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किसान उत्पादक संगठनः घटती जोत, बढ़ती चुनौतियों का सशक्त समाधान

किसान उत्पादक संगठनः घटती जोत, बढ़ती चुनौतियों का सशक्त समाधान

Farmer Producer Organizations: A powerful solution to decreasing land holdings and increasing challenges

भारतीय कृषि व्यवस्था में लघु एवं सीमांत किसानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। देश के लगभग 86% किसान 2.0 हैक्टर से कम जोत वाले हैं, जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका, पोषण सुरक्षा तथा कृषि अर्थव्यवस्था की स्थिरता में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। देश में जोतों के निरंतर विखंडन, सीमित संसाधनों, बढ़ती उत्पादन लागत, जलवायु परिवर्तन तथा बाजार संबंधी चुनौतियों के कारण इन किसानों की उत्पादकता, लाभप्रदता एवं आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। तेजी से बढ़ती जनसंख्या तथा उत्तराधिकार के फलस्वरूप कृषि जोतों का औसत आकार निरन्तर घट रहा है, जिससे प्रति किसान उपलब्ध भूमि सीमित होती जा रही है। छोटी एवं बिखरी हुई जोतों पर आधुनिक कृषि यंत्रीकरण, सटीक कृषि, स्वचालित उपकरणों तथा डिजिटल कृषि प्रौद्योगिकियों का आर्थिक एवं तकनीकी दृष्टि से प्रभावी उपयोग कठिन हो जाता है। परिणामस्वरूप, प्रति इकाई उत्पादन लागत में वृद्धि होती है, जबकि उत्पादकता एवं संसाधन-उपयोग दक्षता में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाता है। इससे कृषि की आर्थिक व्यवहार्यता, निवेश क्षमता तथा दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होती है।

इसके अतिरिक्त, सिंचाई सुविधाओं की सीमित उपलब्धता, गुणवत्तापूर्ण बीज एवं अन्य कृषि आदानों की सीमित उपलब्धता, मृदा कार्बनिक पदार्थों में कमी, पोषक तत्वों का असंतुलन तथा भूमि क्षरण जैसी समस्याएँ छोटे किसानों की उत्पादन क्षमता को सीमित करती हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा की अनिश्चितता, बार-बार आने वाले सूखे एवं बाढ़, तापमान में वृद्धि तथा चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति बढ़ने से कृषि उत्पादन का जोखिम और अधिक बढ़ जाता है। इन परिस्थितियों में जलवायु अनुकूल कृषि तथा संसाधन-संरक्षण आधारित कृषि प्रणालियों को अपनाना समय की आवश्यकता बन गई है।

इन चुनौतियों के प्रभावी समाधान के लिए वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकी-आधारित एवं सतत् कृषि प्रबंधन को प्राथमिकता देना आवश्यक है। मृदा स्वास्थ्य परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन, सटीक पोषक तत्व प्रबंधन, जलवायु अनुकूल एवं उच्च उत्पादन वाली किस्मों का उपयोग, सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियाँ (ड्रिप एवं स्प्रिंकलर), एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन, एकीकृत कीट प्रबंधन, संरक्षण कृषि तथा डिजिटल निर्णय-सहायक प्रणालियों के समन्वित अनुप्रयोग से कृषि उत्पादन प्रणाली की उत्पादकता, संसाधन-उपयोग दक्षता एवं पर्यावरणीय स्थिरता में उल्लेखनीय सुधार किया जा सकता है। साथ ही, रिमोट सेंसिंग, भू-स्थानिक सूचना प्रणाली, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट ऑफ थिंग्स तथा ड्रोन आधारित कृषि प्रबंधन जैसी उभरती प्रौद्योगिकियाँ छोटे किसानों के लिए अधिक सटीक, डेटा-आधारित एवं लागत-प्रभावी कृषि प्रबंधन का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं।

छोटे एवं सीमांत किसानों की आर्थिक सुदृढ़ता सुनिश्चित करने के लिए केवल उत्पादन वृद्धि पर्याप्त नहीं है, बल्कि मूल्य श्रृंखला का सुदृढ़ीकरण, बाजारों तक बेहतर पहुँच, किसान उत्पादक संगठन, सामूहिक कृषि यंत्रीकरण, कस्टम हायरिंग सेन्टर, कृषि प्रसंस्करण, भंडारण एवं डिजिटल विपणन प्रणालियों का विस्तार भी समान रूप से आवश्यक है। सामूहिक संसाधन उपयोग, वैज्ञानिक कृषि परामर्श, वित्तीय समावेशन तथा प्रौद्योगिकी के व्यापक प्रसार के माध्यम से उत्पादन लागत में कमी, संसाधनों की उपयोग दक्षता में वृद्धि, जोखिम प्रबंधन तथा किसानों की आय एवं कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित की जा सकती है।

