गेहूँ एवं जौ का स्पॉट ब्लॉच रोग, रोग के लक्षण एवं रोग प्रबंधन

गेहूँ एवं जौ का स्पॉट ब्लॉच रोग, रोग के लक्षण एवं रोग प्रबंधन

गेहूँ (ट्रिटिकम प्रजाति) और जौ (हॉर्डियम प्रजाति) दुनिया भर में उगाई और उपभोग की जाने वाली दो सबसे महत्वपूर्ण अनाज फसलें हैं। गेहूं के मामले में, भारत ने 2019 में 100 मिलियन टन उत्पादन का मील का पत्थर पार कर लिया था। तब से, बेहतर किस्मों और तकनीकों के प्रयोग से, गेहूँ का उत्पादन और उत्पादकता हर साल बढ़ रही है। इस वर्ष (2024-25) भारत में 33 मिलियन हैक्टेअर से अधिक कृषि भूमि से 117.50 मिलियन टन से अधिक गेहूँ का उत्पादन हुआ है। गेहूँ के उत्पादन का यह अब तक का सबसे अधिक रिकॉर्ड है। जबकि जौ के मामले में, राष्ट्रीय और स्वास्थ्य के नज़रिए से इसके महत्व को देखते हुए, जौ फसल का क्षेत्रफल और उत्पादन उतना तेजी से नहीं बढ़ रहा है जितना उम्मीद रखी जा रही है। हालांकि, भारत में जौ की खेती के तहत क्षेत्रफल और जौ का उत्पादन बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। गेहूँ और जौ के उत्पादन और उत्पादकता को कई जैविक तनावों मुख्य रूप से रतुआ रोगों, स्पॉट ब्लॉच या पत्ती झुलसा, चूर्णिल आसिता (पाउडरी मिल्ड्यू), बंट, स्मट रोग आदि जैसी बीमारियों से से कड़ी चुनौती मिलती है। बीमारियों में, हम अक्सर रतुआ रोगों की तुलना में स्पॉट ब्लॉच या पत्ती झुलसा के महत्व को कम आंकते हैं। पिछले कुछ दशकों में रतुआ प्रतिरोध पादप प्रजनन में एक उल्लेखनीय प्रगति हुई है, और देश के कई महामारी क्षेत्रों में रणनीतिक रूप से अनेकों प्रतिरोधी जीन का उपयोग करके रतुआ रोगों की महामारियों से बचा गया है। रतुआ अनुसंधान पर मुख्य ध्यान देने के कारण, दोनों अनाजों की अन्य बीमारियों लगभग नज़रअंदाज़ रह गई और इसने गेहूँ और जौ के स्पॉट ब्लॉच के लिए एक खुला अवसर दे दिया है, क्योंकि स्पॉट ब्लॉच रोगज़नक़ के खिलाफ प्रतिरोध वाली पर्याप्त जननद्रव्य सामग्री नहीं है। यह लेख गेहूँ एवं जौ के स्पॉट ब्लॉच रोग के विभिन्न पहलूओं जैसे रोग लक्षण, आर्थिक महत्व, रोगजनक, रोग विस्तार और रोग प्रबंधन रणनीतियों के विषय में बताता है।

स्पॉट ब्लॉच का आर्थिक महत्व

भारत में, यह रोग सबसे पहली बार बिहार में 1914 दर्ज किया गया था। यह रोग अक्सर बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, असम, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक के गर्म और आर्द्र क्षेत्रों में होता है। यह मूल रूप से देश के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में एक गंभीर समस्या रही है, लेकिन जलवायु परिवर्तन और फसल गहनता के कारण इस रोग ने देश के उत्तर पश्चिमी, प्रायद्वीपीय क्षेत्र और मध्य क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। गेहूँ और जौ उगाने वाले जिन देशों में फसल बढ़वार के समय में तापमान गर्म रहता है, वहां स्पॉट ब्लॉच बीमारी होने का खतरा सबसे ज़्यादा होता है और इससे पैदावार में भारी नुकसान हो सकता है। अनुकूल परिस्थितियों में, यह बीमारी गेहूँ में 50% से ज़्यादा पैदावार का नुकसान कर सकती है। जौ में, स्पॉट ब्लॉच बीमारी के लिए अनुकूल माहौल में बीमारी के प्रति संवेदनशील किस्मों में 80% तक पैदावार का नुकसान हो सकता है। हालांकि, पादप महामारी की स्थिति में, यह रोगजनक लगभग 100% तक पैदावार का नुकसान कर सकता है।

