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Crop Cultivation

भिण्डी की उन्नत उत्पादन तकनीक   भिण्डी को खरीफ, रबी और ग्रीष्म तीनों ही मौसम में उगाया जाता है क्योंकि भिण्डी एक दिवस निष्प्रभावी पौधा है । सब्जी के रूप में भिण्डी के हरे, मुलायम तथा पोषक तत्व युक्त फल खाये जाते है। पौष्टिकता की दृष्टि से भिण्डी में विटामिन, कै‍‍‍ल्शियम, पोटेशियम प्रचुर मात्रा में पाये जाते है। इसके फलों व डण्ठलों का उपयोग कागज उद्योग में भी किया जाता है।  भि‍ण्‍डी उगाने के लि‍ए जलवायु :- भिण्डी को बढ़वार के लिए लम्बे समय तक गर्म मौसम की आवश्कता पड़ती है। इसके बीजो के अच्छे अंकुरण के लिए तापमान 20-30 डिग्री सेंटीग्रेड के मध्य होना चाहिए। तापमान 42 डिग्री सेंटीग्रेड से ऊपर होने पर फूल सुख कर झड़ जाते है। यह पाले के प्रति अतिसंवेदनशील होती है। भि‍ण्‍डी की कास्‍त के लि‍ए भूमि की तैयारी :- भिण्डी उर्वर, चिकनी से बलुई हर प्रकार की मिट्टी जिसमें जलनिकास अच्छा हो उगायी जा सकती है। दोमट मिट्टी जिसका पी.एच. मान 6 से 7.5 हो उत्तम रहती है। बीज बुवाई से पूर्व खेत की एक गहरी जुताई एवं दो-तीन हल्की जुताई कर मिट्टी को भूरभुरी बना लेना चाहिए । खेत को समतल करने के लिए ऊपर से पाटा लगा देना चाहिए । भि‍ंडी की उन्नत किस्में :- भिण्डी की मुख्य उन्नत किस्में एवं उनकी वि‍शेषताए इस प्रकार है : किस्म मुख्य ‍‍...

कटहल की उन्नत खेती तकनीक कटहल भारत का एक महत्वपूर्ण फल है। इसकी उत्पत्ति भारत में हुई हैं। यह विश्व के अन्य देशों में भी उगाया जाता हैं। भारत वर्ष में इसकी खेती पूर्वी एवं पश्चिमी घाट के मैदानों, उत्तर-पूर्व के पर्वतीय क्षेत्रों, संथाल परगना एवं छोटा नागपुर के पठारी क्षेत्रों, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बंगाल के मैदानी भागों में मुख्य रूप से की जाती है। इसे दक्षिण भारत में प्रमुखता से उगाया जाता हैं। जगदलपुर व बस्तर कटहल उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं। कटहल का पौधा एक दीर्घजीवी, सदाबहार, 8-15 मी. ऊँचा बढ़ने वाला, फैलावदार एवं घने क्षेत्रकयुक्त बहुशाखीय वृक्ष होता है। कटहल के छोटे एवं नवजात मुलायम फल सब्जी के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। जैसे-जैसे फल बड़े होते जाते है इनमें गुणवत्ता का विकास होता जाता है एवं परिपक्व होने पर इसके  फलों में शर्करा, पेक्टिन, खनिज पदार्थ एवं विटामिन ‘ए’ का विकास होता है। कटहल में कार्बोहाइड्रेड, प्रोटीन, कैल्शियम, फ़ॉस्फोरस, लौह तत्व विटामिन ‘ए’ एवं थायमिन प्रचुर मात्रा में मिलता है। कठहल के लि‍ए भूमि कटहल के पौधे लगभग सभी प्रकार की मिट्टी में उगाऐ जा सकतेे है परन्तु अच्छी जल निकास वाली गहरी दोमट मिट्टी इसकी बढ़वार एवं पैदावार के लिए उपयुक्त होती है क्योंकि इनकी जड़े भूमि में अधिक पानी के जमाव को सहन नहीं कर सकती...

तरबूज की खेती ग्रामीण आय बढ़ाने का एक अच्‍छा साधन   तरबूज़ ग्रीष्म ऋतु की फसल है । इसका फल बाहर से हरे रंग के होते हैं और अंदर से लाल होते है। ये पानी से भरपूर व मीठे होते हैं। इसे मतीरा  और हदवाना भी कहा जाता है। तरबूज भारत मे बहुत लोकप्रि‍‍‍य फल है। बाजार मेें तरबूज की अच्‍छेे भाव आसानी से मि‍ल जाते है अत: कि‍सानो की आय बढाने मे तरबूज की खेती एक अच्‍छाा साधन हो सकता है।  तरबूज की खेती के लि‍ए भूमि : तरबूज की फसल के लिए बलुई दोमट जमीन बेहतर होती है। इसी वजह से नदियों के किनारे की दियारा जमीन इस के लिए सब से अच्छी मानी जाती है। जमीन में जलनिकासी और सिंचाई का अच्छा इंतजाम होना चाहिए। जलभराव से इस फसल को काफी नुकसान पहुंचता है। परीक्षणों के मुताबिक पाया गया है कि दोमट मिट्टी जिस का पीएच मान 6.5 से 7 के बीच हो तरबूज की खेती के लिए ज्यादा बढि़या होती है। खेत की तैयारी : सब से पहले खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए। उस के बाद 3-4 जुताइयां कल्टीवेटर या देशी हल से करके मिट्टी को खूब भुरभुरी बना लेना चाहिए। नमी की कमी होने पर पलेवा जरूर करना चाहिए। तरबूज की बुआई : तरबूज की फसल पानी नहीं बर्दाश्त...