खेती में संरचनात्मक बाधाएँ

भारतीय कृषि प्रणाली छोटी एवं विखंडित जोत, सीमित पूंजी, अपर्याप्त अवसंरचना तथा तकनीकी पहुँच जैसी संरचनात्मक चुनौतियों से प्रभावित है। जलवायु परिवर्तन ने इन समस्याओं को और अधिक गंभीर बना दिया है। अनिश्चित वर्षा, सूखा, बाढ़ तथा अन्य चरम मौसमी घटनाएँ कृषि उत्पादन, उत्पादकता एवं किसानों की आय की स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं। यद्यपि फसल उत्पादन के साथ पशुपालन, बागवानी अथवा कृषि-आधारित उद्यमों का एकीकरण आय विविधीकरण एवं जोखिम प्रबंधन का प्रभावी माध्यम है, किन्तु सीमांत किसानों के लिए पूंजी, कौशल, ऋण एवं बाजार तक सीमित पहुँच, इसके व्यापक अंगीकरण में बाधक हैं। परिणामस्वरूप, अनेक कृषि योजनाएँ स्थानीय परिस्थितियों एवं संसाधन उपलब्धता के अनुरूप प्रभावी क्रियान्वयन के अभाव में अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं कर पाती हैं।

घटती जोत बढ़ती मुश्किलें

भारत में कृषि जोत का लगातार छोटा होना कृषि क्षेत्र के सामने एक गंभीर आर्थिक, सामाजिक और वैज्ञानिक चुनौती बन गया है। बढ़ती जनसंख्या, पारिवारिक भूमि का बार-बार बंटवारा तथा सीमित कृषि योग्य भूमि इसके प्रमुख कारण हैं। पहले प्रति किसान औसत जोत लगभग 2.25 हैक्टर थी, जो अब घटकर लगभग 1.0 हैक्टर रह गई है। कई किसानों के पास तो 1.0 एकड़ से भी कम भूमि बची है, जिससे खेती की लाभप्रदता निरन्तर घट रही है। देश में किसानों की संख्या पाँच वर्ष पहले 13.83 करोड़ थी, जो बढ़कर 14.57 करोड़ हो गई है। इनमें लगभग 86 प्रतिशत किसान लघु एवं सीमांत श्रेणी के हैं। 1.0 हैक्टर से कम भूमि वाले किसान सीमांत तथा 1.0-2.0 हैक्टर भूमि वाले किसान लघु किसान कहलाते हैं। कृषि मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1970-71 में सीमांत किसानों की संख्या 3.62 करोड़ थी, जो 2015-16 में बढ़कर 9.98 करोड़ हो गई। इसके विपरीत बड़े किसानों की संख्या 27.66 लाख से घटकर केवल 8.31 लाख रह गई। उत्तर प्रदेश में लघु एवं सीमांत किसानों की संख्या कुल किसान परिवारों का लगभग 92-94% है। कृषि जनगणना और विभिन्न सरकारी सर्वेक्षणों के अनुसार राज्यों में लगभग 78% किसान सीमांत और 14% किसान लघु श्रेणी में आते हैं। जिन राज्यों में भूमि सुधार प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो सके, वहाँ अपेक्षाकृत बड़े किसानों की संख्या आज भी अधिक दिखाई देती है। उदाहरण के लिए, हरियाणा जैसे छोटे राज्य में भी लगभग 41 हजार बड़े किसान हैं। इन परिस्थितियों में बड़ी संख्या में छोटे किसानों के लिए केवल खेती के सहारे परिवार का भरण-पोषण करना कठिन हो गया है। यही कारण है कि ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहा है और असंगठित श्रम क्षेत्र का हिस्सा बन रहा है।

