Agriculture Knowledge for Everyone

cash crop Tag

काजू में चाय मच्छर कीड़े का प्रबंधन Cashew (Anacardium occidentale L., Family: Anacardiaceae) is one of the important commercial plantation crops in India. Insect pest infestation is a major production constraint in cashew cultivation. Tea mosquito bugs (TMB)– Helopeltis spp (Miridae: Heteroptera), are most serious insect pest of cashew in India and causes more economic loss to the crop. There are four species of TMB viz., Helopeltis antonii, H. bradyi, H. theivora and Pachypeltis maesarum (Hemiptera: Miridae) were found to infest in cashew. The mirid bug H. antonii is the dominant species and has been found infesting in all major cashew growing regions of India followed by H.bradyi and H. theivora. It causes damage to an extent of 30-50% yield loss. Symptoms of damage Both nymphs and adults suck the cell sap from tender shoots, leaves, floral branches, developing nuts, fruit peduncle and apples. Formation of necrotic lesion on green tender stem of young shoots and inflorescence rachis are the characteristic damage symptoms. The lesions on shoots and panicles join together and finally the affected shoot dries up. The immature nuts infested by this pest develop characteristic eruptive spots and finally shrivel and fall off. Under outbreak conditions, heavily infested trees show scorched appearance, leading to the death of shoots and growing tips. Severely affected branches may lead to...

शीतकालीन गेंदे की व्यावसायिक खेती कैसे करें भारतवर्ष में गेंदा हर घर में हर मौके पर इस्तेमाल होने के कारण अब यह एक व्यावसायिक नकदी फसल बन गया है। यह फूल सजावटी गमलों में भी प्रयोग किया जाता है साथ ही यह गमलों की दहलीज पार कर बड़े बड़े खेतों में पहुंच गया है। गेंदा की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह वर्ष के बारहों महीनों फूल देता है। जिन महीनों मे कोई अन्य फूल नहीं मिलते हैं उन दिनों में भी गेंदा का फूल सहज ही उपलब्ध होता है। गेंदा हर मौसम में प्राप्त होने के साथ साथ इसकी दूसरी विशेषता है कि यह कई दिनों तक ताजा बना रहता है। गेंदे का पौधा हर प्रकार की जलवायु के प्रति सहनशील होता है तथा लम्बे समय तक फूलता रहता है। गेंदे के फूल का उपयोग विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सजाने के लिए किया जाता है। इसका उपयोग मंदिरों में पूजा के लिए तथा मंदिर को सजाने में भी किया जाता है। विभिन्न प्रकार के सामाजिक कार्यक्रमों में स्वागत हेतु भी गेंदे की फूल का माला बनाकर किया जाता है। पर गेंदे का अत्यधिक प्रयोग खासकर शादी ब्याह में मंडप सजाने, गाड़ी सजाने तथा वरमाला आदि बनाने में होता है। भूमि का चुनाव व उसकी तैयारी गेंदे की खेती को विभिन्न प्रकार की भूमि में...

Diseases of the jute and its management पटसन का वानस्पतिक नाम कोरकोरस केपसुलेरिस तथा को. आलीटोरियस है जो कि स्परेमेनियोसी परिवार का सदस्य है। विश्‍व में कपास के बाद पटसन दूसरी महत्वपूर्ण वानस्पतिक रेशा उत्पादक वाणिज्यिक फसल है। पटसन की खेती मुख्यतया बंगलादेश, भारत, चीन, नेपाल तथा थाईलैंड में की जाती है। भारत में पश्‍ि‍चम बंगाल, बिहार, असम इत्यादि राज्यों में पटसन कि खेती की जाती है। देश में पटसन का क्षेत्रफल 8.27 लाख हैक्टेयर है। वही इसका उत्पादन 114 लाख गांठ है। पटसन की फसल में कई प्रकार के जैविक व अजैविक कारकों से रेशे के उत्पादन में कमी आती है। जैविक कारकों के अन्तर्गत तना सड़न रोग इसके उत्पादन में सबसे बड़ी बाधा है जो मैक्रोफोमिना फैसियोलीना नामक कवक से होता है। तना सड़न रोग: रोग के लक्षणः इस रोग का प्रकोप अधिक मृदा नमी, मध्यम तापमान एवं उच्च आर्द्रता होने पर अधिक होता है। यह रोग मृदु गलन, पर्ण झुलसा व तना सड़न के रूप में फसल की विभिन्न आवस्थाओं में दिखाई देता है। मृदु गलन रोग फसल के अंकुरण एवं पौध वाली अवस्था में ज्यादा होता है। इस रोग में तनों पर भूरे रंग के धब्बे व काले रंग की लाइने बन जाती है। जो आपस में मिलकर पूरे तने के रेषे को नश्ट कर देती है। एपिडेमियोलॉजी इस रोग के फैलाव में अम्लीय...

