उस स्थान के लिए सामान्य तापमान कहलाता है। कृषि संबंधी जानकारी में न केवल फसलों की वृद्धि और विकास बल्कि फूलों की खेती, कृषि और पशुधन के हर चरण के तकनीकी कारक इत्यादि शामिल है । इसके अलावा, मौसम संबंधी जानकारी का उपयोग प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, कृषि और प्राकृतिक आपदा में कमी तथा जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने हेतु स्थायी निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका में किया जाता है । आंकड़ों का संग्रह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कृषि मौसम और जलवायु डेटा तंत्र (सिस्टम) का आधार है । फसलों में कृषि कार्यो के निर्णय लेने में, सिंचाई प्रबंधन, कीट/ रोग नियंत्रण, कटाई इत्यादि के विश्लेषण में आवश्यक हैं । व्यवस्थित तथा विश्लेषित मौसम संबंधी आंकड़ों को सांख्यिकीय विश्लेषण द्वारा कृषि अनुसंधान मे लाया जा सकता है । अन्य उद्योगों के विपरीत, मौसम...

Applications of Unmanned Aerial Vehicles Drones in Agriculture मानव रहित हवाई वाहन (UAV) को आमतौर पर ड्रोन के रूप में भी जाना जाता है׀ एक मानवरहित हवाई वाहन (यूएवी) एक प्रकार का विमान है जो मानव पायलट के बिना काम करता है׀ पिछले 10-15 वर्षों में, रेडियो नियंत्रित मॉडल से उच्च अंत प्रौद्योगिकी परिवर्तनों के साथ, ड्रोन विभिन्न प्रकार के कार्यों से एकीकृत हैं׀ मूल रूप से, ड्रोन प्रौद्योगिकी विमान-रोधी लक्ष्यों का संचालन करने, खुफिया जानकारी जुटाने और दुश्मन के कुछ क्षेत्रों पर नजर रखने के लिए सेना द्वारा नियोजित की जाती थी परन्‍‍‍‍तू आजकल ड्रोन तकनीक का उपयोग आम नागरि‍‍‍‍‍‍कों द्वारा भी विभिन्न प्रकार के लिए कार्यों मे किया जाता है।  कृषि में अभी तक ड्रोन का उपयोग कुछ ही जगह पर किया जा रहा है। इसलिए, कृषि में यूएवी यानि‍ मानव रहित हवाई वाहन के उपयोग की काफी संभावनाए हैं। यूएवी एसोसिएशन, इंटरनेशनल ने हर साल 85-92% की वार्षिक वृद्धि , विशेष रूप से कृषि के बाजार में, दर्ज की है। वास्तव में, कृषि ड्रोन बाजार आने वाले वर्षों में 38% से अधिक बढ़ने की उम्मीद है। बढ़ती जनसंख्या स्तर और बदलते जलवायु पैटर्न के कारण, कुशल कृषि की आवश्यकता अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है। यूएवी के प्रकार  यूएवी के चार प्रमुख प्रकारों की पहचान की जाती है, जो हैं: मल्टी रोटर यूएवी फिक्स्ड -...