स्पॉट ब्लॉच रोग के लक्षण

स्पॉट ब्लॉच रोगज़नक़ पौधों के सभी भागों यानी इंटरनोड्स, तना, नोड्स, पत्तियों, तुष, ग्लूम्स और बीज में रोग के लक्षण पैदा करने में सक्षम है। रोगज़नक़ पौधे के विकास के विभिन्न चरणों में अंकुरण-पूर्व और अंकुरण-बाद आर्द्रगलन, अंकुर झुलसा, जड सड़ना, पत्ती धब्बे और बाली झुलसा (स्पाइक ब्लाइट) का कारण बनता है। पत्तियों पर शुरुआती विक्षत छोटे, गहरे भूरे रंग के 1 से 2 मिमी लंबे विक्षत होते हैं जो बिना हरिमाविहीन परिधि के होते हैं। रोग सुग्राही किस्मों में यें धब्बें या विक्षत जल्दी बढकर हल्के भूरे से गहरे भूरे रंग के अंडाकार अथवा लम्बें ब्लोच्स में बदल जाते हैं जो पत्ती को झुलसा देने जैसा प्रतीत होते हैं। अनुकूल वातावरण में बालियां (स्पाइकलेट्स) संक्रमित हो जाती है जिससे दानों का आकार सिकुड़ जाता है दानों में “ब्लैक पोइंट” बन सकता है।

चित्र 1: गेहूँ (अ) एवं जौ (आ) में स्पॉट ब्लॉच रोग के लक्षण; पीडीए संवर्धन माध्यम पर बाइपोलैरिस सोरोकिनियाना की कॉलोनी (इ) और संयुक्त सूक्ष्मदर्शी में बाइपोलैरिस सोरोकिनियाना के बीजाणु (ई)

स्पॉटब्लोच रोग का रोगजनक

शूमेकर ने सन 1959 में उन हेल्मिन्थोस्पोरियम प्रजातियों जिसमें चंद्राकार (फ्यूसॉइड), सीधे, या घुमावदार कोनिडिया के दोनों छोर पर एक अंकुरण नली (जर्म ट्यूब) होती है और बीजाणु (कोनिडिया) इसके द्वारा अंकुरित होते हैं, के लिए सामान्य नाम बाइपोलारिस का प्रस्ताव रखा था। बाइपोलैरिस सोरोकिनियाना (पर्याय= ड्रेक्स्लेरा सोरोकिनियाना; हेल्मिन्थोस्पोरियम सैटिवम) एक डिमेटैसियस हाइफोमाइसिटस कवक है। रोगज़नक़ की पूर्ण अवस्था को कोक्लिओबोलस सैटिवस के रूप में पहचाना गया है। रोगजनक संवर्धन माध्य्म पर हल्की भूरी से गहरी भूरी रंग की कॉलोनी विकसित कर सकता है। पुराने वैज्ञानिक साहित्य में बाइपोलैरिस सोरोकिनियाना को हेल्मिन्थोस्पोरियम सोरोकिनिअनम, ड्रेक्स्लेरा सोरोकिनियाना और हेल्मिन्थोस्पोरियम सैटिवम आदि नामों से भी जाना जाता है। इसका कोनिडिया अथवा बीजाणु मोटी भित्तियों वाला थोडा घुमावदार आकार में लगभग 120 मिलीमाइक्रोन ×12-20 मिलीमाइक्रोन का होता है। कोनिडिया में सामान्यत: 3-9 पट (सेप्टा) होते है। एक बीजाणुधानीधर (कोनिडियोफोर्स) पर केवल एक (मोनोस्पोरिक कोनिडियोफोर) अथवा एक से अधिक (पॉलीस्पोरिक कोनिडियोफोर) बीजाणु उत्पन्न हो सकते हैं।

