02 Oct सब्जी बीजों में सुप्तावस्था सुप्तावस्था का अंकुरण पर प्रभाव
- परिचय
बीज अंकुरण सफल फसल स्थापना की आधारशिला है। सब्जी फसलों में उच्च गुणवत्ता वाले बीज का महत्व अधिक होता है क्योंकि इनकी खेती गहन एवं व्यावसायिक होती है। तथापि, अनेक सब्जी बीजों में बीज सुप्तावस्था पाई जाती है, जिसमें जीवित बीज अनुकूल परिस्थितियों में भी अंकुरित नहीं होते। यह स्थिति अंकुरण क्षमता, बीज परीक्षण परिणाम तथा कुल उत्पादकता को प्रभावित करती है।
- बीज सुप्तावस्था की अवधारणा
बीज सुप्तावस्था एक शारीरिक अवस्था है जिसमें जीवित बीज पर्याप्त नमी, तापमान, ऑक्सीजन एवं प्रकाश उपलब्ध होने के बावजूद अंकुरित नहीं होता। यह एक प्राकृतिक अनुकूलन प्रक्रिया है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में अंकुरण को रोककर प्रजाति के अस्तित्व को सुनिश्चित करती है। किंतु व्यावसायिक सब्जी उत्पादन एवं बीज परीक्षण में यह कई व्यावहारिक समस्याएँ उत्पन्न करती है।

चित्र: तोरई के बीजों में बीज सुप्तावस्था
- सब्जी बीजों में सुप्तावस्था के प्रकार
(i) बाह्य सुप्तावस्था यह बाहरी कारणों से होती है, मुख्यतः कठोर या अभेद्य बीजावरण के कारण, जो जल अवशोषण एवं गैस विनिमय को रोकता है।
उदाहरण: भिंडी, लोबिया, एवं सेम।
कठोर बीजावरण के कारण अंकुरण में विलंब एवं असमानता आती है।
(ii) आंतरिक सुप्तावस्था यह आंतरिक कारणों जैसे अपरिपक्व भ्रूण या हार्मोनल असंतुलन के कारण होती है।
उदाहरण: गाजर, प्याज, अजवाइन।
कुछ मामलों में अंकुरण के लिए आफ्टर-राइपनिंग या विशेष तापमान उपचार की आवश्यकता होती है।
(iii) रासायनिक सुप्तावस्था बीज ऊतकों में उपस्थित अवरोधक रसायन जैसे एब्सिसिक अम्ल (ABA) अंकुरण को विलंबित करते हैं।
उदाहरण: कुकुर्बिट कुल की फसलें जैसे कद्दू, लौकी एवं करेला।
- बीज सुप्तावस्था का अंकुरण पर प्रभाव
- अंकुरण प्रतिशत में कमी
सुप्त बीज प्रयोगशाला परीक्षण में कम अंकुरण दर्शाते हैं, जबकि वे जीवित होते हैं। - अंकुरण में विलंब
सुप्त बीजों को अंकुरित होने में अधिक समय लगता है, जिससे नर्सरी प्रबंधन प्रभावित होता है। - असमान अंकुरण
असमान अंकुरण के कारण पौधों की वृद्धि असमान होती है, जो सब्जी उत्पादन में अवांछनीय है। - फसल स्थापना में कमी
समान पौध संख्या पोषक तत्व उपयोग, सिंचाई प्रबंधन एवं कटाई के लिए आवश्यक है। सुप्तावस्था के कारण पौधों में रिक्त स्थान बन जाते हैं और उत्पादन घटता है।
उदाहरणतः टमाटर एवं मिर्च में हल्की सुप्तावस्था प्रारंभिक अंकुरण को धीमा करती है, जबकि भिंडी में कठोर बीजावरण समान अंकुरण को प्रभावित करता है।
- बीज परीक्षण पर सुप्तावस्था का प्रभाव
बीज परीक्षण प्रयोगशालाएँ अंकुरण एवं जीवनीयता परीक्षण के माध्यम से बीज गुणवत्ता का आकलन करती हैं। सुप्तावस्था इन परीक्षणों की सटीकता को प्रभावित करती है।
