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Crop Cultivation

Cultivation Technique of Beneficial Dragon Fruit (pitaya or pitahaya) ड्रैगन फ्रूट सेहत के लिए बहुत फायदेमंद और पोषक तत्त्वों से भरपूर फल माना जाता है। ड्रैगन फ्रूट का फल अंदर से काफी मुलायम और बहुत टेस्टी होता है। केक्टस की नस्ल से निकलने वालेे  ड्रैगन फ्रूट में हमारे शरीर के लि‍ए अच्छे प्रोटीन की काफी मात्रा उपलब्ध रहती है। यह एक अनोखा फूल है जो रात के समय जयादा तेजी बढ़ता है और इसी लि‍ए इसका एक फेमस नाम  क्वीन ऑफ़ द नाईट भी है । ड्रेगन फ्रूट मुख्य रूप से थाइलैंड, वियतनाम, इज़रायल और श्रीलंका में लोकप्रिय है। बाजार में 150 -200 रु कि‍लो तक दाम मिलने की वजह से हाल के दिनों में भारत में भी इसकी खेती का प्रचलन बढ़ा है। कम वर्षा वाले क्षेत्र ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। ड्रैगन फ्रूट में औषधीय गुण भी होते हैं। इस फल में एंटी ऑक्सीडेंट की मात्रा ज्यादा पायी जाती है जो कई सारे रोगों से लड़ने में सहायता करता है। इस फल के सेवन से मधुमेह नियंत्रित होती है। शरीर में बढे हुए कोलेस्ट्रॉल को कम करता है। ड्रेगन फ्रूट के पौधे का उपयोग सजावटी पौधे के साथ साथ ड्रेगन फ्रूट के उत्‍पादन के लिए कि‍या जा सकता है।यह फ्रूट खाने में मुलायम होता है और हमें हमारे दैनिक जीवन में...

Spirulina (Arthro spira platensis) cultivation for low investment and high income स्पिरोलिना (ऑरथो स्पाइरा प्लैटेंसिस), एक नील हरि‍त शैवाल (Blue green algae) है। यह एक पौष्टिक प्रोटीन आहार पूरक है और इसका उपयोग कई दवाओं के निर्माण और सौंदर्य प्रसाधनों में भी किया जाता है। इसमें  प्रोटीन, एंटीऑक्सिडेंट्स, कई विटामिन और खनिज प्रचूर मात्रा पाए जाते है। स्वस्थ जीवन शैली के लिए यह एक सूपर फूड के रूप में जाना जाता है। कृषि में बढती लागत व कम रि‍टर्न के कारण कि‍सान की आय में नि‍रंतर गि‍रावट आ रही है। कि‍सान की आय को बढाने के लि‍ए स्‍पाईरूलि‍ना की खेती में बहुत संभावनाऐ नजर आती है। आजकल एक किलो सूखे स्पिर्युलिन पाउडर (Dry spirulina powder) का बाजार मुल्‍य लगभग 1000 रुपये के आसपास है। अत: स्पिरोलिना की खेती से कि‍सान कम निवेश करके, नियमित फसलों की तुलना में, अच्छी आय पा सकते है। स्पाइरुलिना की व्यावसायिक स्तर खेती, धीरे-धीरे भारत के कई हि‍स्‍सो में, विशेषकर तमिलनाडु में होने लगी है। भारत में मानसून अनि‍श्‍चि‍तता तथा फसल उत्‍पादो की बि‍क्री से जुडी समस्‍याओं के कारण भी कि‍सानो का रूझान स्‍पि‍रोलि‍ना की खेती की ओर जा रहा है क्‍योकि‍ स्‍पि‍रोलि‍ना के लि‍ए नि‍श्‍चि‍त बाजार है तथा ये नि‍यमि‍त आय देने वाली फसल है। स्पाइरुलिना का उत्‍पादन हालाकि‍ स्पाइरुलिना किसी भी सुविधाजनक आकार के सीमेंट या प्लास्टिक के...

Improved dense orchard techniques of nutrient fruit lychee लीची एक फल के रूप में जाना जाता है। जिसे वैज्ञानिक नाम लीची चाइनेन्सिस से बुलाते है। इसका परिवार है सोपबैरी। यह ऊपोष्ण कटिबन्धीय फल है, जिसका मूल निवास चीन है। लीची के फल अपने आकर्षक रंग, स्वाद और गुणवत्ता के कारण भारत ही नहीं बल्कि विश्व में अपना विशिष्ट स्थान बनाये हुये है। इसमें प्रचुर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है। इसके अलावा प्रोटीन, खनिज पदार्थ, फास्फोरस,  चूना, लोहा, रिबोफ्लेविन तथा विटामिन-सी इत्यादि पाये जाते हैं। इसका उपयोग डिब्बा बंद, स्क्वैश, कार्डियल, शिरप, आर.टी.एस., लीची नट इत्यादि बनाने में किया जाता है। लीची को सघन बागवानी के रूप में सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है। परन्तु इसकी खेती के लिए विशिष्ट जलवायु की आवश्यकता होती है जो देश के कुछ ही क्षेत्रों में है। अतः इसकी खेती बहुत ही सीमित भू-भाग में की जा रही है। देश में लीची की बागवानी सबसे अधिक बिहार में की जाती है। इसके अतिरिक्त देहरादून की घाटी उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र, झारखण्ड के छोटानागपुर क्षेत्र तथा छत्तीसगढ के अंबिकापुर क्षेत्र में की जाती है। फलों की गुणवत्ता के आधार पर अभी तक उत्तरी बिहार की लीची का स्थान प्रमुख है। सघन बागवानी सघन बागवानी से तात्पर्य है कि एक निश्चित क्षेत्रफल मे आधुनिक प्रबंधन के सामंजस्य से आधिक से अधिक पौधो का समावेश...

