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Crop Cultivation

Miraculous Dragon fruit cultivation in India Dragon fruit is a miracle fruit recently introduced in the Indian market. It is gaining tremendous popularity among the growers due to its attractive fruit color and mouth-watering pulp with edible black seeds contained inside the pulp, nutraceutical value, excellent export potential and highly beneficial nature as stem cuttings. Produces yield 14-16 months after planting. The crop yields up to 20 years with a long crop cycle in separate flushes each year from May–December. Miraculous Dragon fruit cultivation in India ड्रैगन फल या नाइट ब्लूमिंग सेरेस (Hylocereus undatus) कैक्टैसी परिवार की एक प्रजाति है और जीनस में सबसे अधिक खेती की जाने वाली प्रजाति है। इसका उपयोग सजावटी पर्वतारोही और फलों की फसल के रूप में किया जाता है। यह एक तेजी से बढ़ने वाला पौधा है जिसे बढ़ने के लिए एक ऊर्ध्वाधर पोल समर्थन की आवश्यकता होती है और फिर एक छतरी की तरह गिरने के लिए एक अंगूठी की आवश्यकता होती है। ड्रैगन फ्रूट हाल ही में भारतीय बाजार में पेश किया गया चमत्कारी फल है। यह अपने आकर्षक फलों के रंग और गूदे के अंदर निहित खाद्य काले बीज के साथ मुंह में पानी लाने वाले गूदे, न्यूट्रास्युटिकल मूल्य, उत्कृष्ट निर्यात क्षमता और प्रकृति में अत्यधिक लाभकारी प्रकृति के कारण उत्पादकों के बीच जबरदस्त लोकप्रियता...

Advanced techniques of groundnut standing crop management Groundnut is an important crop among oilseed crops. Semi-tropical climate is considered more suitable for its cultivation. To get good yield of this crop, 25-30 centigrade temperature and 500 to 1000 mm rain is required. Rain is good. Groundnut crop is such a crop that despite being a total leguminity, it holds its own special identity as an oilseed crop, because 45-50 percent oil and 22-28 percent protein are found in its grains. Advanced techniques of groundnut standing crop management तिलहनी फसलों में मूंगफली भी एक प्रमुख फसल है। इसकी खेती हेतु अर्ध-उष्ण जलवायु अधिक उपयुक्त मानी गई है। इस फसल की अच्छी उपज प्राप्त करने लिए 25-30 सेंन्टीग्रेट तापमान और 500 से 1000 मि.मी. वर्षा उत्तम होती है। मूंगफली फसल एक ऐसी फसल है जिसका कुल लेग्युमिनेसी होते हुये भी यह तिलहनी फसल के रूप में अपनी विशेष पहचान रखती है, क्योकि इसके दानों में 45-50 प्रतिशत तेल और 22-28 प्रतिशत  प्रोटीन पाया जाता है। मूंगफली वायुमण्डलीय नत्रजन का मृदा में स्थरीकरण कर भूमी की उर्वरा शक्ति बढाती है। किसान भाईयों द्वारा मूंगफली की खङी फसल प्रबधंन की उन्नत तकनीके अपनाकर अच्छा लाभ प्राप्त किया जा सकता है।  पोषक तत्व प्रबंधन मूंगफली की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए उचित मात्रा में पोषक तत्वों को समय पर देना...

भारत में ड्रैगन फ्रूट की खेती में बाधाएँ Dragon fruit is a fast-growing, perennial vine-like cactus that thrives in many tropical agro-ecologies due to its tolerance for heat, drought, poor soils, and other environmental stresses. However, it can be harmed by various environmental factors, poor cultivation methods, and management techniques. An effort is being made to enact major restrictions on dragon fruit cultivation based primarily on the opinions of scientists, experts, and specialists.  भारत में ड्रैगन फ्रूट की खेती में बाधाएँ Dragon fruit or Pitahaya (Hylocereus undatus), also called “The Wonderous Fruit” of the twenty-first century, belongs to the family Cactaceae. It is native to a region of Mexico, Guatemala, Nicaragua, Costa Rica, El Salvador, and the northern South of the United States. Its cultivation is tremendous in Southeast Asia, Florida, the Caribbean, and subtropical international locations. Even though it is commercially cultivated in other nations, India has not attained a commercial cultivation reputation. It is one of India's more recent fruit crops. Dragon fruit or Pitahaya can be grown as a decorative crop and for consumption. They're used for manufacturing jam, jelly, ice cream, juice, wine, face-packs, etc. They're packed with vitamins and minerals and are also a rich source of antioxidants. They're utilized to control cancer and diabetes, decrease cholesterol levels...

