Agriculture Knowledge for Everyone

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आसानी से और जल्दी से जानकारी प्राप्त करने के लिए किसानों के लिए मोबाइल सॉफ्टवेयर Farmers often struggle for basic information like weather updates, crop prices and expert advice, ending up often relying on hearsays.  A new mobile app “Kisan Suvidha” launched at march 21, 2016 by Prime Minister Narendra Modi will prove helpful for farmers in this regard but they must own a smartphone. The app is likely to have many takers as India is second largest smartphone market in the world with 87 million mobile Internet users in rural areas. Keeping its targets audience in mind, the app is designed with user-friendly interface consisting of important parameters to provide info on. The farmers can get critical and definite information on the weather forecast, dealers detail to sell to, the market price of a commodity in nearest area, information to protect plants from pest, weed and diseases, and expert advice from farm experts. Besides, farmers can directly get in touch with Kisan call centre where technical graduates answer their queries. The features "Kisan Suvidha" mobile app To begin with, a farmer has to register the mobile number, choose a language—at present limited to Hindi and English—and enter details of the state, district and block or sub-district. A tap on the weather button shows details of...

The use of plant regulators in gardening   बागवानी में हार्मोन्स (पादप नियंत्रकों) का बहुत महत्व है ! फल वृक्षों में कई बार विकास की वृद्धि दर रुकने, फल एवं फूल झड़ने एवं वृद्धि कम होने की समस्या आ जाती है ! ऐसी स्थिति में कृत्रिम हार्मोन्स का उपयोग लाभकारी सिद्ध होता है ! पादप नियंत्रक पौषक तत्व न होकर कार्बनिक रसायन होते हैं जिनकी थोड़ी सी मात्रा ही पौधों की क्रियात्मक वृद्धि के लिए जिम्मेदार होती है ! हार्मोन्स का उपयोग जड़ों को विकसित करने, कलिकाओं की निष्क्रियता खत्म करने, वृद्धि जनकवृद्धि अवरोधक, पुष्पांकन का नियमितिकरण एवं नियंत्रण, बीजरहित फल प्राप्त करने, फूलों एवं फलों को झड़ने से रोकने, नर-मादा अनुपात नियंत्रण करने तथा फलों को पकाने आदि में सहायक होता है ! बागवानी में हार्मोन्स (पादप नियंत्रकों) का उपयोग आम में मेलफॉरमेषन (गुच्छा विकार) की समस्या को रोकने के लिए नेफ्थलीन एसिटिक एसिड (एन.ए.ए.) को 200 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से इस समस्या की रोकथाम की जा सकती है ! निम्बुवर्गीय वृक्षों में फल गिरने की समस्या रहती है ! इसे रोकने के लिए 2,4-डी 10 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए ! नागपूरी संतरे में परिपक्व फलों को गिरने से बचाने के लिए प्रति लीटर पानी में 200 मिलीग्राम नेफ्थलीन एसिटिक एसिड (एन.ए.ए.) का छिड़काव करना...

Transgenic Crops: Study in context of Pulses दलहनी फसलें अति विशिष्ट होती हैं क्योंकि इनकी जड़ों में पाए जाने वाली ग्रंथिकाओं में वायुमंडलीय नत्रजन के स्थिरीकरण द्वारा मृदा उर्वरता को अक्षुण रखने की विलक्षण क्षमता होती है। दालों का मानव पोषण में, विशेषतौर पर विकासशील देशों में एक महत्वपूर्ण स्थान है। भारत में शाकाहारी जनसंख्या के आहार में प्रोटीन का मुख्य स्त्रोत दालें हैं। प्रोटीन के अतिरिक्त इनमें खनिज लवण तथा विटामिन्स भी पाये जाते हैं।  भारत दालों का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता तथा आयाताक देश है। भारत में दलहनी फसलों के अन्तर्गत  वर्ष 2013-14 में कुल क्षेत्रफल 25.23 मिलियन हेक्टेयर तथा उत्पादकता 19.27 मिलियन टन थी। भारत कुल वैश्विक उत्पादन के 20 प्रतिशत तथा कुल क्षेत्रफल के एक तिहाई  से अधिक क्षेत्र में हिस्सेदारी रखता है। चना, अरहर, मूँग, उर्द , राजमा तथा मटर, भारत की प्रमुख दलहनी फसलें हैं। जैविक और अजैविक कारक चना और अरहर के उत्पादन को कम कर देते हैं। जैविक घटकों में कीट फसल उत्पादन को हानि पहुँचाने वाले प्रमुख कारक हैं। 200 से अधिक हानिकारक कीट जो कि 8 वंशों तथा 61 कुलों से सम्बन्धित है, अरहर की फसल को विभिन्न अवस्थाओं में हानि पहुँचातें हैं। फली भेदक, हेलिकोवर्पा आर्मीजेरा (लेपिडोप्टेरा: नॉक्ट्यूडी) तथा फली मक्खी, मिलेनोग्रोमाइजा आब्ट्यूसा (डिप्टेरा: एग्रोमाइजिडी) आदि‍ भारत में अरहर के कीटों के रूप में...