(i) जीवनीयता का कम आकलन
यदि उचित उपचार न किया जाए, तो सुप्त बीजों को मृत समझ लिया जाता है।
(ii) परीक्षण समय में वृद्धि
सुप्तावस्था तोड़ने हेतु पूर्व-शीतन या रासायनिक उपचार करने से परीक्षण अवधि बढ़ जाती है।
(iii) प्रमाणीकरण में त्रुटि
कम अंकुरण के कारण बीज लॉट अस्वीकृत हो सकता है, जबकि उसकी वास्तविक जीवनीयता पर्याप्त होती है।
(iv) विशेष परीक्षण प्रोटोकॉल की आवश्यकता
अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ सुप्तावस्था के समाधान हेतु विशेष दिशानिर्देश प्रदान करती हैं।
जैसे: इंटरनेशनल सीड टेस्टिंग एसोसिएशन (ISTA) एवं एसोसिएशन ऑफ ऑफिशियल सीड एनालिस्ट्स (AOSA)।
- सुप्तावस्था दूर करने के उपाय
उचित अंकुरण एवं परीक्षण सुनिश्चित करने हेतु निम्न तकनीकों का उपयोग किया जाता है:
- स्कारिफिकेशन (Scarification)
बीजावरण को यांत्रिक या रासायनिक रूप से कमजोर करना।
उपयोग: भिंडी, सेम आदि। - गर्म जल उपचार
बीजों को 50–60°C तापमान के गर्म पानी में भिगोना। - रासायनिक उपचार
जिबरेलिक अम्ल (GA₃) का प्रयोग अंकुरण को बढ़ावा देता है। - पूर्व-शीतन (Stratification)
बीजों को 5–10°C पर कुछ समय तक रखना।
उपयोग: गाजर, प्याज। - प्रकाश उपचार
कुछ बीज (जैसे लेट्यूस) प्रकाश के प्रति संवेदनशील होते हैं और उन्हें अंकुरण हेतु प्रकाश की आवश्यकता होती है।
- सब्जी बीज उत्पादन में महत्व
- संकर (Hybrid) बीज उत्पादन में समान अंकुरण अत्यंत आवश्यक है।
• विलंबित अंकुरण नर्सरी एवं रोपाई कार्यक्रम को प्रभावित करता है।
• बीज कंपनियों को विपणन से पहले सुप्तावस्था को न्यूनतम करना चाहिए।
• निर्यात गुणवत्ता वाले बीजों को कठोर अंकुरण मानकों को पूरा करना होता है।
उचित सुप्तावस्था प्रबंधन से बीज स्वीकृति, कृषक विश्वास एवं बाजार मूल्य में वृद्धि होती है।
- निष्कर्ष
बीज सुप्तावस्था एक प्राकृतिक सुरक्षात्मक तंत्र है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में बीज को सुरक्षित रखता है। किंतु सब्जी फसलों में यह अंकुरण प्रतिशत, समानता एवं बीज परीक्षण की सटीकता को प्रभावित करता है। उचित सुप्तावस्था-निवारण तकनीकों के अभाव में जीवित बीजों को निम्न गुणवत्ता का माना जा सकता है।
अतः सब्जी बीज उत्पादन, परीक्षण एवं प्रमाणीकरण में सुप्तावस्था का वैज्ञानिक प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। इससे विश्वसनीय अंकुरण परिणाम, समान फसल स्थापना एवं उच्च उत्पादकता सुनिश्चित की जा सकती है।
Author
अर्चना सान्याल¹, रीना रानी² एवं शिवम कुमार राय¹
1भा0 कु0 अनु0 प0 –भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी
2भा0 कु0 अनु0 प0 – भारतीय गेहूँ एवं जौ अनुसंधान संस्थान, हरियाणा
Email: archana0811bhu@gmail.com