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प्रेस विज्ञप्ति क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड ने उत्पादकता सुधारने के लिए  सात उत्पाद लॉन्च किए किसानों के लिए उपहारों की टोकरी में कीटनाशी, फफूंदीनाशक, खरपतवारनाशी शामिल हैं इन उत्पादों का उद्देश्य फसल की सुरक्षा एवं उत्पादकता में सुधार करना है, जो किसानों के लिए वरदान साबित होगा ____________________________________________________________________ लखनऊ, जुलाई 4, 2018:  फसल सुरक्षा क्षेत्र की सुस्थापित कंपनी, क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड ("क्रिस्टल"), जो कीटनाशी, फफूंदीनाशक, खरपतवारनाशक, पौधे की वृद्धि के नियामकों एवं जैव पोषक तत्वों की अपनी श्रृंखला के लिए मशहूर है, ने आज किसानों के लिए उपहारों की एक टोकरी को बाजार में उतारने की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य भारतीय किसानों के लिए उत्पादकता में सुधार करना है। किसानों की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, क्रिस्टल ने अनुसंधान एवं विकास के जरिए इन उत्पादों को विकसित किया है ताकि किसानों को लाभप्रदता में सुधार करने में सक्षम बनाया जा सके। निम्नलिखित उत्पादों को बाजार में उतारने की घोषणा की गई – फफूंदीनाशक – फफूंदीनाशक एक तेजी से विकसित होने वाला क्षेत्र है, जिसमें क्रिस्टल के ये नए उत्पाद रोगों को नियंत्रित करने में सक्षम हैं: एज़ोट्रिक्स, धान की फसल में ब्लास्ट रोग को नियंत्रित करने के लिए एक पेटेंट प्राप्त फफूंदीनाशक प्लूटोन, टमाटर के लिए एक पेटेंट प्राप्त फफूंदीनाशक खरपतवारनाशक – खेती में श्रमिकों की बढ़ती कमी को देखते हुए खरपतवारनाशक का महत्व बढ़ गया है। क्रिस्टल...

Impact of changing environment on agriculture भारत में खेती का बडा भाग मौसमी बरसात पर ही निर्भर हैं। बदलते मौसम के कारण खेती को नुकसान हो रहा है। देश में फसल उत्पादन में उतार-चढ़ाव का कारण बहुत कम या अत्यधिक वर्षा, अत्यधिक नमी, असामान्‍य तापमान, रोग व कीट प्रकोप, बेमौसम बारिश, बाढ़ व सूखा और ओलेे आदि मुख्य हैं। पिछले कुछ सालों से मौसम चक्र ने हमें चौंकाने का जो सिलसिला शुरू किया है जैसे की अतिवृष्टि और अनावृष्टि, ये तो हमारे लिए और खेती के लिए मुसीबत बन गया हैं। पिछले वर्ष की अपर्याप्त मानसूनी बारिश से जो दुष्प्रभाव पैदा हुये है, वे बीते दिनों में और बढ़ गये हैं। जलवायु परिवर्तन जैसे तापमान में वृद्धि के परिणामस्वरूप आने वाले बाढ़ व सूखा आदि से खेती का नुकसान और बढ़ेगा। किसान को जहां खरीफ फसल की बुवाई के दौरान सूखे ने परेशानी में डाला था वहीं, इस बेमौसम बरसात से रबी की फसल में उन्हें बुरी तरह तबाह कर दिया। अध्ययनों के आधार पर कृषि वैज्ञानिको ने पाया की प्रत्येक 1º सेल्सियस तापमान बढ़ने पर गेहू का उत्पादन 4-5 करोड़ टन कम हो जाएगा। इसी प्रकार 2º सेल्सियस तापमान बढ़ने से धन का उत्पादन 0.75 टन प्रति हेक्टेयर कम हो जाएगा। कृषि विभाग के अनुसार गेहू की पैदावार का अनुमान 82 मिलियन टन रह जाएगा।...

Gramophone Mobile App: Farmers' Companions and Consultants अभी तक हमारे देश के किसान आसमान का रंग और पक्षियों का व्यवहार देखकर बोवनी का समय भांपते थे और खेती संबंधी अन्य कार्य करते थे। मौसम की सही जानकारी उनके पास नहीं होने से बारिश का इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं होता था। उन्हें न तो खेती की आधुनिक जानकारी देने का कोई इंतजाम था और न कीट-पतंगों से बचाव का! लेकिन, अब नई टेक्नोलॉजी के साथ-साथ किसानों को फसल संबंधी सारी जानकारी देने के लिए एक ऐसा मोबाइल एप ग्रामोफोन आया है जो किसानों की हर समस्या को उनके एक क्लिक से हल कर देता है। उनकी अपनी भाषा हिंदी वाला ये मोबाइल एप किसानों को उनकी हर समस्या का आसान हल सुझाता है। एक खास बात ये भी कि इस एप से जुड़े टोल फ्री नंबर (1800 123 6566) पर मिस कॉल करके किसान अपनी खेती से जुडी किसी भी जिज्ञासाओं का विशेषज्ञों के जरिए समाधान पा सकते हैं।  ग्रामोफोन ऐसा मोबाइल एप है जो किसानों को बेहतर पैदावार प्राप्त करने के लिए समय पर सही और सटीक सूचना देता है। क्योंकि, किसानों को जितनी त्वरित और सही जानकारी और सलाह मिलेगी, वे उतनी ही तत्परता से खेती से संबंधित आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करेंगे। इसलिए कि कोई भी टेक्नोलॉजी...