समूह की शक्ति में छिपा है समस्याओं का समाधान

छोटे एवं सीमांत किसानों की सबसे बड़ी चुनौती सीमित संसाधन, ऊँची उत्पादन लागत, निम्न क्रय क्षमता और बाजार में कमजोर सौदेबाजी क्षमता है। इन समस्याओं का प्रभावी समाधान किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) और सहकारी समूह हैं। जब 100-300 किसान मिलकर बीज, उर्वरक और कृषि यंत्रों की सामूहिक खरीद तथा उपज का सामूहिक विपणन करते हैं, तो आवकों की लागत 10-20: तक घट सकती है और बेहतर मूल्य मिलने से किसानों की आय में लगभग 20-30: तक वृद्धि की संभावना बनती है। भारत सरकार द्वारा 10,000 से अधिक एफपीओ विकसित किए गए हैं, जो किसानों को आधुनिक कृषि तकनीक, ड्रोन, मृदा परीक्षण, मौसम आधारित सलाह, भंडारण, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और डिजिटल बाजारों से जोड़ रहे हैं। इससे जोखिम में कमी और बाजार तक पहुँच मजबूत होती है। खेती अधिक लाभकारी, प्रतिस्पर्धी तथा टिकाऊ बनती है। वास्तव में, संगठित किसान ही आत्मनिर्भर, प्रतिस्पर्धी और समृद्ध कृषि व्यवस्था की मजबूत आधारशिला हैं। सामूहिक प्रयासों के माध्यम से किसान संसाधनों का कुशल उपयोग, आधुनिक तकनीकों तक बेहतर पहुँच, बाजार में प्रभावी भागीदारी और अपनी आय में दीर्घकालिक एवं स्थायी वृद्धि सुनिश्चित कर सकते हैं।

(स्रोत: गूगल)

एकीकृत कृषि मॉडल से किसानों की बेहतरी

छोटे और सीमांत किसानों के लिए केवल एक फसल पर निर्भर रहना आर्थिक रूप से कठिन होता जा रहा है। ऐसे में एकीकृत कृषि प्रणाली खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने का बेहतर विकल्प प्रदान करती है। इस मॉडल में किसान फसल उत्पादन के साथ डेयरी, सब्जी उत्पादन, मधुमक्खीपालन, मुर्गीपालन, मछलीपालन और मशरूम उत्पादन जैसी गतिविधियों को अपनाते हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाने से छोटे किसानों की आय में लगभग 25-50 प्रतिशत तक वृद्धि की संभावना हो सकती है। एक हैक्टर भूमि में अनाज, सब्जियों और पशुपालन को जोड़कर किसान पूरे वर्ष नियमित आमदनी और सतत् रोजगार के अवसर प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रणाली में पशुओं से मिलने वाले गोबर का उपयोग जैविक खाद के रूप में किया जाता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि और रासायनिक उर्वरकों पर होने वाले खर्च में कमी आती है। इस प्रणाली में एक घटक के अपशिष्ट का उपयोग दूसरे घटक की उत्पादकता बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। जिसके परिणाम काफी प्रभावी पाए गए हैं।

एकीकृत कृषि मॉडल से किसानों की बेहतरी

सहकारी खेती में अपार संभावनाएँ

भारतीय गाँवों की सामाजिक संरचना में जातीय, धार्मिक और व्यक्तिगत विभाजन अक्सर सामूहिक प्रयासों में बाधा बनते हैं। इसके बावजूद सहकारी खेती की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता है। छोटे किसानों के लिए कस्टम हायरिंग केन्द्र या कृषि मशीनरी बैंक उपयोगी विकल्प हो सकते हैं, जहाँ से आधुनिक कृषि उपकरण किराए पर लिए जा सकें। इसके अतिरिक्त, आपसी सहमति से खेतों की मेड़ों और अवरोधों को कम करके सहकारी खेती की दिशा में प्रयास किए जा सकते हैं। 

सफल मॉडल प्रेरणा से प्रगति की कहानी 

सहकारी खेती मॉडल ने किसानों को एकजुट कर संसाधनों का बेहतर उपयोग, आर्थिक विकास और समृद्धि की प्रेरणादायक कहानी का मार्ग प्रशस्त किया है जिसके कुछ प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं:

