Agriculture Knowledge for Everyone

Crop Cultivation

फूलगोभी और पत्तागोभी की उत्पादन तकनीक सर्दी के मौसम में गोभी वर्गीय सब्जियों में विशेषकर फूलगोभी और पत्तागोभी का महत्वपूर्ण स्थान है। इनमे विटामिन ए, सी, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और अन्य खनिज पदार्थ पर्याप्त मात्रा में पाये जाते है। इनमे कुछ औषधीय गुण भी पाये जाते है जो कैंसर रोधी होते है। सब्जी के अलावा इनका उपयोग सूप और आचार बनाने में भी किया जाता है। गोभी वर्गीय सब्जियों के लि‍ए जलवायु: गोभी वर्गीय सब्जियों के लिए ठंडी और नम जलवायु की आवश्यकता होती है। अधिक गर्मी और शुष्क स्थिति में इन सब्जियों की गुणवत्ता खराब हो जाती है। ये अधिक ठंड को सहन कर सकती है। भूमि की तैयारी: गोभी की अच्छी पैदावार के लिए अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट भूमि उत्तम मानी जाती है। गोभी की खेती के लिए भूमि का पी एच 5.5 से 6.8 तक अच्छा माना गया है। अम्लीय भूमि में गोभी की खेती अच्छी नहीं होती है। खेत तैयार करने के लिए सबसे पहले एक गहरी जुताई कर हैरो से मिटटी को भुरभरा बना लेना चाहिए और फिर पट्टा चलाकर भूमि को समतल बना ले। उन्नत किस्मों का चुनाव: गोभी की खेती में उन्नत किस्मों का काफी महत्व है। अगेती, मध्यम और पछेती खेती के लिए अलग अलग किस्मों का लगाना चाहिए क्योंकि मौसम के अनुसार न लगाने...

पि‍पली: तेल खजूर के बडे बागानों के लि‍ए आर्दश अंत:फसल   Java long pepper (Piper chaba Hunter syn. Piper retrofractum Vahl.) is one among Panchakola group of spices. Its fruits and roots are used in preparation of ayurvedic medicines for treating indigestion, abdominal colic, poisoning, haemorrhoids, anorexia etc. It is native of South and South East Asia and commonly seen in Assam, Tripura and West Bengal in India. Because of medicinal and aromatic properties, its commercial production is picking up as an inter crop in coconut, areca nut and oil palm gardens in South India. It is perennial with climbing growth habit and performing satisfactorily even under dense shade (75%) of oil palm. Cultivation of long pepper in grown up oil palm gardens is slowly picking up and its area is about 3000 acres in Andhra Pradesh and Telangana states. पि‍पली के फल Botany Java long pepper Java long pepper belongs to family Piperaceae. It is short knarled perennial in nature, glabbrous, fleshy climber with adhesive roots. Leaves are stalked, alternate, lanceolate on the vine and chordate on runners. Inflorescence is pedunculate flower spike that comes from main stem node opposite to leaf. It flowers and bears fruits round the year. The fruit is drupe which is light green in colour when it is matured, red when ripened...

अश्वगंधा उगायें और अधि‍क लाभ पाऐं भारत में अश्वगंधा अथवा असगंध जिसका वानस्पतिक नाम वीथानीयां सोमनीफेरा है, यह एक महत्वपूर्ण औषधीय फसल के साथ-साथ नकदी फसल भी है। अश्वगंधा आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में प्रयोग किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण पौधा है। सभी ग्रथों में अश्वगंधा के महत्ता के वर्णन को दर्शाया गया है। इसकी ताजा पत्तियों तथा जड़ों में घोंड़े की मूत्र की गंध आने के कारण ही इसका नाम अश्वगंधा पड़ा। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में अश्वगंधा की माँग इसके अधिक गुणकारी होने के कारण बढ़ती जा रही है। अश्वगंधा एक औषधि है। इसे बलवर्धक, स्फूर्तिदायक, स्मरणशक्ति वर्धक, तनाव रोधी, कैंसररोधी माना जाता है। इसकी जड़, पत्ती, फल और बीज औषधि के रूप में उपयोग किया जाता है। यह पौधा ठंडे प्रदेशो को छोड़कर अन्य सभी भागों में पाया जाता है।  संस्कृत नाम: अष्वगंधा (Ashwagandha), हिन्दी नाम :  असगंध (Asgandh), अंग्रेजी : विन्टरचेरी (Winter Cherry), इंडियन गिनसेंग (Indian ginseng)  अश्‍वगंधा उगाने के लि‍ए उपयुक्त जलवायु यह पछेती खरीफ फसल है। यह उष्णकटिबंधी और समशीतोष्ण जलवायु की फसल है। अशवगंधा को शुष्क मौसम की आवश्यकता होती है। बारिश के महीने के अंतिम दिनों में इसे बोया जाता है। फसल के विकास के लिए शुष्क मौसम अच्छा रहताहै। जिन स्थान में वर्षा 660-750 मिमी की होती है वे स्थान फसल के विकास के लिए उपयुक्त होते है।  वार्षिक वर्षा...