Reaper binder: suitable machine for wheat harvesting रबी की सबसे महत्‍वपूर्ण फसलों में से गेंहॅू  एक है । वर्ष 2016-17 में देश में कुल 31 मिलियन हेक्‍टेयर क्षेत्रफल में गेंहॅू बोया गया तथा 98 मिलियन टन गेंहॅू का उत्‍पादन हुआ और गेंहॅू की औसत उपज 3161 कुन्‍तल/हेक्‍टेयर रही । गेंहॅू  की फसल तैयार होते-होते मौसम बदल जाता है और तेज हवाओं एवं बारिश की शंका बनी रहती है । ऐसे में किसान की चिंता होती है कि पकी फसल को काटकर जल्‍द से जल्‍द घर में लाया जाए । गेंहॅू को काटकर काटते समय ही मढ़ाई करके लाने के लिए कम्‍बाइंड हारबेस्‍टर का उपयोग बढ़ता जा रहा है । इस समय कम्‍बाइंड हारबेस्‍टर का प्रयोग रबी फसल की कटाई में खूब हो रहा है । थ्रेसिंग से निकले भूसे को खेत में छोड़ देती है । जिसकी मात्रा करीब 4 से 5 टन / हेक्‍टेयर होती है । साथ ही कम्‍बाइंड हारबेस्‍टर करीब 30 सेमी ऊपर से फसल को काटता है और कटाई के बाद फसल का ठॅूठ खेत में खड़ा रह जाता है । इससे बड़ा नुकसान होता हैं । एक तो फसल से मिलने वाले अवशेष अर्थात भूसे का नुकसान होता है जो जानवरों के खाने में प्रयोग होता है जो कि‍मती भी है और जिसकी बहुत कमी रहती है और दुसरा, ...

उत्तक संवर्धित केला - बढ़ाये कृषक की आय Bananas are the fruits which now considered as world's 4th dietary staple after rice, wheat and corn. A number of people consume them in one way or the other. Banana (Musa spp.) comes under Musaceae family which have several species cultivated all round the world ( Musa acuminata, Musa balbisiana and Musa × paradisiaca for the hybrid Musa acuminata × M. balbisiana). It is world's largest herb and it is not a tree. The fruit type of banana is berry. A typical banana plant has 8 to 30 torpedo-shaped leaves that are up to 12 feet long and 2 feet wide. It is loaded with a number of vitamins and minerals viz.,  vitamin A, B, C and G. It also contains alkali-forming minerals, potassium, natural sugars, protein and some fat. Bananas contain potassium-40, a radioactive isotope. They are easy to digest and provide quick energy and provide potassium lost during exercise. They are the first choice of many professional athletes when they are competing. Banana is an edible fruit which is majorly grown in sub-tropical and warm climatic conditions. It is majorly grown in subtropical areas. They are grown in over 100 countries. India ranks number 1 in the world’s highest Banana producing country. Ecuador is the world's largest exporter of banana. The best soil type for...

Justified use and precautions of pesticide chemicals किटनाशको का स्वभाव जहरीला होने के कारण उनके उपयोग के दौरान किसानो, खेत में काम करने वाले मजदूरो एवं जनवरो के स्वास्थ पर बुरा असर होने का खतरा बना रहता है। किटनाशको का संतुलित एवं अनुचित मात्रा पर्यावरणीय घटकों पर प्रतिकुल प्रभाव डालता है। इसलिए किटनाशको को कृषि वैज्ञानिक के सलाह परामर्श से न्यायसंगत उपयोग व स्वास्थ की सुरक्षा को देखते हुऐ इस्तेमाल करना चाहिए। लेकिन बहुत से किसानों को किटनाशको कि उचित मात्रा व सुरक्षा के बारे में ज्ञान नही होता है। या इसे महत्व नही देते है। किटनाशको से स्वास्थ कि सुरक्षा एवं प्र्यावरण को टिकाऊ बनाये रखने के लिए कृषि प्रसार सेवको, उद्योगो एवं खेतो में काम करने वाले मजदूरों का यह एक कर्तव्य है। कि किटनाशको से सुरक्षा के उपायो को जन जन तक पहुँचाये। फुटपाथ डीलरों या गैर-लाइसेंस प्राप्त व्यक्ति से कीटनाशक न खरीदें। पूरे सीजन के लिए थोक में कीटनाशक न खरीदें। कंटेनर पर बिना अनुमदित लेबल के कीटनाशक न खरीदें। कभी भी समाप्त हो चुकी अवधि वाला कीटनाशक न खरीदें। लीक/ढीले/गैर-सीलबंद कंटेनर वाले कीटनाशक न खरीदें। घर के परिसर में कीटनाशक कभी भी संग्रहित न करें। कभी भी मूल कंटेनर से कीटनाशक दूसरे कंटेनर में स्थानांतरित न करें। खरपतवारनाशक के साथ कीटनाशक को संग्रहित न करें। बच्चों को संग्रहण वाली जगह पर प्रवेश न करने दें। कीटनाशक धूप या...