पोर थ्रू निष्कर्षण विधि का उपयोग कर फूलों की फसलों की पीएच और ईसी की माप Providing a proper nutritional program is essential for growing top quality plants. Sampling the root substrate for pH and electrical conductivity (EC) with the PourThru extraction method is a quick and simple. The pour-through method has been shown to be as satisfactory as other more expensive and time consuming methods of measuring EC. Unlike sampling methods that require removal of medium from containers, the pour-through method does not disturb plant roots. The values provide clues about a crop’s performance before deficiency or toxicity symptoms appear. As nurseries implement more environmentally and economically sound growing regimes, the pour-through method should become more widely used by foliage growers for self-determination of EC levels periodically during the crop production cycle. Since many foliage plants can be grown satisfactorily with a wide range of fertilizer rates. The best fertilization rate, from an environmental and economic standpoint, cannot always be determined by visual inspection. Even though excess fertilizer may not harm some plants, excess nitrogen (N) and phosphorous (P) elements can be lost through leaching and eventually contaminate groundwater. Growing regimes designed to have minimum detrimental impact on the natural environment should include only enough fertilizer for good plant growth, combined with irrigation practices that...

Modern agricultural techniques for higher production and income. भारत में खाद्य समृद्धि के बाबजूद, जनसंख्या वद्धि के कारण देश मे खाद्यान्‍न की कमी लगातार बनी हुई है इसलिए कृषि से जुड़े लोगो का अधिक उपज और समृद्ध खेती की तरफ रुझान आवश्‍सक है ।समृद्ध खेती भूमि की अवस्था, उपलब्ध उपकरण और खेत में पिछले वर्ष लगी फसल पर निर्भर करती है। खेती को लाभदायक बनाने के लिए दो ही उपाय हैं - पहला उत्पादन को बढ़ाएँ और दूसरा लागत को कम करें। कृषि की लागत नियत्रिंत करने के लिए कृषि के मुख्य आदान जैसे - बीज, उर्वरक, पोध संरक्षण रसायन और सिंचाई तंत्र का संतुलित एवं आधुनिक विधियो द्वारा प्रयोग करना चाहिए। कृषि की हरेक इकाई का सही समय पर सही तरह से उपयोग करके , इनका अपव्यय रोककर व इसके विकल्प ढुन्ड़कर खेती को लाभदायक बनाना चाहिए । निम्नलिखित सुझावो से किसानो को बेहतर एवं किफायती कृषि करने के साथ-साथ अधकि उपज लेने में मदद मिल सकती हैं । अच्छे किस्म के बीजो  का प्रयोग, बीजोपचार एवं समय पर बुआई कहते है जैसा आप बोओगे वैसा पाओगे इसलिए बीज एक ऐसा आदान है जिसकी  समृद्ध खेती में काफी अहम भूमिका होती है । बीज  के ऊपर लगभग 10 से 15 प्रतिशत लागत आती है और अच्छी पैदावार लाने के लिए यह महत्वर्पूण है की बीज उन्नत...

Use of plastic mulch in agriculture कई वर्षो से विभिन्न नई विकसित तकनीको, कृषि क्रियाओं, एवं संसाधनों का उपयोग कर रहा है। देश के कई क्षेत्रों में विषम जलवायु, जल स्त्रोतो की कमी तथा विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं जैसे- पाला, ओला आदि के बावजूद खेती का महत्व बढ़ रहा है। किसान पिछले कई सालो से मृदा में नमी संरक्षण के लिए विभिन्न उपाय जैसे- सुखी पत्ती, फसलों के अवशेष, सुखी राख आदि को प्रयोग में ला रहा है। खरपतवार की वृध्दि को रोकने एवं मृदा तापमान को संयम बनाये रखने में यह विभिन्न तरह के पलवार (मल्च) मृदा में सूक्ष्म जलवायु का निर्माण करते हैं। इस प्रकार पलवार (मल्चींग) संयुक्त रूप से पौधों के आस-पास के सतह को ढकने की प्रक्रिया है जो पौधे व उसके जड़ को तापमान के उतार चढाव व खरपतवार से बचाने में प्रभावकारी होता है। वर्तमान समय में कार्बनिक पलवार की बड़ी मात्रा में आसानी से उपलब्धता नहीं होने तथा ज्यादा लागत की वजह से, प्लास्टिक पलवार, का उपयोग एक अच्छा वि‍कल्प है। यह आसानी से उपलब्ध है एवं एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में आसान व बिछाने में भी आसान होती है। इन्ही सभी गुणों के कारण आज प्लास्टिक फिल्म पलवार का अधिकतर उपयोग हो रहा है। प्लास्टिक पलवार के लाभ: मृदा में नमी संरक्षण एवं तापमान नियंत्रण...