  • गुजरात के आणंद जिले का गंभरा गाँव सामूहिक खेती का एक पुराना और सफल उदाहरण है, जहाँ वर्ष 1950 से इस मॉडल पर काम किया जा रहा है। अब इस सहकारिता के पास 526 एकड़ जमीन और 291 सदस्य हैं, जो छोटे समूहों में बँटकर खेती करते हैं।
  • केरल का “कुटुम्बश्री मिशन“ दुनिया के सबसे बड़े महिला सशक्तिकरण और सामूहिक खेती कार्यक्रमों में गिना जाता है। यहाँ स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएँ संयुक्त दायित्व समूह बनाकर परती और पट्टे की भूमि पर सामूहिक खेती कर रही हैं। आज हजारों एकड़ भूमि पर धान, सब्जियाँ और फल उत्पादन के माध्यम से उन्होंने आय और आत्मनिर्भरता बढ़ाने में सफलता प्राप्त की है। 
  • महाराष्ट्र के नासिक स्थित “सह्याद्रि फार्म्स“ छोटे किसानों के आधुनिक एफपीओ मॉडल का उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ 30,000 से अधिक छोटे किसानों ने मिलकर कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग और निर्यात सुविधाएँ विकसित की हैं। इसके परिणामस्वरूप किसान स्थानीय व्यापारियों पर निर्भर रहने के बजाय सीधे अंतर्राष्ट्रीय बाजारों तक पहुँच बनाने में सफल हुए हैं। इसका सीधा असर किसानों की आमदनी और स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। 
  • तेलंगाना के मेडक जिले में “डेक्कन डेवलपमेंट सोसाइटी“ के माध्यम से दलित और सीमांत महिला किसानों ने सामूहिक प्रयासों से बंजर भूमि को उत्पादक बनाया है। मिलेट आधारित खेती, सामुदायिक बीज बैंक और स्थानीय ज्ञान प्रणाली ने इस मॉडल को विशिष्ट बनाया है। 
  • केरल स्थित “इंडियन ऑर्गेनिक फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड“ एक सफल किसान उत्पादक संगठन है, जिसका स्वामित्व एवं संचालन स्वयं जैविक किसानों द्वारा किया जाता है। यह संगठन जैविक मसालों, चाय और कॉफी का वैज्ञानिक तरीके से संग्रहण, ग्रेडिंग, गुणवत्ता परीक्षण, प्रसंस्करण तथा निर्यात करता है। यह केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के 2,500 से अधिक किसानों को संगठित विपणन एवं मूल्य संवर्धन के माध्यम से बेहतर बाजार, प्रतिस्पर्धी मूल्य तथा स्थायी आय के अवसर उपलब्ध कराकर उनकी आर्थिक सशक्तता को बढ़ावा दे रहा है।
  • वर्ष 2025 में 500 महिलाओं को संगठित करते हुए किसान उत्पादक संगठन आधारित सहकारी मॉडल की स्थापना की गई। इसके अंतर्गत 18 जुलाई, 2025 को सहकारी समिति अधिनियम के तहत बहु-उद्देशीय गतिविधियों के संचालन के लिए “दी हरियाणा अतुल्य नारी शक्ति” नामक एफपीओ का सफलतापूर्वक पंजीकरण कराया गया। यह एफपीओ महिला नेतृत्व, उद्यमिता विकास और सामूहिक आर्थिक सशक्तिकरण को बढावा देते हुए ग्रामीण महिलाओं के लिए एक प्रभावी मंच के रूप में कार्य कर रहा है।

कृषि लागत घटाने की दिशा में वैज्ञानिक पहल

बढ़ती उत्पादन लागत के बीच वैज्ञानिक एवं आधुनिक कृषि तकनीकें किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन रही हैं। भारत में खेती की कुल लागत का लगभग 35-45% हिस्सा उर्वरक, बीज, कीटनाशक और सिंचाई पर खर्च होता है। यदि इन संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन किया जाए, तो लागत में 15-30% तक कमी की जा सकती है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग से अनावश्यक खाद की खपत में कमी आती है और उत्पादन क्षमता बनी रहती है। ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों से 30-50% पानी तथा 20-30% ऊर्जा की बचत होती है। ड्रोन आधारित छिड़काव से कीटनाशकों की मात्रा में 20-30% तक कमी के साथ-साथ समय और श्रम दोनों की बचत होती है। 

कस्टम हायरिंग केन्द्र छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए कृषि यंत्रीकरण का किफायती विकल्प प्रदान करते हैं, जिससे मशीनरी पर होने वाला निवेश काफी घट जाता है। किसान उत्पादक संगठन सामूहिक रूप से बीज, उर्वरक और कृषि यंत्र खरीदकर किसानों को कम लागत पर गुणवत्तापूर्ण संसाधन उपलब्ध कराते हैं। जिससे बेहतर बाजार मूल्य दिलाने में भी सहायता करते हैं। प्राकृतिक एवं जैविक खेती, फसल अवशेष प्रबंधन, सटीक कृषि, मोबाइल आधारित मौसम पूर्वानुमान तथा डिजिटल कृषि सलाह जैसी वैज्ञानिक पहल जोखिम कम करने और संसाधनों के कुशल उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। आज के समय में कृषि उत्पादों की आॅनलाइन बिक्री किसानों के लिए अधिक लाभ अर्जित करने का एक प्रभावी माध्यम बन गई है। इसी उद्देश्य से सरकार द्वारा शुरू किया गया ओएनडीसी किसानों को एक व्यापक और सुलभ डिजिटल बाजार उपलब्ध करा रहा है। इसके माध्यम से किसान अपने उत्पाद अधिक खरीदारों तक पहुंचाकर उचित मूल्य प्राप्त कर सकते हैं और कीमतों की अनिश्चिता को काफी हद तक कम कर सकते हैं। इन तकनीकों को अपनाकर किसान लागत घटाने के साथ-साथ उत्पादन, लाभप्रदता और कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता भी सुनिश्चित कर सकते हैं।