अरबी (Taro) की करे वैज्ञानिक पद्धति से खेती Taro or Colocasia is also known by the names Ghuiya, Kochai, Colocasia esculenta, etc. It is cultivated in Kharif and Zaid seasons. Its vegetable is made like potato and bhaji and pakoras are made from its leaves. Itching ends when boiled. Tuber mainly consists of starch. Vitamin 'A' and calcium, phosphorus and iron are also found in Arabic leaves. अरबी को घुईया, कोचई, Colocasia esculenta,  आदि नामों से भी जाना जाता है। इसकी खेती  खरीफ और जायद मौसम में की जाती है। इसकी सब्जी आलू की तरह बनाई जाती है तथा पत्तियों की भाजी और पकौड़े बनाए जाते हैं उबालने पर इसकी खुजलाहट समाप्त हो जाती है। कंद में प्रमुख रूप से स्टार्च होता है। अरबी की पत्तियों में विटामिन ‘ए‘ तथा कैल्शियम, फॉस्फोरस और आयरन भी पाया जाता है। (अरबी का खाद्य मूल्य- प्रति 100 ग्राम) पोषक तत्व  मात्रा नमी 37.10 ग्राम वसा 0.10 ग्राम रेशा 1.00 ग्राम खनिज पदार्थ 1.70 ग्राम प्रोटीन 3.00 ग्राम लोहा 1.70 मि.ग्रा. पोटेशियम 555.0 मि.ग्रा. थियामिन 0.9 मि.ग्रा. कार्बोहाइड्रेट 21.10 ग्राम विटामिन ‘ए’ 400.0 आई.यू. केल्शियम 40.00 मि.ग्रा. सोडियम 9.00 मि.ग्रा. अरबी की फसल केे लि‍ए जलवायु अरबी की फसल को गर्म तथा आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है। इसलिए इसे ग्रीष्म एवं वर्षा दोनों ही मोसमो में सफलता पुर्वक उगाया जा सकता है। अरबी की बुवाई के लिए पर्याप्त जीवांश वाली रेतीली दोमट मिट्टी अच्छी रहती है। जिसमे कड़ी परत न हो साथ ही जल निकास की अच्छी पर्याप्त...

Scientific cultivation of capsicum. किसान भाई शिमला मिर्च की खेती करके लाखों कमा सकते हैं । शिमला मिर्च की उन्नतशील किस्मों की खेती की जाए तो किसानों को करीब-करीब 30 से 50 क्विंटल प्रति एकड़ फसल की प्राप्ति हो सकती है । शिमला मिर्च की खेती हरियाणा, पंजाब, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक आदि प्रदेशों में अच्छी तरह से की जा सकती है । तो जानते है कैसे शिमला मिर्च की खेती को वैज्ञानिक तरीके से किया जाता है और कैसे आप इसे लाभदायक व्यवसाय बना सकते हैं | शिमला मिर्च की खेती एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें आप दो से चार महीने में अच्छा लाभ  कमा  सकते हैं । अगर  आप सही तरीके से शिमला मिर्च की उन्नत खेती करते हैं तो आपको चार महीने में बहुत अच्छा लाभ प्राप्त हो सकता है । शिमला मिर्च की खेती कम पूँजी की आवश्यकता होती है साथ ही इसकी खेती के लिए हमारे देश की जलवायु तथा माँग बहुत अच्छी है । भूमि का चयन  आप जब भी इसकी खेती करने जा रहे हों तो सबसे पहले आपको उचित भूमि का चयन करना होगा ताकि अच्छी पैदावार हो । शिमला मिर्च  की खेती के लिए चिकनी दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास का अच्छा प्रबंध किया गया हो, उसे हीं सबसे अच्छा माना जाता है । इसकी खेती के लिए भूमि...