चुली ( प्रूनस आर्मेनियका ) फलदार वृक्ष का महत्व, रखरखाव एवं संरक्षण की विधियां। The height of Chuli, Jardalu or Apricot tree is about 10 m. The leaves are oval to round oval and sub-heart shaped.Flowers and new leaves mostly appear in the month of March-April. In low altitude areas, fruits are produced in the months of June-July and in high altitude areas in the months of July-August. चुली,  जिसे अंग्रेजी भाषा में ‘प्रूनस आर्मेनियका’ कहते है, पहले एमेगडैलेसी और अब रोजेसी कुल से सम्बन्ध्ति है। इसे जर्दालु, खुबानी नाम से जानते है। यह एक मध्यम आकार का बहुदुदेशीय फलदार वृक्ष है। खुबानी या चुली न केवल भारत वर्ष में अपितु विश्व के अन्य देशों में भी पाया जाता है। इस वृक्ष की उत्पति चीन के खुदूर उतर पूर्व पहाडी क्षेत्रों एवं मध्य एशिया के देशों से जुड़ी है तदुपरान्त वृक्ष अर्मिनिया से होते हुए भारत ईरान, मिस्र, और यूनान में पहुंचा। आज यह वृक्ष विश्व के अधिकतर शीतोष्ण क्षेत्रों वाले देशों में उगाया जाता है। जर्दालु या चुली व्यापार की दृष्टि से अमेरिका, स्पेन, फा्रस, तुर्की, इटली, अफ्रिका, ईरान तथा आस्टेलिया जैसे देशों में प्रमुख रूप से लगाया जाता है। चुली एक फलदार वृक्ष है और इस वृक्ष की उंचाई लगभग 10 मी., पत्ते अंडाकार से लेकर गोल अंडाकार एवं उप हदयकार होते...

छिलका रहित जौ एक उपयोगी फसल Huskless barley is a nutrient rich food grain. Consumption of this grain is very beneficial for health. Sources of high amounts of beta-glucans, proteins, starch, iron and zinc have been discovered by the ICAR-Indian Wheat and Barley Research Institute, Karnal. जौ विश्व में सदियों से उगाई जाने वाली रबी सीजन की महत्वपूर्ण अनाज फसल है। वैश्विक परिवेश में जौ की फसल उत्पादन एवं क्षेत्रफल की दृष्टि से धान, गेहूँ एवं मक्का के बाद चौथे स्थान पर है। जिसे किसी भी अन्य अनाज की तुलना में अधिक पर्यावरणीय परिस्थितियों में उत्पादित किया जा सकता है। हमारे देश में जौ की खेती मुख्यतः राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, बिहार, छत्तीसगढ़, पश्चिमी बंगाल तथा उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्रों में की जाती है। भारत में इसका उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों, खाद्य पदार्थों, पशु आहार एवं पशु चारे के रुप में सदियों से होता आ रहा है। विश्व में जौ की खेती लगभग 62 मिलियन हैक्टर क्षेत्रफल पर की जाती है, जिससे लगभग 160 मिलियन टन जौ का उत्पादन होता है। वर्ष 2022-23 के दौरान भारत में जौ की खेती लगभग 7.0 लाख हैक्टर क्षेत्रफल पर की गई जिसमें लगभग 16.68 लाख टन उत्पादन हुआ। विश्व के जौ उत्पादक प्रमुख देशों में रूस, यूक्रेन, फ्रांस, जर्मनी, आस्ट्रेलिया,...