नीति से व्यवहार तक बदलाव की जरूरत

छोटी जोत को लाभकारी बनाने के लिए वैज्ञानिक, आधुनिक और बाजारोन्मुख कृषि को अपनाना आवश्यक है। मृदा स्वास्थ्य परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई से जल की बचत, उन्नत एवं जलवायु अनुकूल किस्मों का चयन तथा सटीक पोषक एवं कीट प्रबंधन से उत्पादन लागत कम और उत्पादकता अधिक की जा सकती है। ड्रोन, सेंसर और डिजिटल कृषि तकनीकें फसल की निगरानी तथा संसाधनों के कुशल उपयोग में सहायक हैं। साथ ही, फसल विविधीकरण, बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन और कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन से किसानों की आय के अनेक स्रोत विकसित होते हैं। नीति स्तर पर किसान उत्पादक संगठन, सुलभ ऋण, आधुनिक भंडारण, प्रसंस्करण, ई-मार्केटिंग तथा गुणवत्तापूर्ण कृषि विस्तार एवं सलाह सेवाओं को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। तकनीक, बाजार, वित्त और वैज्ञानिक प्रबंधन का प्रभावी समन्वय ही छोटी जोत को टिकाऊ, प्रतिस्पर्धी, लाभकारी तथा युवाओं के लिए आकर्षक कृषि मॉडल बना सकता है।

आधुनिक कृषि तकनीकों का पूरा लाभ तभी मिल सकता है, जब किसानों को उनकी स्थानीय भाषा में प्रशिक्षण, कृषि परामर्श और समय-समय पर तकनीकी सहायता उपलब्ध हो। कृषि विज्ञान केंद्रों, डिजिटल कृषि प्लेटफॉर्म, किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा सरकारी-निजी साझेदारी के माध्यम से वैज्ञानिक जानकारी को खेत तक पहुँचाना आवश्यक है। साथ ही, कृषक उत्पादक संगठनों को मजबूत और प्रभावी बनाकर छोटे किसानों को बेहतर बाजार, उचित मूल्य और कम लागत का लाभ दिलाया जा सकता है। इससे छोटी जोतों को भी लाभकारी बनाने की अपार संभावनाएँ हैं।

निष्कर्ष

छोटे एवं सीमांत किसान भारतीय कृषि की आधारशिला हैं, लेकिन छोटी जोत, बढ़ती लागत, जलवायु परिवर्तन और सीमित संसाधनों के कारण उनकी आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो रही है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए वैज्ञानिक कृषि तकनीकों, सामूहिक प्रयासों और बाजार आधारित रणनीतियों को अपनाना आवश्यक है। मृदा स्वास्थ्य आधारित उर्वरक प्रबंधन, सूक्ष्म सिंचाई, जलवायु अनुकूल किस्में, डिजिटल कृषि और सटीक कृषि जैसी तकनीकें उत्पादन लागत कम करने तथा संसाधनों की दक्षता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। किसान उत्पादक संगठन, सहकारी खेती, कस्टम हायरिंग सेन्टर और एकीकृत कृषि प्रणाली छोटे किसानों को मजबूत बनाकर उनकी आय एवं जोखिम प्रबंधन क्षमता बढाते हैं। छोटे खेत भारतीय कृषि की कमजोरी नहीं, बल्कि एक बड़ी संभावना है। तकनीक, वित्त, बाजार तक बेहतर पहुँच और वैज्ञानिक ज्ञान के प्रभावी समन्वय के माध्यम से इसे लाभकारी, टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी कृषि माॅडल में परिवर्तित किया जा सकता है। यही समग्र दृष्टिकोण आत्मनिर्भर, समावेशी और समृद्ध कृषि व्यवस्था की मजबूत आधारशिला तैयार करेगा।


Author

अनुज कुमार, रविन्द्र सिंह शेखावत, उषा दास एवं रतन तिवारी

भाकृअनुप–भारतीय गेहूँ एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल, हरियाणा

 

Keshav Kshirsagar
keshavkshirsagar@gmail.com