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Crop Cultivation

मशरूम की खेती का पूरा मार्गदर्शन- एक लाभदायक कृषि व्यवसाय Activities like mushroom cultivation, bamboo production, agro-forestry, vermicomposting and agro-processing are being promoted to generate additional jobs and income for farm families. Now days Mushroom farming is one of the most profitable agri-business that you can start with a low investment and space. Mushroom cultivation is done on agricultural wastes in less area which is an attractive proposition for income generation which is leading to solution to malnutrition, pollution abatement and diversification of agriculture.  Mushroom cultivation in India is growing gradually as an alternative source of income for many people in our country, have a good scope for export.  Mushrooms are the fruiting bodies of macro fungi. Human body needs protein, carbohydrates, fats and vitamins. In India, Uttar Pradesh is the top producer of mushrooms followed by Tripura, Rajasthan & Kerala. In this article we will describe the complete cultivations method of oyster mushroom, button mushroom and paddy straw mushroom. Types of Mushrooms The mushroom industry can be divided into three main categories: edible mushrooms, medicinal mushroom products, and wild mushrooms. The button (Agaricus bisporus), oyster (Pleurotus spp.), milky (Calocybe indica) and paddy straw mushroom (Volvariella volvacea) are the three major types of used for commonly cultivated throughout India. Paddy straw mushrooms can grow in temperatures...

The main 4 species of Safed Musli are Chlorophytum borivilianum, Chlorophytum laxum, Chlorophytum arundinium and Chlorophytum tuberosum in which Chlorophytum borivilianum, Chlorophytum tuberosum are found in abundance in India. सफेद मुसली की खेती सफेद मूसली (क्लोरोफाइटम स्पीशीज) एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है जिसकी विभिन्न प्रजातियां की जड़ों का उपयोग आयुर्वेदिक व यूनानी दवाएं बनाने में किया जाता है इसकी सुखी जड़ों में पानी की मात्रा 5 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट 42 प्रतिशत प्रोटीन 8-9 प्रतिशत रूट फाइबर ग्लुकासेाइल सेपोनिन 2-17 प्रतिशत के साथ-साथ सोडियम पोटेशियम कैल्शियम फास्फोरस व जिंक आदि पोषक तत्व पाए जाते हैं सफेद मूसली का उपयोग मनुष्य की दुर्बलता व नपुसकता निवारण में किया जाता है भारत में इसकी खेती राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ, गुजरात, महाराष्ट्र, केरल व तमिलनाडु राज्यों में की जाती है राजस्थान में यह चित्तौड़गढ़, बारा, उदयपुर, सिरोही, राजसमंद जिलों में इसकी खेती की जाती है यह कोटडा, झरगा, अंबाला, सीतामाता, कुंभलगढ व पीपलोद के जंगलों में जंगली रूप में पाई जाती है सफेद मूसली का पौधा  सफेद मूसली की जड जलवायु व भूमि इसकी खेती उन क्षेत्रों में की जाती है जहां 500 से 1000 मिलीमीटर वर्षा व जलवायु आद्र होती है तथा साथ ही ऐसी मिट्टी जिसमें जीवाश्म व जल धारण क्षमता हो इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती है खेत की तैयारी  सर्वप्रथम खेत में दो क्रॉस पलाऊ तत्पश्चात...

ग्लेडियोलस फूल की खेती से कमाए मुनाफा  ग्लेडियोलस दुनिया के सुन्दर फूलो में से एक है, यह इरिडेसि कुल का पुष्पीय पौधा है | लैटिन भाषा के शब्द ग्लेडियस से ग्लेडियोलस शब्द लिया गया है, जिसका आशय तलवार से है | यह एक बहुवर्षिय पौधा है, जिसकी पत्तिया तलवार के समान होती है | ग्लेडियोलस मुख्य पारम्परिक रूप से कटे फूलो के लिए उगाया जाता है, इसके कटे फूल को स्पाइक बोलते है | ग्लेडियोलस में विभिन्न रंगो की किस्मे उपलब्ध होने के कारण यह काफी मशहूर फूल है | विश्व में यह फूल मुख्य रूप से अमेरिका, हॉलेंड, फ्रांस, इटली, ब्राज़ील, तथा भारत में मुख्ये रूप से उगाया जाता है |   भारत में ग्लेडियोलस कुल फूलो के उत्पादन में तीसरे स्थान पर आता है | भारत में इसकी खेती मुखतया उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीशा, छत्तीशगढ़, हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तराखण्ड, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तथा सिक्किम में की जाती है | प्राकर्तिक रूप से तो यह एक शीतकालीन फूलदार पौधा है, लेकिन मध्यम जलवायु में इसकी खेती पुरे साल भर भी की जा सकती है | ग्लेडियोलस में फूल खिलने की अवधी 10 से 12 दिन की होती है | ग्लेडियोलस को ओषधीय रूप में भी काम में लिया जाता है  ग्लेडियोलस उगानें के लिए भूमि एवं जलवायु  ऐसी सभी सामान्य प्रकार के मृदायें जिनमे पानी...