Precautions in using agricultural chemicals आधुनिक एवं वैज्ञानिक खेती के युग में अधिक पैदावार लेने के लिए फसल सुरक्षा अति आवश्‍यक है। कीटनाशी (Insecticide), फफूंदनाशी (Fungicides) एवं अन्य कृषि रसायन जो फसल सुरक्षा में प्रयोग होते हैं, प्राय: बहुत जहरीले व हानिकारक होते हैं। इन रसायनों का प्रयोग करते समय सावधानी रखना भी उतना ही आवष्यक हैं, जितना कि इनसे फसल सुरक्षा व अधिक पैदावार एवं अच्छी गुणवत्ताा वाली फसल लेकर अधिक लाभ उठाना। फसलों की पैदावार में कमी होने के कई कारणो में से कीट व बिमारियाँ मुख्य भूमिका निभाते है। अधिक उत्पादन लेने हेतु बुआई से पूर्व बीजोपचार तथा बुवाई के उपरान्त कीट नियन्त्रण एवं समय-समय पर बीमारियों से बचाव हेतु विभिन्न रासायनिक दवाओं का प्रयोग किया जाता है। जिनमें से अधिकांश रसायन अति विषाक्त होते है। जितनी आवश्‍यकता इनके प्रयोग करने की हैं उससे कहीं अधिक आवष्यकता इनके प्रयोग में सावधानी रखने की है। जैवनाशकों (antibiotic) को निर्धारित मात्रा से अधिक या गलत तरीके से या  असावधानी से प्रयोग करने पर कई हानिकारक परिणाम हो सकते हैं। जैवनाशक रसायन न केवल मनुष्यों बल्कि पशुओं पक्षियों इत्यादि के लिए भी अति हानिकारक होते है। इन जैवनाशक रसायनों के प्रयोग सें किसी भी प्रकार की दुर्घटना या हानि से बचने के लिए या इनका पर्यावरण पर कोई बुरा असर ना पड़ें इसलिए कुछ बातों का...

Parthenium histrofors: A Destructive Weed अवांछित पौधे जो बिना बोये ही उग जाते हैं और लाभ की तुलना में ज्यादा हानिकारक होते हैं, खरपतवार कहलाते हैं | खरपतवार प्राचीन काल से ही मनुष्य के लिये समस्या बने हुये हैं, खेतों में उगने पर यह फसल की पैदावार व गुणवता पर विपरीत असर डालते हैं | मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी यह बहुत बुरा असर डालते हैं और कई खरपतवारों की वजह से (जैसे गाजर घास) मनुष्य को कई घातक बिमारियों का सामना करना पड़ता हैं | गाजर घास बहुत ही खतरनाक खरपतवार हैं | इसका वैज्ञानिक नाम पारथेनियम हिस्ट्रोफोरस है, इसको कई अन्य नामों से भी जाना जाता हैं जैसे काग्रेंस घास, सफेद टोपी, छंतक चांदनी आदि | यह खरपतवार एस्टेरेसी (कम्पोजिटी) कुल का पौधा हैं | भारत में सर्वप्रथम यह घास 1955 में पूना (महाराष्ट्र) में देखी गई थी | माना जाता है कि हमारे देश में इसका प्रवेश 1955 में अमेरिका व कनाडा से आयातित गेहुँ के साथ हुआ | आज ये घातक खरपतवार पूरे भारत वर्ष में लाखों हैक्टेयर भूमि पर फैल चुका हैं | यह घास मुख्यत: खुले स्थानों, औध्योगिक क्षैत्रों, सड़कों के किनारे, नहरों के किनारे व जंगलों में बहुतायात में पाया जाता हैं | अब इसने अपने पाँव खेत खलियानों में भी पसारना शुरू कर दिया हैं | विश्व...