रोग का विकास एवं फैलाव

अधिकांश हेल्मिंथस्पोरियम प्रजातियां मध्यम से गर्म तापमान (18o से 32o सेल्सियस) और विशेष रूप से आर्द्र मौसम में रोग पैदा करने में सक्षम होती हैं। स्पॉट ब्लॉच रोग उच्च तापमान (सबसे अधिक ठंडा महीनें में 17 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान) और उच्च सापेक्ष आर्द्रता की विशेषता वाले वातावरण में संभवतः सबसे गंभीर रूप धारण कर सकता है। संक्रमित बीज, संक्रमित फसल अवशेष, स्वयंसेवी पौधे, द्वितीयक मेजबान और मिट्टी में मुक्त सुसुप्त बीजाणु बाइपोलैरिस सोरोकिनियाना निवेशद्रव्य (इनोकुलम) के स्रोत के रूप में कार्य करते हैं। यह हेमीबायोट्रोफिक कवक आमतौर पर फसल बढवार के मौसम के दौरान ऊतकक्षयी (नेक्रोटिक) ऊतकों पर बीजाणुजनन करता है और बाली तक पहुंचता है, अंत में बीज में लौटता है, जो रोगजनक अस्तित्व के लिए सबसे कुशल तंत्र सुनिश्चित करता है। जब इस तरह के बीज खेत में बोए जाते हैं, तो प्रांकुर-चोल (कोलॉप्टाइल) आसानी से संक्रमित हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप अंकुर संक्रमण होता है, जो बढ़ती फसल के लिए निवेशद्रव्य (इनोकुलम) प्रदान करता है। बुवाई के तुरंत बाद, नम बीज पर कवक बढ़ना शुरू हो जाता है, और पहली पत्ती के चरण के रूप में अंकुर निकलने के तुरंत बाद, सीधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में बीजाणुजनन प्रेरित होता है। इसके बाद, अनुकूल परिस्थितियों में रोगज़नक़ पत्तियों और स्पाइक्स को त्वरित नुकसान पहुंचाते हैं जिससे उपज हानि होती है। पहली पत्तियों पर उत्पन्न होने वाले कोनिडिया को बारिश के छींटे और हवा से दूसरी स्वस्थ पत्तियों फैल सकते हैं, इस प्रकार बहुचक्रीय (पॉलीसाइक्लिक) महामारी का निर्माण होता है। गेहूँ एवं जौ के अलावा बी. सोरोकिनियाना के मेजबान के रूप में बड़ी संख्या में घास हैं जो एक क्षेत्र में सह-अस्तित्व में हैं, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में इस बीमारी को बनाए रखने में उनकी भूमिका अभी भी ज्यादा स्पष्ट नहीं है।

स्पॉट ब्लॉच रोग के लिए रोग प्रबंधन रणनीतियाँ

स्पॉट ब्लॉच सहित किसी भी फसल रोग का प्रभावी प्रबंधन प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करके किया जा सकता है। यह तरीका लागत प्रभावी और पर्यावरण के लिए सुरक्षित है। हालाँकि, पर्याप्त प्रतिरोधी किस्मों की कमी के कारण इस विकल्प को अपनाना बहुत चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसके अलावा, प्रतिरोधी किस्मों के उपयोग के साथ-साथ अन्य रणनीतियाँ जैसे कृषि पद्धतियाँ, फफूंदनाशक का प्रयोग और जैविक नियंत्रण विधि रोग की घटना को कम करने में सहायक हो सकते हैं। इन रणनीतियों का विवरण नीचे दिया गया है।

1. कृषि पद्धतियाँ

गेहूँ और जौ में बी. सोरोकिनियाना के प्राथमिक इनोकुलम दबाव को गेहूँ/जौ-सूरजमुखी, और गेहूँ/जौ-सोयाबीन जैसे फसल चक्र का उपयोग करके प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है। गेहूँ या जौ की मोनोकल्चर को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। फसल अवशेषों को जलाने से भी इनोकुलम 90% तक कम हो सकता है, लेकिन पर्यावरण पर अवशेषों को जलाने के प्रतिकूल प्रभाव को देखते हुए, इसकी सिफारिश नहीं की जा सकती है। बुवाई के समय में बदलाव (जल्दी बुवाई) और गहरी जुताई भी अगली फसल में रोग की घटना को कम करने में मदद कर सकती है। सही मात्रा में उर्वरक विशेषत: नत्रजनयुक्त उर्वरक का प्रयोग व फसल अवशेषों को नष्ट करने से रोग के विस्तार को कम करने में सहायता मिलती है। संस्तुत बीज दर व पौध अंतरण द्वारा पौधों के घनत्व को कम करने से रोग के विस्तार को कम करने में सहायता मिलती है। रोग सम्भावित क्षेत्र में अतिसंवेदनशील किस्मों की बुवाई को हतोत्साहित करना। खेत के आस-पास खरपतवारों एवं कोलेट्रल पोषक पौधों को नही उगने देना चाहिए ।