तितली मटर की खेेेेती, चराहगाह विकास हेतु एक उत्तम विकल्प तितली मटर (क्लाइटोरिया टेर्नेटा एल.) एक बहुउद्देशीय दलहनी कुल का पौधा है इसका चारा पशु पोषण के हिसाब से अन्य दलहनी कुल के पौधों की अपेक्षा बहुत अधिक पौष्टिक, स्वादिष्ट एवं पाचनशील होता है। जिस कारण सभी प्रकार के पशुओं इसके चारे को बड़े चाव से खाते है। तितली मटर का तना बहुत पतला एवं मुलायम होता है, एवं इसमें पत्तियाँ चौड़ी एवं अधिक संख्या में होती है जिस कारण इसका चारा “हे” एवं “साइलेज” बनाने के लिए उपयुक्त माना गया है। अन्य दलहनी फसलों की तुलना में इसमें कटाई या चराई के बाद कम अवधि के भीतर ही पुनर्वृद्धि शुरू हों जाती है एवं इसमें चारा पैदावार की क्षमता अन्य दलहनी फसलों की तुलना में अधिक होती है। तितली मटर की खेती के लिए कम उपजाऊ भूमिया सबसे उपयुक्त मानी जाती है, जिस कारण इसे कम उत्पादक चरागाहों एवं बंजर भूमियों के विकास के लिए घास + दलहनी फसल मिश्रण के रूप में उगाते है। दलहनी कुल का पौधा होने के कारण यह मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ाता है एवं इसका पौधा जमीन पर बेल की तरह फैलता है जिससे यह मृदा संरक्षण का काम करता है। अतः यह उतम अपरदन अवरोधी फसल भी है। इसके अलावा तितली मटर को सजावटी पौधे के रूप...

गुणकारी फसल, राम तिल की खेती रामतिल इथोयोपिया, भारत और नेपाल में व्यापक रूप से उगाईं जाती है और मोंटाने, पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका, बांग्लादेश, भूटान, पाकिस्तान और वेस्ट इंडीज के कुछ हिस्सों में छोटे पैमाने पर लगाईं जाती है। रामतिल मुख्य रूप से आदिवासी किसानों द्वारा अपनी पारंपरिक फसल के रूप में उगाईं जाती है इसलिए अब तक यह उपेक्षित है। यद्यपि एक गौण तिलहन फसल मानी जाती है लेकिन यह इसकी तेल सामग्री, गुणवत्ता और क्षमता के संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है। रामतिल बीज प्रोटीन और फैटी एसिड में अत्यधिक समृद्ध है। यह लिनोलिक अम्ल का एक अच्छा स्रोत है और इसमें नियासिन, ओलिक एसिड, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फाइबर, स्टीयरिक एसिड, राइबोफ्लेविन और एस्कॉर्बिक एसिड जैसे आवश्यक पोषक तत्व होते हैं।  रामतिल बीज: रामतिल के बीज में 483 कैलोरी, 2.8-7.8% नमी, 17-30% प्रोटीन, 34-39% कुल कार्बोहाइड्रेट, 9–13% फाइबर, 1.8–9.9 ग्राम राख, 50-587 मिलीग्राम/100 ग्राम कैल्शियम, 180-800 मिलीग्राम/100 ग्राम फास्फोरस, 0.43 मिलीग्राम/100 ग्राम थियामिन, 0.22–0.55 मिलीग्राम/100 ग्राम राइबोफ्लेविन, और 3.66 मिलीग्राम/100 ग्राम नियासिन दर्ज किए गए हैं।   1 ग्राम रामतिल के बीज के आटे का सेवन करने पर ट्रिप्टोफैन 0.054 ग्राम, थ्रोनिन 0.237 ग्राम, आईंसोल्यूसीन 0.307 ग्राम, ल्यूसीन 0.388 ग्राम, लाइसिन 0.294 ग्राम, मेथियोनीन 0.109 ग्राम और सिस्टीन 0.177 ग्राम मिलता है। रामतिल बीज के नमूनों में निम्नलिखित धातु सांद्रता रेंज (माईक्रो ग्राम/ग्राम) क्रमश; सोडियम (159-736), पोटाश...