गेंहू की पछेती बुबाई में पैदावार बढ़ाने के लिए मिश्रित शाकनाशियों का उपयोग  खरपतवार कृषि-पारिस्थितिक तंत्र में अवांछित पौंधें हैं जो सीमित संसाधनों के लिए फसलों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं जिसके परिणामस्वरूप फसल पैदावार और किसानों की आय में कमी आती है। देर से बोए गए गेहूं में, मिश्रित प्रकार के खरपतवार के कारण गेंहू की उपज में 34.3 प्रतिशत तक की कमी पाई गई, जिससे नत्रजन, पासफोरस और पोटाश की क्रमश: 2.57, 0.43 और 1.27 प्रतिशत की हानि पाई गई है। एक आंकलन के अनुसार खरपतवार नियंत्रण की औसतन लगत रु 6000 प्रति हेक्टेयर खरीफ ऋतु में और रु 4000 प्रति हेक्टेयर रबी ऋतु में आंकी गयी है जो कुल फसल लगत की लगभग 33 प्रतिशत और 22 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है। इसलिए, एक कुशल खरपतवार प्रबंधन फसल पूरे फसल चक्र के दौरान सभी प्रकार के खरपतवारों को नियंत्रित करके तथा संसाधनों के समुचित उपयोग से, उत्पादन की लागत और खरपतवारों के द्वारा होने वाली हानियों को कम / नियंत्रित करके, उत्पादकता और किसानों की आय को बढ़ाया जा सकता है। गेहूं से जुड़े खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए कई प्रकार के शाकनाशियों का उपयोग किया जाता है, लेकिन ये शाकनाशी जटिल खरपतवारों को नियंत्रित करने में बहुत ज्यादा प्रभावी नहीं पाए गए हैं। इसलिए, गेहूं के खेतों में प्रबल...

चौडा धनिया: उष्णकटिबंधीय द्वीपों की एक सफल फसल Broad dhaniya (Eryngium foetidum  L. / Umbelliferae-Apiaceae) is a shade loving aromatic and medicinal plant also grown as a leafy vegetable in tropical regions.  Broad dhaniya plant               Broad dhaniya in flowering It is native to Central and Latin America. It is also known as Mexican coriander, cilantro, spiny coriander, fit weed, burma dhaniya, Vilayati dhaniya. CARI, Port Blair has developed its first variety through mass selection using local collections from Andaman & Nicobar Islands and named as ‘CARI Broad Dhaniya’. It has broad, long, serrated leaves with uniform growth and flowering pattern. It is rich in carotenoids, pohyphenols, chlorophyll and ascorbic acid and dietary nutrients like calcium, iron, sodium, copper and potassium. It’s cultivated in shade condition can be a profitable business in humid tropical and warmer regions even where heavy rains are common. Although, it common in Andaman and Nicobar Islands, Eastern and North-eastern parts of Indian at present, but its potential need to be explored in other parts of mainland India. It has unique taste, better post harvest life, demand among the traditional consumers settled in different parts of country, fit very well as intercrop in fruit orchards and grow very well in rainy season in shadenet.   Broad dhaniya in shadenet house...

मध्यप्रदेश में मौसम आधारि‍त खरीफ प्याज की खेती  प्याज लगभग सभी भूभागोंकी एक महत्वपूर्ण फसल है और कई देशों में इसकी व्यावसायिक रूप से खेती की जाती है। यह भारत वर्ष के प्रत्येक पाकगृह में सब्जी और मसालों में इस्तेमाल होनेवाली एक आवश्यक वस्तु है। वर्तमान में भारत दुनिया में प्याज का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है (बागवानी सांख्यिकी, 2017)। देश में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, बिहार, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल प्रमुख प्याज उत्पादक राज्य हैं। देश के कुल प्याज उत्पादन का लगभग 90% पैदावार इन राज्योंसे आता हैI देश में मध्यप्रदेश दूसरा सबसे बड़ा प्याज उत्पादक राज्य है। मध्यप्रदेश सालाना 1,02.9 हज़ार हेक्टर क्षेत्र से लगभग 3721.61 लाख टन प्याज का उत्पादन करता है। साल 2016-17 के दौरान, मध्य प्रदेश ने देश में प्याज के कुल उत्पादन का 16.59 प्रतिशत उत्पादन करके महाराष्ट्र (30.03%) के बाद दूसरा दर्जा हासिल किया था (बागवानी सांख्यिकी, 2018)। मध्यप्रदेश में प्याज की तीनों मौसमों में पैदावार होती है, जैसे खरीफ, लेट खरीफ और रब्बी सीजन। मध्यप्रदेश में खरीफ प्याज की बोवाई जुलाई से लेकर अगस्त तक होती है और अक्टूबर से दिसंबर के दौरान इसकी खुदाई होती है। लेट खरीफ प्याज की खुदाई जनवरी से मार्च के दौरान होती है, जो की अक्टूबर से नवंबर के दौरान इसकी रोपाई की जाती है। मध्यप्रदेश...