2. रोगरोधी किस्मों का प्रयोग

किसी भी फसल रोग के नियंत्रण का सबसे प्रभावशाली, लागत प्रभावी एवं पर्यावरण हितैषी उपाय उस रोग के विरूद्ध फसल की रोग रोधी किस्मों की बुवाई होता है। अत: स्पॉट ब्लॉच की रोकथाम के लिए क्षेत्र विशेष के लिए संस्तुत रोग प्रतिरोधी किस्मों की बुवाई करें।

3. बीज का चुनाव

स्वस्थ रोगमुक्त फसल के लिए आवश्यक है कि बुवाई हेतू स्वस्थ एवं रोगमुक्त बीज का चयन किया जाए । बीज का स्रोत विश्वसनीय होना चाहिए जो कि रोग रहित खेत से तैयार किया गया हो।

4. बीज का उपचार

फफूंदनाशकों के साथ बीज उपचार से अंकुरित बीज और पौध को रोगज़नक़ों से बचाने में मदद मिलेगी, जो अंकुर को झुलसाते हैं। कवकनाशी कार्बोक्सिन 37.5% + थाइरम 37.5% के द्वारा 2.5 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से बीज उपचार करने पर पत्ती झुलसा या स्पॉट ब्लॉच रोग की प्रभावी रोकथाम हो जाती है। अन्य प्रभावी कवकनाशियों में कैप्टन, मैनकोज़ेब, थिरम, टेबूकोनाजोल और ट्रायडाइमफ़ोन आदि में शामिल हैं।

5. पर्णीय छिडकाव

रोग की रोकथाम के लिए प्रोपिकोनाज़ोल, मैंकोजेब 75%, जिनेब 75%, टेबूकॉनाजोल 25.9%, कार्बेन्डाजिम 50%, डाइथेन जेड-78, इप्रोडायोन और इमाज़िल जैसे कवकनाशी रोग के पर्णीय अवस्था का प्रभावी नियंत्रण प्रदान करते हैं।

6. जैविक नियंत्रण

बाइपोलारिस सोरोकिनियाना से होने वाले स्पॉट ब्लॉच के जैविक नियंत्रण के लिए जैव नियंत्रक जैसे ट्राइकोडर्मा विरिडे, ट्राइकोडर्मा हर्ज़ियानम, कीटोमियम ग्लोबोसम और ट्राइकोडर्मा विरेंस आदि प्रभावशाली सिद्ध हुए हैं।

निष्कर्ष

स्पॉट ब्लॉच या पत्ती झुलसा बीमारी दोनों अनाज फसलों के उत्पादन में एक बड़ी रुकावट बनकर उभरी है, खासकर गेहूं और जौ उगाने वाले इलाकों में जहां गर्म तापमान और नमी वाला मौसम होता है। बीमारी का पता लगाना और रोगजनक की पहचान करना सफल रोग प्रबंधन के लिए बहुत ज़रूरी है। कई फफूंदनाशक उपलब्ध हैं जो इस बीमारी के खिलाफ असरदार हो सकते हैं, लेकिन उनसे मनुष्य स्वाथ्य संबंधी चिंताएं भी जुड़ी हुई हैं। इस संदर्भ में, असरदार जैविक नियंत्रण एजेंटों की खोज और उनका प्रयोग समय की मांग हैं। स्पॉट ब्लॉच प्रतिरोधी स्रोत बहुत कम हैं और बाइपोलारिस सोरोकिनियाना उन क्षेत्रों में उभर रहा है जहां इसे पहले एक मामूली बीमारी समझा जाता था। इसलिए, स्पॉट ब्लॉच प्रतिरोधी जननद्रव्य बनाना बहुत ज़रूरी है। आखिर में, एकीकृत रोग प्रबंधन को अपनाना रोग के सफल प्रबंधन और ज़्यादा फसल उत्पादन प्राप्त करने के लिए सबसे अच्छा विकल्प है।


Author

रविन्द्र कुमार, शुभम राज, ऐश्वर्या सिंह राठौर, ईश्वर सिंह, चारू लता शर्मा एवं प्रदीप सिंह शेखावत

भाकृअनुप-भारतीय गेहूँ एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल-132001 (हरियाणा)
राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान, (एसकेएनएयू, जोबनेर), दुर्गापुरा-जयपुर-302018 (राजस्थान)

रविन्द्र कुमार, शुभम राज, ऐश्वर्या सिंह राठौर, ईश्वर सिंह, चारू लता शर्मा एवं प्रदीप सिंह शेखावत