Watermelon and Muskrmelon cultivation for more income in less time     तरबूज (वैज्ञानिक नाम - सिटीलुस लैनाटस ) और खरबूजा (वैज्ञानिक नाम - कुकुमिस मेलो ), जायद मौसम की प्रमुख फसल हैं। इसकी खेती मैदानों से लेकर नदियों के पेटे में सफलतापूर्वक की जा सकती हैं। ये कम समय, कम खाद और कम पानी में उगाई जा सकने वाली फसलें हैं। उगने में सरल, बाजार तक ले जाने में आसानी और अच्छे बाजार भाव से इसकी लोकप्रियता बढती जा रही हैं इसके कच्चे फलो का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता हैं।  इनके पके हुऐ फल अत्यंंत लोकप्रि‍य,  मीठे, शीतल, मृदुल वि‍‍‍‍‍‍रेचक एवं प्यास को शांत करने वाले होते हैं।  तरबूज एक महत्वपूर्ण ककड़ी सब्जी है। यह भारत के विभिन्न भागों में तरमुज कलिंदा और कालिन्दी के रूप में जाना जाता है । हालांकि तरबूज व खरबूजा उद्यान भूमि में विकसित किया जाता है परन्‍तू छत्तीसगढ़ में  विभिन्न नदियों में जब गर्मियों के दि‍नों में जल नही रहता है तब वंहा पर आसानी से  इसकी खेती की जा सकती है। यह उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश की एक प्रमुख नदी बिस्तरों (रि‍वरबैैैड) की फसल है। एक उत्कृष्ट मिठा फल है। इसके फल में  92 % पानी,  0.2 प्रोटीन, 0.3 % खनिज एक 100 ग्राम  खाद्य शरीर में 70 % कार्बोहाइड्रेट होते हैं। चित्र - तरबूज...

Techniques for producing nutritional and beneficial fruits of lemon नीबू में ए, बी और सी विटामिनों की भरपूर मात्रा होती है। इसमें -पोटेशियम, लोहा, सोडियम, मैगनेशियम, तांबा, फास्फोरस और क्लोरीन तत्त्व तो हैं ही, प्रोटीन, वसा और कार्बोज भी पर्याप्त मात्रा में हैं।विटामिन सी से भरपूर नीबू शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ एंटी आक्सीडेंट का काम भी करता है और कोलेस्ट्राल भी कम करता है।  नीबू में मौजूद विटामिन सी और पोटेशियम घुलनशील होते हैं, जिसके कारण ज्यादा मात्रा में इसका सेवन भी नुकसानदायक नहीं होता। रक्ताल्पता से पीडि़त मरीजों को भी नीबू के रस के सेवन से फायदा होता है। यही नहीं, नीबू का सेवन करने वाले लोग जुकाम से भी दूर रहते हैं।  गर्मी के मौसम में हैजे से बचने के लिए नीबू को प्याज व पुदीने के साथ मिलाकर सेवन करना चाहिए। लू से बचाव के लिए नीबू को काले नमक वाले पानी में मिलाकर पीने से दोपहर में बाहर रहने पर भी लू नहीं लगती। इसके अलावा इसमें सेलेनियम और जिंक भी होता है। गले में मछली का कांटा फंस जाए तो नीबू के रस को पीने से निकल जाता है। नींबू की खेती केे लि‍ए जलवायु कागजी निम्बू की खेती के लिए उष्ण कटिबंधीय और नमीयुक्त गर्मी का मौसम उपयुक्त है। पाला और जोड़ की हवा से मुक्त वाले क्षेत्रों को अच्छा माना जाता...

Cultivation of guava    अमरूद भारत का एक लोकप्रिय फल है। क्षेत्रफल एवं उत्पादन की दृष्टि से देश में उगाये जाने वाले फलों में अमरूद का चैथा स्थान है। इसकी बहुउपयोगिता एवं पौष्टिकता को ध्यान मे रखते हुये लोग इसे गरीबों का सेब कहते हैं। यह स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक फल है। इसमें विटामिन सी अधिक मात्रा में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त विटामिन ए तथा बी भी पाये जाते हैं। इसमें लोहा, चूना तथा फास्फोरस अच्छी मात्रा में होते हैं। अमरूद की जेली तथा बर्फी (चीज) बनायी जाती है। इसे डिब्बों में बंद करके सुरक्षित भी रखा जा सकता है। अमरूद के लिए जलवायु अमरूद के लिए गर्म तथा शुष्क जलवायु सबसे अधिक उपयुक्त है। यह गर्मी तथा पाला दोनों सहन कर सकता है। केवल छोटे पौधे ही पाले से प्रभावित होते हैं।  अमरूद की खेती के लिये 15 से 300 सेंटीग्रेड तापमान अनुकूल होता है। यह सूखे को भी भली-भाँति सहन कर लेता है। तापमान के अधिक उतार चढ़ाव, गर्म हवा, कम वर्षा, जलक्रान्ति का फलोत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव कम पड़ता है। अमरूद के लिए मिट्टी अमरूद को लगभग प्रत्येक प्रकार की मृदा में उगाया जा सकता है, परन्तु अच्छे उत्पादन के लिये उपजाऊ बलुई दुमट भूमि अच्छी पाई गई है। इसके उत्पादन हेतु 6 से 7.5 पी.एच. मान की मृदा उपयुक्त होती है किन्तु 7.5...