Modern cultivation techniques of iron rich Spinach   पत्तियों वाली सब्जियों में पालक भी एक महत्वपूर्ण सब्जी है जिसकी खेती सम्पूर्ण भारतवर्ष में की जाती है। पालक एक आयरन से भरपूर, खनिज पदार्थ युक्त एवं विटामिन्स युक्त फसल है । पालक (Palak) हरी सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है। 100-125 ग्राम पालक रोज दैनिक जीवन के लिये संतुलित आहार के रूप में खाने की सिफारिश की जाती है। शरीर के हीमोग्लोबिन यानी खून के प्रति चौकन्ने लोगों के लिए पालक से उम्दा कोई दूसरी सब्जी नहीं होती। यह एक ऐसी फसल है, जो कम समय और कम लागत में अच्छा मुनाफा देती है। पालक की 1 बार बोआई करने के बाद उस की 5-6 बार कटाई की जाती है। पालक की फसल पूरे साल ली जाती है। इसके लिए अलग अलग महीनों में इस की बोआई करनी पड़ती है। किसान पालक की व्यवसायिक खेती से अच्छा लाभ कमाया सकता है| इसके लिए उसको आधुनिक तकनीकी से खेती करनी होगी| पालक के लाभदायक गुण पालक हरी पत्तेदार सब्जी होती है। पालक में कई ऐसे गुण पाये जाते हैं जो हमारे शरीर और दिमाग की मजबूती के लिए जरुरी है। पालक के सेवन से पोषक तत्वों की प्राप्ति होती है। पालक प्रोटीन, कैलोरीज, खनिज तथा विटामिन्स का एक मुख्य साधन है जो कि दैनिक जीवन के लिए अति...

अजोला की खेती और इसका देशी दुधाारु जानवरो के चारे के रुप मे ऊपयोग  अब तक अजोला का इस्तेमाल मुख्यत: धान में हरी खाद के रूप में किया जाता था, लेकिन अब इसमें छोटे किसानों हेतु पशुपालन के लिए चारे हेतु बढती मांग को पुरा करने की जबरदस्त क्षमता हैं।  अजोला खेती की प्रक्रिया किसी छायादार स्थान पर पशुओं की संख्या के अनुसार किसान 1.5 मीटर चौडी, लम्बाई आवश्यकतानुसार (3 मीटर) और 0.30 मीटर गहरी क्यारी बनाये। क्यारी को खोदकर या ईंट लगाकर भी बनाया जा सकता हैं। क्यारी में आवश्यकतानुसार सिलपुटिन शीट को बीछाकर ऊपर के किनारों पर मिट्टी का लेप कर व्यवस्थित कर दें। सिलपुटिन शीट को बिछाने की जगह पशुपालक पक्का निर्माण कर क्यारी तैयार कर सकते है। 100-120 किलोग्राम साफ उपजाऊ मिट्टी की 3 इंच मोटी मिट्टी की परत क्यारी में बना देवें। नोट- आज कल बाजार में कृत्रिम अजोला टब भी उपलब्ध हैं, किसान चाहे तो उसे खरीद सकते हैं। अब इसमें 5-10 सेमी तक जलस्तर आ जाये इतना पानी क्यारी में भरते हैं। 5-7 किलो गोबर (2-3 दिन पुराना) 10-15 लीटर पानी में घोल बनाकर मिट्टी पर फैला दे, यदि जानवर गोबर की घोल वाले अजोला को नहीं खाते हैं, तो इसके लिए रासायनिक खाद भी तैयार करके डाला जाता हैं, जैसे- एसएसी- 5 किलो मैग्नीशियम सल्फेट- 750 ग्राम पोटाश- 250 ग्राम इनका मिश्रण तैयार करके,...

