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Crop Cultivation

Cultivation of Jamun in Haryana जामुन मूल रुप से भारत, पाकिस्तान और इंड़ोनेशिया का पौधा है जिसको विभिन्न नाम जैसे जावा प्लम व काला प्लम व जमबोलन तथा जमबुल आदि से जाना जाता है। यह वृक्ष मायटऐसी कुल और मायर्टलेस आर्ड़र में आता है। जामुल का वृक्ष एक विशाल और शाखाओं वाला वृक्ष है इसकी छाल भूरे रंग की अधिक चिकनी और लगभग 2.5 सेंटी मीटर मोटी होती है। हालांकि इसके फलों को सभी के द्वारा पंसद किया जाता है और उच्च दामों में बेचा जाता है तो भी यह वृक्ष एक बगीचे के पेड़ के रुप में अभी तक नही उगाया जाता है। लवणीय, क्षारीय, आर्द्र व जलभराव वाले क्षेत्र में इसे उगाया जा सकता है। नहरो और नदियों के किनारे की मृदा संरक्षण के लिए भी यह वृक्ष उपयुक्त्ता होता है। उपयोग : जामुन का अर्क मधुमेह, रक्त शर्करा को कम करने में बहुत उपयोगी होता है। फूल उत्तार भारत में शहद के प्रमुख स्त्रोत के रुप में उपयोग किए जाते है। फल के प्रतिरोधी गुण पाये जाते है और बहुत से रोगों के इलाज में दवा तैयार करने में उपयोग किए जाते हैं। फल का उपयोग जेली, मुरब्बा, संरक्षित खाद्य पदार्थ, शरबत और शराब बनाने में किया जाता है। बीजों का उपयोग मधुमेह में एक प्रभावी दवा के लिए किया जाता है। जामुन का रासायनिक घटक...

Importance of varieties selection and nursery management for improvement in paddy production धान एक महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है विश्व की अधिकांश जनसंख्या (लगभग 60 प्रतिशत) द्वारा दैनिक भोजन में चावल का उपयोग भात, पोहा, मुरमुरा, लाई, आटे की रोटी के इत्यादि के रूप में किया जाता है। धान उत्पादन में चीन के बाद भारत का दूसरा स्थान है। जैसा की हम जानते है कि हर खुशबूदार धान, बासमती धान नहीं होता लेकिन हर बासमती धान खुशबूदार होता है इसलिए धान (चावल) को दाने का आकार और गुणवत्ता के आधार पर मुख्यतः तीन श्रेणियों बासमती धान, सुगन्धित धान और असुगन्धित धान में बांटा जा सकता है। भारतीय उपमहाद्वीप में उत्पादित बासमती धान अपने अद्भुत गुणों जैसे दानों का आकार, सुगंध, अच्छा स्वाद, सुपाचय और अधिक समय तक इन्हीं गुणों का बने रहना जो कि व्यावसायिक दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण हैं। धान की अच्छी फसल के लिए जलवायु एंव मृदा धान एक उष्ण तथा उपोष्ण जलवायु की फसल है। धान की अच्छी फसल के लिए उच्च तापमान (औसतन 20 से 37 डिग्री), लम्बे समय तक सूर्य की रोशनी, नमी एवम पर्याप्त पानी की उपलब्ध होना चाहिए। अच्छी जल धारण क्षमता वाली मृदा, जिसका पीएच मान 5.0 से 9 के बीच होता है, में धान की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। मटियार चिकनी मृदा जिसका पीएच मान 5.0...

Advanced Farming Technique of Beetroot. चुकंदर का शुमार मीठी सब्जियों में किया जाता है । चुकंदर में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट लाल तत्व में कैंसर रोधी क्षमता होती है । इतना ही नहीं यह हृदय की बीमारियों में भी कारगर माना जाता है । चुकंदर की कई प्रजातियाँ भारत में उगाई जाती हैं । अलग-अलग राज्यों में इसको अलग-अलग नाम से भी जाना जाता है । बांग्ला में बीटा गांछा, हिंदी पट्टी में चुकंदर, गुजरात में सलादा, कन्नड़ भाषा में गजारुगद्दी, मलयालम में बीट, मराठी में बीटा, पंजाबी में बीट और तेलुगु में डंपामोक्का के नाम से मशहूर प्रजातियां भारत में सामान्यतः उगाई जाती है। भारत में उगायी जाने वाली चुकंदर की प्रजातियां डेट्रॉइट डार्क रेड – इस नस्ल के चुकंदर का गूदा खून की तरह लाल रंग का होता है। सतह चिकनी और गाढ़े लाल रंग की होती है । पत्तियां हरी और लम्बी होने के साथ ही मैरून रंग के आंशिक प्रभाव वाली होती है । ज्यादा उत्पादन के लिए यह प्रजाति मशहूर है । मिश्र की क्रॉस्बी – चपटी जड़ों के साथ चिकनी सतह वाली इस प्रजाति का आंतरिक रंग गहरा बैंगनी लाल होता है। इस प्रजाति को तैयार करने में 55 से 60 दिनों का समय लगता है । क्रिमसन ग्लोब– चुकंदर की यह प्रजाति सामान्यतः चपटी होने के साथ जड़ों का रंग मध्यम लाल...