अमरूद के पुराने वृक्षों तथा बागो का जीर्णोद्धार अमरूद पोषक तत्त्वों से भरपूर एवं स्वादिष्ट फल है। देश के प्राय: सभी उष्ण तथा उपोष्ण क्षेत्रों में अमरूद की खेती की जाती है। अमरूद के पौधे लगाने के 3-4 वर्षों के बाद फल देने लगते हैं और 25-30 वर्षों तक फल देते रहते हैं। अमरूद के बाग , पुराने होने पर उत्पादन कम होने के साथ ही घने भी हो जाते हैं। ऐसे में ये वृक्ष किसानों के लिए लाभदायक नहीं रह जाते हैं। पुराने एवं अनुत्पाद्क वृक्षों को दो वर्ष में जीर्णोद्धार द्वारा ठीक किया जा सकता है। जीर्णोद्धार के माध्यम से पुन: आगामी 10-15 वर्षों तक उत्पादन ले सकते हैं। अमरूद के बाग के पुराने होने पर उत्पादन कम होने के साथ ही किसान पुराने वृक्षों को काटकर नए पौधे लगा देते हैं। नये बाग को लगाने का खर्च 50-60 हजार प्रति हेक्टेयर आता है और प्रारंम्भ में 3-4 वर्षों तक बहुत कम फल मिलता हैं। जीर्णोद्धार करने से अतिरिक्त लकड़ी भी मिलती हैं जो जलावन के काम आती है। पुराने वृक्षों की वांछित कटाई व छंटाई करने से नये तने निकलते हैं ताकि वे पुन: फल दे सकें। वैज्ञानिक तरीके से वृक्षों की डाली और फल देने वाली शाखाओं का निर्धारण किया जाता है। अगले दो साल में इन वृक्षों की बेहतर...

 लोकप्रिय दलहनी फसल मसूर की खेती  मसूर बिहार की बहुप्रचलित एवं लोकप्रिय दलहनी फसल है तथा इसका कुल क्षेत्रफल 1.71 लाख हे0 एवं औसत उत्पादकता 880 किलोग्राम/हे0 है। मसूर की खेती, भूमि की उर्वरा शक्ति बनाये रखने मेें सहायक होती है। असिंचित क्षेत्रों के लिए अन्य रबी दलहनी फसलाेें की उपेक्षा मसूर अधिक उपयुक्त हैं। मसूर उगाने के लि‍ए मि‍ट्टी- दोमट मिट्टी मसूर के लिए सर्वोतम पायी जाती है। मिट्टी भुरभूरी होना आवश्यक है। इसलिए 2-3 बार देशी हल अथवा कल्टीवेटर से जुताई कर ऐसी अवस्था प्राप्त किया जा सकती है। उन्नत प्रभेद या प्रजाति‍यॉं: ऽ     छोटे दाने वाले प्रजातियाँ: पी.एल.-406, पी.एल. 639, एच.यु.एल. 57 ऽ     बड़े दाने वाले प्रजातियाँ: अरूण, मल्लिका, आई.पी.एल.406 ऽ     अन्य प्रभेद: शिवालिक, नरेन्द्र, मसूर 1, के.एल.एस. 218 मसूर फसल में पोषक तत्व प्रबंधन: राइजोबियम कल्चर का प्रयोग - मसूर के बीज में राइजोबियम कल्चर का प्रयोग करने से फसल की जड़ों में नेत्रजन स्थिरीकरण बढ़ जाती है जिससे भुमि की उर्वरता बढ़ जाती है, तथा उपज में भी बढ़ोतरी होती है। राइजोबियम कल्चर का (5 पैकेट, प्रत्येक 200) प्रति हे0 की आवश्यकता होती है। कल्चर का व्यवहार उसकी समाप्ती तिथि देखकर ही करें। 100 ग्राम गुड़ को 1 लि0 पानी में घोलकर हल्का गरम करें ताकि घोल लसलसा हो जाए। तदोपरान्त ठण्डा होने पर उस घोल में 5 पैकेट राइजोबियम कल्चर डालकर अच्छे तरीक से मिला...