Concise information of sugarcane production गन्ना  एक प्रमुख नकदी फसल है, जिससे चीनी, गुड़ आदि का निर्माण होता हैं। एवं इसका रस पीने के लिए की जाती हैं एक नकदी फसल है हमारा कोई पर्व या उत्सव ऐसा नहीं होता जिस पर हम अपने बंधु-बांधवों और इष्ट-मित्रों का मुंह मीठा नहीं कराते। मांगलिक अवसरों पर लड्डू, बताशे, गुड़ आदि बांटकर अपनी प्रसन्नता को मिल-बांट लेने की परम्परा तो हमारे देश में लम्बे समय से रही है। सच तो यह है कि मीठे की सबसे अधिक खपत हमारे देश में ही है। गन्‍ना उत्‍पादन के लि‍ए भूमि एवं उसकी तैयारी: दोमट भूमि जिसमें सिंचाई की उचित व्यवस्था व जल का निकास अच्छा हो, तथा पी.एच. मान 6.5 से 7.5 के बीच हो, गन्ने के लिए सर्वोत्तम होती है। ग्रीष्म में मिट्टी पलटने वाले हल से दो बार आड़ी व खड़ी जुताई करें। अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह जुताई कर मिट्टी भुरभुरी कर लें तथा पाटा चलाकर समतल कर लें। रिजर की सहायता से 3 फुट की दूरी पर नालियां बना लें।परंतु बसंत ऋतु में लगाये जाने वाले (फरवरी-मार्च) गन्ने के लिए नालियों का अंतर 2 फुट रखें। अंतिम बखरनी के  समय भूमि को लिंडेन 2% पूर्ण 10 किलो प्रति एकड़ से उपचारित अवश्य करें। गन्ने की प्रमुख किस्मों की विशेषताएँ : किस्म शक्कर (प्रतिशत में) अवधि (माह) उपज (टन/हे.) प्रमुख विशेषताए शीघ्र पकने वाली जातियां को.सी.-671 20-22 10-12 90-120 शक्कर के लिए उपयुक्त, जड़ी...

Scientific cultivation of Turmeric हल्दी की खेती सामान्यत: सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है। उचित जलनिकास वाली बलुई दोमट या चिकनी दोमट मिट्टी जिसमें जीवांश की अच्छी मात्रा हो, हल्दी के लिये उपयुक्त होती है। इसकी अच्छी पैदावार के लिये भूमि का पी एच मान 5.0-7.5 के बीच होना चाहिए। चिकनी मिट्टी, क्षारीय भूमियों तथा पानी ठहरने वाले स्थान पर विकास रुक जाता है। इसकी खेती बगीचों में अंतरवर्तीय फसल के रूप में भी की जा सकती है। हल्दी की खेती के लि‍ए भूमि हल्दी की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिये भूमि की अच्छी तैयारी करने की आवश्यकता होती है क्योंकि यह जमीन के अंदर होती है जिससे जमीन को अच्छी तरह से भुरभुरी बनाया जाना आवश्यक हैं। मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करके 3-4 बार कल्टीवेटर या हैरो से जुताई करना चाहिए। हल्दी की उन्नतशील प्रजातियाँ सुगंधा, रोमा, सुरोमा, सी.ओ.-1, कृष्णा, राजेन्द्र सोनिया, सुगुना, सुदर्शन,सुवर्णा, प्रभा, प्रतिभा. हल्‍दी में बीज की मात्रा बीज की मात्रा प्रकन्दों के आकार व बोने की विधि पर निर्भर करता है। शुद्ध फसल बोये जाने के लिये 20-25 क्विंटल जबकि मिश्रित फसल हेतु 12-15 क्विंटल प्रकन्द की प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है। प्रकन्द 7-8 सेमी लम्बे तथा कम से कम दो आंखों वाले होने चाहिये। यदि कन्द बड़े हो तो उन्हे काटकर बुवाई की जा...