Bael (Wood apple) production technique. बेल भारत के प्राचीन फलों में से औषधीय गुणों से भरपूर एक महत्वपूर्ण फल है। स्थानीय स्तर पर इसे बेलगिरी, बेलपत्र, बेलकाठ या कैथा के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी भाषा में इसे वुड एप्पल (Wood Apple) कहतें हैं। यह एक पतझड़ वाला वृक्ष हैं, जिसकी ऊंचाई 6-8  मीटर होती है और इसके फूल हरे-सफ़ेद और मीठी सुगंध वाले होते हैं| इसके फल लम्बाकार  होते है, जो ऊपर से पतले और नीचे से मोटे होते हैं| बेल को पोषक तत्वों और औषधीय गुणों के कारण बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है| इसके फल में विभिन्न प्रकार के एल्कलाॅइड, सेपोनिन्स, फ्लेवोनाॅइड्स, फिनोल्स कई तरह के फाइटोकेमिकल्स विटामिन-ए, बी.सी., खनिज तत्व व कार्बोहाइड्रेट पाये जाते हैं। बेल के जड़, छाल, पत्ते शाख और फल औषधि रूप में मानव जीवन के लिये उपयोगी हैं। बेल से तैयार दवाइयाँ दस्त, पेट दर्द, फूड पाईप, मरोड़ आदि के लिए प्रयोग की जाती हैं| इसका प्रयोग शुगर के इलाज, सूक्ष्म-जीवों से बचाने, त्वचा सड़ने के इलाज, दर्द कम करने के लिए, मास-पेशियों के दर्द, पाचन क्रिया आदि के लिए की जाने के कारण, इसको औषधीय पौधे के रूप में जाना जाता हैं| इससे अनेक परिरक्षित पदार्थ (शरबत, मुरब्बा) बनाया जा सकता है। बेल के उपयोग फलों के गूदे का उपयोग पेट के विकार में किया जाता है। फलों का...

गर्म मौसम की स्थिति के दौरान तेल ताड का प्रबंधन कैसे करें?  Oil palm is a humid tropical crop which requires a very high annual rainfall of more than 2000 mm well distributed @150 mm per month. In India, very few locations receive rainfall throughout the year and it is not sure that the amount will exceed 150 mm per month or not. That is why oil palm is grown and promoted as irrigated crop in India except in few pockets of high rainfall areas. This crop requires around 150 to 200 litres of water per day per palm during juvenile phase and around 200 to 250 litres per day per palm for adult plantations. What happens if water requirement is not met? If the palm does not get enough water, the number of spear leaves increases as it hinders the opening of spear leaves and finally leaf production gets affected. Further continuance of drought conditions results in necrosis of older leaves, young leaves and ultimately roots. In juvenile palms, photosynthetic activity gets affected, leaves become yellow and leaf tips bronze coloured. In some cases, rolling of lower leaflets also can be seen. In matured palms, rolling of leaflets of mature leaves, reduction in photosynthesis and finally wilting and drying of leaves. These  symptoms finally end...

Baby Corn Production Technology मक्के के अनिषेचित भुट्टे को बेबी काॅर्न कहते हैं। इसकी लम्बाई 6-12 सेमी. एवं ब्यास 1-1.5 सेमी. होता है। अच्छा बेबी काॅर्न हल्के पीले रंग का होता है। सिल्क आने के 1-3 दिन के अन्दर इसकी तुड़ाई करनी चाहिए। एक वर्ष में बेबी काॅर्न की 3-4 फसलें ली जा सकती हैं। इसकी कम लागत में उत्पादन, देश के भीतर उच्च मांग, आशाजनक बाजार, मूल्य संवर्धन की गुंजाइश,  स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहायता और बढ़ी हुई आय के कारण यह किसानों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। ताजी भुट्टों की कटाई के बाद बेबी काॅर्न के बचे हुए डंठल और पत्तियां पशुधन के खाद्य पदार्थाें और साइलेज के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है। यह घर और रेस्टोरेंट के व्यंजनों में एक संघटक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। बेबीकार्न में अधिक फास्फोरस (86 मिग्रा/ 100 ग्रा खाद्य हिस्सा), फोलेट,  रेशा, बिटामिन बी, और कम कैलोरी के कारण यह अधिक पोषक है। बेबी काॅर्न की उत्पादन तकनीक बेबीकाॅर्न का उत्पादन सामान्य मक्का उत्पादन के समान ही है केवल इस में घनत्व, नर मंजरी को हटाना और जल्दीक टाईका अन्तर है। बेबी काॅर्न की खेती के लि‍ए मृदा बेबी काॅर्न की खेती के लिए अच्छी प्रकार से सिंचित, बलुई दोमट से सिल्टी दोमट मृदा उत्कृष्ट होती है। हल्की और समभावी मृदायें बेहतर होती...