Improved cultivation of Soybean: Boon for Farmers सोयाबीन खरीफ मौसम की एक प्रमुख फसल है। यह दलहन के बजाय तिलहन की फसल मानी जाती है। क्यूकि तेल के रूप से इसका आर्थिक उद्देश्य सबसे ज्यादा है | सोयाबीन मानव पोषण एवं स्वास्थ्य के लिए एक बहुउपयोगी खाद्य पदार्थ है। सोयाबीन एक महत्वपूर्ण खाद्य स्रोत है। इसके मुख्य घटक प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा होते है। सोयाबीन में 44 प्रतिशत प्रोटीन, 22 प्रतिशत वसा, 21 प्रतिशत कार्बोहाइडेंट, 12 प्रतिशत नमी तथा 5 प्रतिशत भस्म होती है। सोयाबीन की पौष्टिक गुडवत्ता   प्रतिशत प्रोटीन 44 वसा 22 कार्बोहाइडेंट 21 तेल 16-18 भस्म 5 छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से सोयाबीन राजनांदगांव, दुर्ग, महासमुंद, बेमेतरा, धमतरी, और कबीरधाम में उगाये जाते है. इस क्षेत्र में फसल पद्धति के रूप में या मुख्य फसल के रूप में भी उगाये जाते है किसान इस उन्नत तकनीक का उपयोग कर अपनी फसल की उत्पादकता बढ़ा सकते है और अपनी वार्षिक आय में वृद्धि कर सकते है जिसका वर्णन नीचे दिया गया है     Soybean crop in field सोयाबीन की खेती के लि‍ए भूमि का चुनाव एवं तैयारी सोयाबीन की खेती अधिक हल्‍की रेतीली व हल्‍की भूमि को छोड्कर सभी प्रकार की भूमि में सफलतापूर्वक की जा सकती है परन्‍तु पानी के निकास वाली चिकनी दोमट भूमि सोयाबीन के लिए अधिक उपयुक्‍त होती है। जहां भी खेत में पानी रूकता हो वहां सोयाबीन ना लें। ग्रीष्‍म कालीन जुताई 3 वर्ष में...

Intensive gardening of pomegranate अनार बहुत ही पौष्टिक एवं गुणकारी फल है। अनार स्वास्थ्यवर्द्धक तथा विटामिन ए, सी, ई, फोलिक एसिड, एंटी आक्सीडेंट व कई औषधियों गुणों से भरपूर होता है, साथ ही सेहत के लिए भी बहुत लाभदायक होता है। अनार का रस स्वाद से भरा होता है। अनार में कई महत्वपूर्ण पाचक एन्जाइम व तत्व मौजूद रहते है। यह स्वास्थवर्धक तथा लोक प्रिय है। इसके ताजे फलों को सेवन करने से लम्बी कब्जियत की बिमारी भी दूर की जा सकती है। इसलिए बाजार में अनार की मांग लगातार बढ़ रही है। अनार की फसल किसानों को कम समय में अधिक लाभ कमाने का अवसर देती है। इसकी खेती व्यवसायक रूप में की जाती है। इसे एक बार लगा देने के बाद 15 से 20 वर्ष तक फसल ली जा सकती है। अन्य फल वृक्षों की तरह अनार में भी सघन बागवानी की अच्छी संभावनाएँ हैं। अनार की सघन बागवानी (हाई डैनिसिटी आर्चडिंग/ एच. डी. पी.) उच्च उत्पादकता के साथ उच्च गुणवत्तायुक्त अनार उत्पादन की पद्धति है, जिसमें अनार को परम्परागत दूरी से कम दूरी पर लगाये जाते हैं। आम तौर पर देखें तो अनार के सामान्य बागवानी में पौधो को अधिक दूरी 5 से 6 मी पर लगाये जाते हैं, जबकि सघन बागवानी में परम्परागत दूरी  के मुकाबले कम दूरी पर पौधे लगाये...

Scientific cultivation technique of Rye, Toria and Mustard crop बिहार में रबी मौसम में उगायी जाने वाली तेलहनी फसलों में राई, तोरीया एवं सरसों का प्रमूख स्थान है। इनका उपयोग खाद्य तेल एवं जानवरोंहेतु खल्ली के रूप में किया जाता है। अधिक एवं गुणवत्तायुक्त उपज प्राप्त करने हेतु यह आवश्यक है कि इसकी खेती वैज्ञानिक ढ़ंग से की जाए जिससे अधिक से अधिक मुनाफा प्राप्त किया जा सकें। राई-तोरी, सरसों के उन्नत प्रभेद एवं खेती की विधि: राई में प्रभेद (समय से बुआई हेतु उपयुक्त) - वरूणा:  औसत उपज 20 क्वि/हे0 होता है। इस फसल की अवधि 135 से 140 दिन में तैयार हो जाता है। पूसा बोल्ड: इसकी औसत उपज 19 क्वि0/हे0 है। इस फसल की अवधि 120 से 145 दिन होता है। क्रान्ति: इसकी औसत उपज 21 क्वि0/हे0 है। इस फसल की अवधि 125 से 130 दिन में तैयार हो जाता है। राजेन्द्र राई पछेती: औसत उपज 14 क्विटल प्रति हे0 है इस फसल का अवधि 105 से 115 दिन है। राजेन्द्र सुफलाभ : इसकी औसत उपज 16 क्विंटल प्रति हे0 है इस फसल की अवधि 107 से 116 दिन है। तोरी के प्रभेद: आर0 ए0 यु0टी0एस0 17:  इसकी औसत उपज 12 क्विंटल प्रति हे0 है । फसल अवधि 80-90 दिन दिन है। पंचाली: औसत उपज 11 क्ंिवटल प्रति हे0, फसल अवधि 90 से 105 दिन है। पी0टी0-303: औसत उपज...