Use of Mobile in Agriculture and Agriculture related Mobile Apps मोबाइल संचार प्रौद्योगिकी की गतिशील वृद्धि, विकासशील देशों में आर्थिक विकास, सामाजिक सशक्तीकरण और जमीनी स्तर पर नवाचार के लिए अवसर पैदा कर रही है। यह लाखों ग्रामीण निवासियों को सूचना, बाजार और सेवाओं तक पहुंच प्रदान करके कृषि और ग्रामीण विकास (ए.आर.डी.) करता हे। 2015 में, भारत में 720 मिलियन मोबाइल फोन उपयोगकर्ता थे, जिनमें से 320 मिलियन ग्रामीण मोबाइल फोन उपयोगकर्ताओं हे। इस अनुमान में इंटरनेट सुविधा के साथ 50 मिलियन स्मार्टफोन उपयोगकर्ता भी शामिल हे । बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप द्वारा एक अध्ययन के अनुसार, ग्रामीण भारत का यह (ग्रामीण मोबाइल फोन उपयोगकर्ताओं) हिस्सा 2020 तक 48 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा।  हम जानते हे की पहले मोबाइल टेक्नोलॉजी का उतने अच्छे तरीके से उपयोग नहीं हो रहा था। हम लोग मोबाइल को केवल बातचीत के लिए ही काम में लेते रहे थे । और मोबाइल फोन की संख्या बहुत कम थी, लेकिन आजकल मोबाइल फोन हर जगह हर शेत्र में काम आ रहा हे लोग बड़े बड़े बिजनस मोबाइल पर कर रहे हे अतः किसानो को इस टेक्नोलॉजी को अपनाना पड़ेगा। हमारे किसानो को मोबाइल अप्प्स का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए, इन मोबाइल अप्प्स की सहायता से किसान,  नवीनतम वस्तुएं और मंडी की कीमतों, कीटनाशकों और उर्वरक, खेत और किसान संबंधी...

Rhododendron Arborium: A medicinal plant of Himachal Pradesh हिमाचल प्रदेश हिमालय की गोद में बसा हुआ एक सुंदर प्रदेश है । यहाँ की जलवायु परिस्थितियों में विविधता है क्योंकि औसत समुद्र तल से ४५० मीटर की  ऊचाई से लेकर ६५०० मीटर की ऊचाई तक अथवा  पश्चिम से पूर्व व दक्षिण से उत्तर तक यहाँ  भिन्नता है। ऊचाई  और जलवायु की विवधताओं के कारण यह राज्य  विभिन्न प्रकार के पौधों एवं जानवरों के रहने के लिए अनुकूल है । हिमाचल प्रदेश औषधीय एवं अन्य उपयोगी पौधों का एक समृद्ध भंडार है । इन पौधों में से अधिकांश पोधे पारंपरिक दवाओं, लोक उपयोग और आधुनिक उद्योगों में इस्तिमाल किए जाते है । हिमाचल प्रदेश में पाए गए कुछ विशेष पौधे  जैसे की शतावरी, आर्किड का पेड़, दारुहल्दी, अदरक, धतूरा, आवला , कुमुद के फूल, पीली चमेली, अखरोट, बॉक्स मर्टल, रोडोडेंड्रोन, तुलसी, जंगली हिमालयी चेरी और जंगली अनार  हैं। रोडोडेंड्रोन इनमे सबसे अधिक पाया जाता है । इसका वैज्ञानिक नाम रोडोडेंड्रोन अर्बोरियम है और इसे कुछ समय पूर्व नेपाल के राष्ट्रीय फूल का दर्जा भी प्रदान किया गया है। रोडोडेंड्रॉन आर्बोरियम कुल एरीकेसी के अंतर्गत आता है । हिमाचल प्रदेश में यह आमतौर पर बुरांस,  ब्रास, बुरस या बाराह के फूल के नाम से जाना जाता है । यह व्यापक रूप से हिमालयी क्षेत्रों में १२०० और ४००० मीटर की ऊंचाई...