राजस्थान में ग्रीष्मकालीन बाजरे की खेती खरीफ के अलावा जायद में भी बाजरा की खेती सफलतापूर्वक की जाने लगी है, क्योंकि जायद में बाजरा के लिए अनुकूल वातावरण जहॉ इसके दाने के रूप में उगाने के लिए प्रोत्साहित करता है वहीं चारे के लिए भी इसकी खेती की जा रही है। बाजरे के दानो की पौष्टिक गुणवत्ता ज्वार से अधिक होती है इसमें लगभग 67-68 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 11-12 प्रतिशत प्रोटीन , 2.7 प्रतिशत खनिज लवण , 5 प्रतिशत वसा आदि पाए जाते है | भूमि की चुनाव :- बलुई दोमट या दोमट भूमि जिसका पी.एच. मान 6.5-8.5 हो बाजरा के लिए अच्छी रहती है। व जीवांश वाली भूमि में बाजरा की खेती करने से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। भूमि की तैयारी :- पलेवा करने के बाद मिट्टी पलटने वाले हल से 10–12 सेमी. गहरी एक जुताई तथा उसके बाद कल्टीवेटर या देशी हल से दो–तीन जुताइयॉ करके पाटा लगाकर मृदा भुरभुरी व समतल कर लेते है | भूमिगत कीटो को नष्ट करने के लिए 12 किग्रा कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत प्रति है . की दर से बुवाई के समय मिट्टी में मिला देना चाहिए | प्रजातियां :- बाजरा की उन्नतशील प्रजातियां। प्रजाति पकने की अवधि (दिन) ऊंचाई (सेमी.) उपज (कु./हे.) संकुल     दाना चारा राज -171 80-85 170-200 20-25 45-48 सीजेड पी – 9802 70-75 185-200 12-15     संकर         एच एच बी – 67 65-70 140-195 15-20 15-20 एम पी एम एच – 17 78-80 175-185 26-28 60-70 एम पी एम एच – 21 72-75 170-175 24-25 46-50 जी एच बी...

सुथनी की खेती के लिए उन्नत तकनीक  सुथनी एक कन्दीय फसल है जिसे याम समूह में रखा गया है और यह डायसकोरेसी कुल के अंंर्तगत आती है। इसके पौधों पर छोटे छोटे काँटे पाये जाते हैं। इसे बहुत सारे नामों से जाना जाता है जैसे: - सुथनी, लेसर याम, पिंडालु या छोटा रतालु। इसमे स्र्टाच के साथ साथ बहुत सारे सूक्ष्म तत्व भी पाये जाते है जो मनुष्य के शरीर के लिए बहुत ही उपयोगी होते है। बिहार प्रदेश में इस फसल की मांग छठ पर्व के अवसर पर बढ़ जाती है जिसे लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इस फसल की खेती गर्म एवं आर्द्र जलवायु में की जाती है, जिसके लिए 26 - 31 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान तथा 1200 - 1500 मि॰ली॰ औसत वार्षिक वर्षा उपयुक्त होती है। भूमि का चयन एवं खेतों की तैयारी इस फसल की खेती के लिए उपजाऊ, दोमट या बलुई दोमट मिट्टी के साथ साथ अच्छी जल निकास वाली भूमि उपयुक्त होती है, जिसका पी॰एच॰ मान 5.5 - 6.5 हो। खेत की तैयारी के लिए 1-2 जुताई मिट्टी पलटने वाली हल से करने के बाद 10-15 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट प्रति हेक्टयर की दर से खेतों पर फैला दे, उसके बाद 2-3 जुताई देशी हल से करें तथा प्रत्येक जुताई के बाद पाटा...

अगेती सीताफल (कद्दू) उगानें की उन्‍नत तकनीक Pumpkin (Shitaphal) is a very useful crop in the cucurbit class vegetables. Its cultivation in India has been going on since very old times. Its fruits are used for vegetable in both ripe and raw forms, vegetable and some sweets are also made from its green fruits and ripe fruits. Ripe pumpkin is yellow in color and is rich source of carotene. Its soft leaves and stem facade and flowers are also used as vegetables. Ripe fruits can be stored for several months at normal temperatures. It is also called tonic of the brain. Pumpkin controls blood pressure and also increases digestive power. It is rich in carbohydrates, calcium, magnesium and sodium. It is cultivated prominently in Uttar Pradesh, Bihar, West Bengal, Odisha, Assam, Kerala, Gujarat and Tamil Nadu. Climate Areas with warm climate are good for pumpkin cultivation. Both temperate and sub-tropical climates are suitable for its cultivation. Temperature of 180 to 300 C is good for seed germination and growth of plants. It can also be cultivated in Diara land along the river. The number of male flowers increases due to high temperature and long day. Therefore, the yield is better in rainy season than summer. Land and it spreparation Sandy or loam soil with good drainage and rich...