Multi cut fodder sorghum cultivation technique.  भारत में मात्र 4 प्रतिशत भूमि पर चारे की खेती की जाती है तथा एक गणना के अनुसार भारत में 36 प्रतिशत हरे चारे एवं 40 प्रतिशत सूखे चारे की कमी है | अत:  हमें उन चारा फसलों की खेती करनी होगी जो लम्बे समय तक पशुओं को पोष्टिक हरा चारा उपलब्ध कराने के साथ साथ हमारी जलवायु में आसानी से लगाई जा सके| शरद ऋतू में बरसीम, जई, रिजका, कुसुम आदि की उपलब्धता मार्च के पहले पखवाड़े तक बनी रहती है किन्तु बहु कट चारा ज्वार से पशुओं को लम्बे समय तक हरा चारा आसानी से मिल सकता है। ज्वार का चारा स्वाद एवं गुणवत्ता में बहुत अच्छा होता है | शुष्क भार के आधार पर ज्वार चारे में औसत 9 से 10 प्रतिशत प्रोटीन, 8-17 प्रतिशत शर्करा, 30-32 प्रतिशत फाइबर, 65-72 प्रतिशत एन.डी. एफ., 36 प्रतिशत सेलुलोज एवं 21 से 26 प्रतिशत हेमी सेलुलोज पाया जाता है | चारा ज्वार की बहु कटाई वाली किस्में: चारा उत्पादन हेतु भारत में ज्यादातर किसान ज्वार की स्थानीय किस्में लगाते है जो कम उत्पादन देने के साथ-साथ कीट एवं रोगों से प्रभावित होती है | अत: किसानो को अधिक उत्पादन देने वाली बहु कटाई चारा ज्वार किस्मों का अपने क्षेत्र के अनुरूप चयन करना चाहिए | एस. एस. जी.-59-3,एम. पी. चरी, पूसा चरी  23, को. 29, सी. एस. एच. 20, सी. एस. एच. 24 एम. एफ, पी. सी. एच. 106, पी. सी. एच. 109,पंजाब सुड़ेक्स तथा हरा सोना ज्वार खेत का चुनाव एवं तैयारी : चारा ज्वार...

Strawberry farming, perfect instrument of more income  स्ट्राबेरी एक महत्वपूर्ण नरम फल है,जिसको विभिन्न प्रकार की भूमि तथा जलवायु में उगाया जा सकता है। यह पॉलीहाउस  के अंदर और खुले खेत दोनों जगह हो जाता है। इसका पौधा कुछ ही महीनों में फल दे सकता है। इस फसल का उत्पादन बहुत लोगों को रोजगार दे सकता है। स्ट्रॉबेरी दुसरे फलों के मुकाबले जल्दी आमदनी देता है। यह कम लागत और अच्छे मूल्य का फल है। स्ट्रॉबेरी फ्रेगेरिया जाति का एक पौधा  होता है, जिसके फल के लिये इसकी विश्वव्यापी खेती की जाती है। स्ट्रॉबेरी की विशेष गन्ध इसकी पहचान है। ये चटक लाल रंग की होती है। इसे ताजा फल के रूप में खाया जाता है। स्ट्रॉबेरी स्वाद में हल्का खट्टा और हल्का मीठा होता है। साथ ही इसे संरक्षित कर जैम, रस, आइसक्रीम, मिल्क-शेक, कन्फेक्शनरी , चूइंगम, सॉफ्ट ड्रिंक  आदि के रूप में भी इसका सेवन किया जाता है। स्ट्रॉबेरी  एंटीऑक्सिडेंट, विटामिन सी , विटामिन-बी 1, बी 2, नियासिन,  प्रोटीन और खनिजों का एक अच्छा प्राकृतिक स्रोतों है। इसमें मिनरल्स भरपूर मात्रा में होते हैं। स्ट्राबेरी की किस्में  भारत में स्ट्राबेरी की बहुत सी किस्में उगाई जाती हैं जैसे कि‍: कैमारोजा- यह एक कैलीफोर्निया में विकसित की गई किस्म है व थोड़े दिन में फल देने वाली किस्म है। इसका फल बहुत बड़ा व मजबूत होता है। यह...