ऊतक  संवर्धन विधि द्वारा अखरोट (जुगलन्स रेजिया) का सूक्ष्म प्रसार Walnut seedling rootstocks have a very long juvenile period, while the seeds produced remain dormant for about 120 days. Although vegetative propagation through cuttings may be an option, this method is less viable, due to low rooting efficiency. जुगलन्स रेजिया, जिसे आमतौर पर फारसी अखरोट के रूप में जाना जाता है, मध्य एशिया का एक महत्वपूर्ण अखरोट फल है। हालांकि इसकी किस्मों की उपज क्षमता अलग-अलग होती है और दुनिया भर में व्यापक रूप से वितरित की जाती है, प्रजनकों और किसानों के सामने आने वाली समस्याएं काफी समान हैं। अखरोट सीडलिंग रूटस्टॉक्स की किशोर अवधि बहुत लंबी होती है, जबकि उत्पादित बीज लगभग 120 दिनों तक निष्क्रिय रहते हैं। हालाँकि, कलमों के माध्यम से वानस्पतिक प्रसार एक विकल्प हो सकता है, लेकिन कम जड़ने की दक्षता के कारण, यह विधि कम व्यवहार्य है। इन सभी समस्याओं को स्वीकार करते हुए, यह समीक्षा पुनर्जनन और प्रसार के क्षेत्र में किए गए शोध कार्यों और प्रयोगों के विश्लेषण पर केंद्रित है क्योंकि यह विधि यौन प्रजनन और भ्रूण के अंकुरण के चरण को लाँघ जाती है। एक सफल सूक्ष्मप्रवर्धन प्रसार विधि, चरणों की एक श्रृंखला के माध्यम से आगे बढ़ती है। ये हैं (i) असेप्टिक संवर्धन की शुरुआत, (ii) प्ररोह गुणन, (iii) सूक्ष्म शाखाओं का जड़...

सीबकथॉर्न की खेती एक लाभदायक कृषि व्यवसाय Seabuckthorn (Hippophae rhamnoides) The shrub is typically 0.5–6 m tall, but can reach up to 10 m. The leaf arrangement is alternate or oppositely observed in the stalks/ branches. The leaves are sessile, separate silvery-green and 3 to 8 cm long. The width of the leaf is less than 7 mm. The branches are stiff, dense and thorny. सीबकथॉर्न (SBT; Hippophae rhamnoides) जो की इलेगनेसी फैमिली  का सदस्य है, एक पत्ते झड़ने वाला  झाड़ीदार छोटा पौधा है जो दुनिया के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में विस्तृत रूप से पाया जाता है, मुख्य रूप से मंगोलिया, चीन, तिब्बत, रूस, कनाडा, भारत, पाकिस्तान और नेपाल में। प्राचीन यूनानियों ने ध्यान दिया कि सीबकथॉर्न की पत्तियों और नए शाकह्ये जब घोड़ो को खिलाए गए तो घोड़ों की त्वचा और बाल चमकदार हुई और वजन में भी वृद्धि पाई गई । सीबकथॉर्न (Hippophae rhamnoides) झाड़ी सामान्य रूप से 0.5-6 मीटर की ऊँची होती है, पर यह 10 मीटर तक पहुंच सकती है। डंके / शाखाओं में पत्ती के व्यवस्था वैकल्पिक या विपरीत रूप से देखी जाती है। पत्तियाँ धरणीय, अलग सिल्वरी-हरा और 3 से 8 सेमी लंबी होती हैं। पत्ती की चौड़ाई 7 मिमी से कम होती है। शाखाएं कड़ी, घनी और कांटेदार होती है| इस के नर और मादा पुष्प अलग अलग...

बानयार्ड मिल्लेट - पोषण सुरक्षा की भविष्य The crop of Sanwa is capable of withstanding difficult conditions and giving high yield. Being a C4 crop, its grain and fodder yield is higher than other cereals. The duration of harvesting of sorghum is 75 to 100 days and the average yield is up to 2200 kg/ha. बानयार्ड मिल्लेट - पोषण सुरक्षा की भविष्य खाद्य सुरक्षा की परिभाषा सन 1970 के हरित क्रांति से ही विकसित होती आई है। खाद्य सुरक्षा का अर्थ शुरुवात मे हर व्यक्ति को अन्न पर्याप्त मात्र और वहनयोग मे मिलना था। परिस्थिति बदली है की खाद्य सुरक्षा अन्न पर्याप्त  मात्रा के साथ साथ  अच्छे गुणवत्ता से मिलना भी है। ऐसे अन्न देश के हर नागरिक पूरे गरिमा के साथ पाने का तरीका ढूंढ निकालना भी ज़रूरी है। भारतीय सरकार लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) के माध्यम से पौषिक खाद्यन्नों को रियायती मूल्य मे व्यापक जनसंख्या को प्रदान करती आई है। इतने महतपूर्ण कदमो के बाद भी देश में थोड़े बहुत जनसंख्या कुपोषण और मोटापा (Obesity) से पीड़ित है। भारत मे एक तिहाई बच्चों की आबादी कुपोषण और एक तिहाई महिला अनीमिया से ग्रस्त हैं। इसके उपरांत देश के 14% महिला और 18% पुरुषों की आबादी मोटापा के वश में है।  इसी के साथ साथ लोगों में डायबिटीज़ की रोग भी तीव्र गति...