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सुपरफूड सहजन: प्रकृति का अनोखा वरदान और इसके आयुर्वेदिक महत्व

सुपरफूड सहजन: प्रकृति का अनोखा वरदान और इसके आयुर्वेदिक महत्व

मोरिंगा को सेहत, पोषण, पानी की सफ़ाई और पर्यावरण पर इसके बहुत फ़ायदेमंद असर की वजह से कई लोग “चमत्कारी पेड़” और “जीवन का पेड़” मानते हैं। सहजन एक बहु उपयोगी पेड़ है। इसे सहजना, सुजना, सेंजन और मुनगा आदि नामों से जाना जाता हैं। इसका वानस्पतिक नाम  ‘‘मोरिंगा ओलिफेरा‘‘ है। इस पेड़ के विभिन्न भागों मे अनेको पोषक तत्व पाये जाते है।  इसकी पत्तियों और फली की सब्जी बनती है। सहजन के सभी भाग पत्ती, फूल, फल, बीज, छाल, जड़े एवम बीज से प्राप्त तेल स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हैं। सहजन में भरपूर मात्रा में पोषक तत्व पाये जाते है। तथा इसमें दूध की तुलना में 4 गुना केल्शियम और 2 गुना प्रोटीन पायी जाती हैं। इसमें प्रोटीन विटामीन ए, बी1, एव सी तथा केल्शियम और आयरन भरपूर मात्रा में पाये जाते है।

वैज्ञानिक साहित्य में मोरिंगा से बनी चीज़ों में कई तरह के औषधीय गुण बताए गए हैं; जैसे एंटीमाइक्रोबियल, हाइपोटेंसिव, हाइपोग्लाइसेमिक, इम्यूनोमॉड्यूलेटरी और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण। उदाहरण के लिए, इसके बीजों में स्टैफिलोकोकस ऑरियस और स्यूडोमोनास एरुगिनोसा के खिलाफ़ काफ़ी एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं। इसकी पत्तियां फ्लेवोनोइड्स, क्वेरसेटिन, β-सिटोस्टेरॉल और ज़िएटिन जैसे प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट का अच्छा स्रोत मानी जाती हैं। पत्तियों, बीजों, फूलों, जड़ों और छाल के गर्म पानी में बने अर्क में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण देखे गए हैं। मोरिंगा के अलग-अलग हिस्सों, जैसे जड़ों, पत्तियों, फूलों, फलों और बीजों को फाइटोकेमिकल्स/सेकेंडरी मेटाबोलाइट्स का अच्छा स्रोत भी माना जाता है। बताया जाता है कि इनमें एल्कलॉइड्स, फ्लेवोनोइड्स, कैरोटीनॉयड्स, टैनिन्स, एंथ्राक्विनोन्स, एंथोसायनिन और प्रोएंथोसायनिडिन्स होते हैं। ये फाइटोकेमिकल्स ही मोरिंगा के औषधीय गुणों में योगदान देते हैं।

पिछले कुछ दशकों में हर्बल दवाओं के क्षेत्र में बहुत तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारणों से इन हर्बल दवाओं की लोकप्रियता बनी हुई है। कई विकासशील देशों में बड़ी आबादी अपनी सेहत से जुड़ी ज़रूरतों के लिए अक्सर औषधीय पौधों पर निर्भर रहती है। 

औषधीय गुण:-

सदियों से, दुनिया भर के लोग, जिनमें पारंपरिक डॉक्टर भी शामिल हैं, मोरिंगा पेड़ के अलग-अलग हिस्सों को पारंपरिक दवा के तौर पर बताते रहे हैं। इसके कई औषधीय इस्तेमाल हैं और आयुर्वेदिक और यूनानी दवा के सिस्टम में इसे लंबे समय से माना जाता है। जिन अनगिनत प्राकृतिक पौधों की फार्माकोलॉजिकल खूबियों की जांच की जाती है, उनमें से मोरिंगा को सबसे ज़रूरी और फायदेमंद माना जाता है क्योंकि यह एक औषधीय और काम का खाना दोनों है। मोरिंगा के कई एथनोमेडिसिन इस्तेमाल, फाइटोकेमिकल चीज़ें और अलग-अलग हिस्सों को तैयार करने के पारंपरिक तरीकों को संक्षेप में बताया गया है।