रसभरी या केप करौदा: भारत में एक नई नकदी फसल Introduction and adaptations of new crops contribute to an increase in diversity of agricultural systems. It offers new opportunity and alternatives to farmers and markets. New crops can result in an increase of income for farmers. The Cape gooseberry (Physalis peruviana L.) करौदा is a new herbaceous crop which comes under minor fruit. The genus Physalis, of the family Solanaceae, contains around more than 100 species of annual and perennial herbs. Several species of Physalis are grown for their edible fruits like, P. peruviana L. (Cape gooseberry) , P. pruinosa L. (strawberry tomato), or P. ixocarpa Brot. (husk tomato). This crop can be grown successfully in kitchen garden. In India, Cape gooseberry grown ‘throughout the plains and hills. In temperate region it grow as a annul while in tropical and subtropical grow as perennial due to absence of frost. It is also called golden berry, teparee, tiparee, makowi, poha, uchuba etc. Gooseberry reaches 2 to 3 ft (1.6 - 0.9 m) in height but occasionally may attain 6 ft (1.8) m.  Cape gooseberry can also be grown as an intercrop with other fruit crops. The Cape gooseberry fruits are cherry size, golden-yellow, like a small globe and is deliciously sweet. The fruit type is berry with the diameter about 12.5 to...

Commercial cultivation of Sugarcane व्यावसायिक फसलों में गन्ने का महत्त्वपूर्ण स्थान है । गन्ने की खेती के लिए गर्म जलवायु अच्छी मानी जाती है । अच्छे विकास के लिए तापमान 26-32 डिग्री से.ग्रे. उत्तम होता है । खेती के लिए मध्यम से काली कछारी एवं चिकनी दोमट मिटटी डोरसा कन्हार सर्वोत्तम रहती है। गन्‍ना उत्‍पादन के लि‍ए खेत की तैयारी: खरीफ फसल काटने के बाद खेत की गहरी जुताई मिटटी पलटने वाले हल से करें । इसके बाद देषी हल या कल्टीवेटर से जुताई करके पाटा चलाकर खेत समतल करें । गन्‍ना बोने का समय: गन्ने को अक्टूबर-नवम्बर षरद ऋतु व फरवरी मार्च बसंत ऋतु में बोया जाता है । बसंत की अपेक्षा षरदकालीन बुवाई से 20-25 उपज अधिक मिलती है । उन्नत किस्में एवं स्वस्थ बीज का चयन : गन्ना बीज के लिए स्वस्थ एवं निरोगी 8-10 माह की फसल उपयुक्त रहती है । प्रदेष के लिए को. 86032, को. 419, को.1305, को. जे. 86-141, को. 6304, को. 8338, को.6217, को. 775, को. जे. 2087 आदि उन्नत किस्में है । गन्‍ने की बुवाई : गन्ने की बुवाई मुख्यत: समतल व नाली विधि से की जाती है । समतल विधि में देषी हल से 90 से.मी. की दूरी पर कॅूड बनाए और कूॅडों में गन्ने के छोटे-छोटे टुकडे में जिसमें 2 ऑखें होना जरुरी है। की बुवाई सिरे से...

Improved Techniques of Turmeric Cultivation  हल्दी एक महत्वपूर्ण मसाले वाली फसल है जिसका उपयोग औषधि से लेकर अनेकों कार्यो में किया जाता है। इसके गुणों का जितना भी बखान किया जाए थोड़ा ही है, क्योंकि यह फसल गुणों से परिपूर्ण है हल्दी की खेती आसानी से की जा सकती है तथा कम लागत तकनीक को अपनाकर इसे आमदनी का एक अच्छा साधन बनाया जा सकता है। यदि किसान भाई इसकी खेती ज्यादा मात्रा में नहीं करना चाहते तो कम से कम इतना अवश्य करें जिसका उनकी प्रति दिन की हल्दी की मांग को पूरा किया जा सकें। निम्नलिखित शास्त्र वैज्ञानिक पद्धतियों को अपना कर हल्दी की खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है। हल्‍दी उगाने के लि‍ए भूमि का चुनाव:-  हल्दी की खेती बलुई दोमट या मटियार दोमट मृदा में सफलतापूर्वक की जाती है। जल निकास की उचित व्यवस्था होना चाहिए। यदि जमीन थोडी अम्लीय है तो उसमें हल्दी की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। हल्‍दी फसल के लि‍ए भूमि की तैयारी:- हल्दी की खेती हेतु भूमि की अच्छी तैयारी करने की आवश्यकता है क्योंकि यह जमीन के अंदर होती है जिससे जमीन को अच्छी तरह से भुरभुरी बनाया जाना आवश्यक है। मोल्ड बोल्ड प्लाऊ से कम से कम एक फीट गहरी जुताई करने के बाद दो तीन बार कल्टीवेटर चलाकर जमीन को अच्दी तरह...