जड़:- इसका प्रयोग रेचक, कसैला, मूत्रवर्धक, हृदयवर्धक, गर्भपात कराने वाला और त्वचा को लाल करने वाला औषधि के रूप में किया जाता है। यह दांत दर्द, सर्दी-जुकाम, बाहरी घाव, सूजन, मुंह के छाले, बवासीर, ब्रोंकाइटिस, मूत्र स्राव, जिद्दी अस्थमा, गठिया और मिर्गी के उपचार में सहायक है। यह कमर दर्द, गुर्दे के दर्द, कब्ज और तंत्रिका-तंत्र की कमजोरी में उत्तेजक के रूप में भी उपयोगी है।

छाल:- यह दिल की बीमारियों, आँखों की बीमारियों, बुखार, सूजन, अपच और तिल्ली (प्लीहा) के बढ़ने में फ़ायदेमंद है। यह कान और दाँत के दर्द से राहत देता है। यह घाव, सर्दी-जुकाम, पाचन संबंधी समस्याओं, हिस्टीरिया और सिरदर्द का इलाज करता है। इसका इस्तेमाल कामोत्तेजक के तौर पर भी किया जाता है।

गोंद:- इसका प्रयोग कसैला, लालिमा लाने वाला और गर्भपात कराने वाली दवा के रूप में किया जाता है। दांत दर्द, सिरदर्द, बुखार, पेट की समस्याओं, पेचिश और अस्थमा से राहत दिलाने में भी इसका उपयोग होता है। यह सिफलिस और गठिया का भी इलाज करता है।

पत्ती:- इसका इस्तेमाल पेट के कीड़े मारने वाली दवा और कामोत्तेजक के तौर पर किया जाता है। यह दस्त, कोलाइटिस और गठिया का इलाज करता है। यह ग्रंथियों की सूजन और सिरदर्द को कम करता है। इसका इस्तेमाल बवासीर, बुखार, कब्ज, ब्रोंकाइटिस, कान और आंख के इन्फेक्शन, स्कर्वी और सर्दी-जुकाम के लिए किया जाता है। यह पाचन में मदद करता है और घावों पर लगाने के लिए लेप के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।

फूल:- यह सूजन, बैक्टीरियल इन्फेक्शन, सर्दी-जुकाम, बाहरी घाव/अल्सर, गले के इन्फेक्शन, मांसपेशियों की बीमारियों, ट्यूमर और हैजे का इलाज करता है। इसका इस्तेमाल मूत्रवर्धक, कामोत्तेजक और गर्भपात कराने वाली दवा के तौर पर किया जाता है। ट्यूमर के लिए पारंपरिक घरेलू उपाय।

फली:- इसे टॉनिक के तौर पर और पेट के कीड़ों व त्वचा के ट्यूमर के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है। यह डायबिटीज और जोड़ों के दर्द का इलाज करता है।

बीज:- यह आँखों की बीमारियों और सिर की समस्याओं को ठीक करता है। इसका इस्तेमाल बुखार, साँप के काटने, बिच्छू के डंक और मस्सों के इलाज में किया जाता है। यह अल्सर, गैस्ट्राइटिस, त्वचा की बीमारियों, ब्लैडर के इन्फेक्शन, स्कर्वी, पेट के ट्यूमर और शिस्टोसोम के इलाज में काम आता है। यह हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करता है।

मोरिंगा पाउडर और पत्तियों के प्रमुख औषधीय लाभ:

  • मोरिंगा को सुपरफूड इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके अंदर भरपूर मात्रा में विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट मौजूद होते हैं। वैज्ञानिक रिसर्च बताती हैं कि मोरिंगा की पत्तियों में गाजर से अधिक विटामिन A, दूध से अधिक कैल्शियम, पालक से अधिक आयरन और अंडे से अधिक प्रोटीन मौजूद होता है। यही कारण है कि यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी को मजबूत बनाने में बेहद उपयोगी है। बदलते मौसम में होने वाले संक्रमण, सर्दी-जुकाम, थकान, कमजोरी जैसी समस्याओं में यह एक बेहद कारगर उपाय है।
  • मोरिंगा ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में सहायक है। डायबिटीज से जूझ रहे लोगों में यह इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार लाता है और फास्टिंग ब्लड शुगर को कम करने में भी मदद कर सकता है। 
  • सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कई तरह की क्रॉनिक बीमारियों का कारण बन सकते हैं। मोरिंगा में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो ऑक्सीडेटिव डैमेज से बचाने में मदद करते हैं और एंटी-इंफ्लेमेटरी सपोर्ट के रूप में भी काम कर सकते हैं।
  • मोरिंगा में फाइबर की अच्छी मात्रा होती है, जो पाचन को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाता है। अगर कब्ज की समस्या रहती है, पेट भारी रहता है या अपच की दिक्कत है, तो मोरिंगा काफी हद तक फायदेमंद हो सकता है। यह शरीर से टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में भी मदद करता है, जिससे पेट स्वस्थ रहता है और शरीर हल्का महसूस करता है।
  • मोरिंगा के तेल और पाउडर में मौजूद विटामिन और एंटी-ऑक्सीडेंट त्वचा को चमकदार बनाते हैं और बालों को झड़ने से रोकते हैं।
  • बढ़ती उम्र, खासकर महिलाओं में मेनोपॉज के बाद हड्डियों का घनत्व कम होने लगता है। मोरिंगा में मौजूद कैल्शियम, आयरन और विटामिन K हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में मदद करते हैं। अगर कोई व्यक्ति थकान, चक्कर या कमजोरी महसूस करता है, तो कैफीन के स्थान पर सुबह-सुबह मोरिंगा के सेवन से उसे दिन भर ज्यादा एनर्जी से भरपूर रहने में मदद मिल सकती है।
  • मोरिंगा पर हुई रिसर्च से पता चलता है कि यह खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद कर सकता है। साथ ही यह ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में और हृदय की मांसपेशियों को सुरक्षित बनाए रखने में सहायक पाया गया है। इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण इसे दिल की सेहत के लिए और भी ज्यादा फायदेमंद बनाते हैं।

दैनिक आहार में मोरिंगा कैसे शामिल करें

भारत देश में यह आसानी से उपलब्ध है और इसे दैनिक आहार में शामिल करना बेहद आसान है। हम इसे कई तरीकों से इस्तेमाल कर सकते हैं

  • सहजन की फली को दाल या सांभर में डालकर पकाएँ; पत्तियों को सब्जी में मिलाकर भूनें
  • स्मूदी या ओट्स में पाउडर मिलाएँ; दही, सलाद, चटनी या सूप पर छिड़कें; इम्यूनिटी ड्रिंक में इस्तेमाल करें

उपयोग से पहले सलाह जरुर लें 

मोरिंगा प्राकृतिक रूप से सुरक्षित है, फिर भी कुछ विशेष स्थितियों में सावधानी जरूरी है।

  • गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को बिना डॉक्टर की सलाह के इसे सप्लीमेंट के रूप में नहीं लेना चाहिए।
  • इसकी जड़ और छाल का इस्तेमाल गर्भावस्था में बिल्कुल नहीं करना चाहिए।
  • अगर ब्लड प्रेशर, थायरॉयड या डायबिटीज की दवा ले रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेकर ही इसका इस्तेमाल करें।
  • अधिक मात्रा में सेवन से पेट और आंतों में कुछ परेशानी हो सकती है।

प्रत्येक व्यक्ति का शरीर अलग तरह से प्रतिक्रिया करता है, इसलिए खाने में कुछ भी नया शामिल करने से पहले डॉक्टर या नूट्रिशनिस्ट की सलाह लेना हमेशा फायदेमंद होता  है।

सारांश

प्रकृति ने हमें कई ऐसी चीज़ें दी हैं जिनके अद्भुत फायदों को हम कई बार नजरअंदाज कर देते हैं। मोरिंगा भी उन ही अनमोल चीज़ों में से एक है। यह शरीर को जरुरी पोषक तत्व प्रदान करता है, बीमारी से लड़ने की क्षमता बढ़ाता है और ऊर्जा के साथ-साथ दिल, दिमाग, हड्डियों और पाचन को बेहतर बनाने में भी मदद करता है। अगर आप अपनी डाइट में थोड़ा बदलाव करके उसे ज्यादा पौष्टिक बनाना चाहते हैं, तो मोरिंगा एक बेहद आसान तरीका है। एक अच्छे स्वास्थ्य की नींव रोजाना की छोटी-छोटी आदतों से ही बनती है। मोरिंगा को अपनी डाइट में शामिल कर आप उन आदतों में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।


Author

डॉ. जुगल किशोर सिल्ला, विद्या वाचस्पति, राजस्थान कृषि अनुसन्धान संस्थान, दुर्गापुरा, जयपुर।

बबीता कुमारी, स्नातकोतर, कृषि महाविधालय, एसकेआरएयू, बीकानेर।

डॉ. जुगल किशोर सिल्ला