Agriculture Knowledge for Everyone

Animal husbandry

ठण्ड में पशुओं की देखभाल In most parts of our country, the winter season lasts from the month of November to February. The changing weather and cold cause stress on the animals. Due to which their growth, diet, nutrition and production are affected. That's why it is necessary to take proper care of animals at this time.  ठण्ड में पशुओं की देखभाल हमारे देश के अधिकतर भागों में ठण्ड का मौसम नवम्बर से फरवरी माह तक रहता है। बदलते मौसम तथा ठण्ड से पशुओं पर तनाव पड़ता है। जिसके कारण उनके बढ़वार, खान-पान, पोषण एवं उत्पादन प्रभावित होता है। इसलिए इस समय पशुओं की उचित देखभाल करना आवश्यक है। पशु आवास, आहार और स्वास्थ्य का समुचित प्रबंधन कर प्रतिकुल मौसम के प्रभाव का पशुओं के उत्पादन पर असर न पड़ने दें। आवास प्रबंधन - उचित आवास से पशु का दूध बढ़ जाता है, वजन में बढ़ोतरी होती है तथा उनकी बिमारियों में कमी आती है। एक सफल पशुपालक को पशुपोषण एवं प्रजनन के साथ-साथ ठण्ड में पशु आवास प्रबंधन पर निम्न बातों को ध्यान में रखनी चाहिए – आवास की दिशा पूरब-पश्चिम हो, इससे ठण्ड में धूप अन्दर तक आ जाती है तथा गर्मी में धूप को आसानी से अन्दर आने से रोका जा सकता है। आवास का फर्श साफ-सुधरा सुखा रहे। इसके लिए फर्श इस प्रकार...

ऊँटों में होने वाले तीन प्रमुख रोग तथा उनसे बचाव Camel farming is an indispensable occupation of desert areas as camel is an important part of the desert ecosystem. Due to its unique bio-physical characteristics, it has become a symbol of adaptation to survive in the harshness of arid regions. Camel's milk has medicinal value and is used as a medicine in many complex diseases including diabetes, asthma, jaundice, tuberculosis, anemia, cancer and liver. ऊँटों में होने वाले तीन प्रमुख रोग तथा उनसे बचाव ऊंट पालन रेगिस्तानी क्षेत्रों का अपरिहार्य व्यवसाय है क्योकि ऊँट रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण भाग है। अपनी अनूठी जैव-भौतिकीय विशेषताओं के कारण यह शुष्क क्षेत्रों की विषमताओं में जीवनयापन के लिए अनुकूलन का प्रतीक बन गया है।  मरूधरा की कठिन जीवनयापन शैली में यह मानव का जीवन संगी है। रेत के धोरो में ऊँट के बिना जीवन बिताना दुष्कर है। रेगिस्तान का जहाज कहलाने वाला ये पशु कोई भी विकट परिस्थितियों में भी ज़िन्दा रह सकता है और इस पशु ने भार वाहन के क्षेत्र में अपरिहार्यता की हद तक पहचान बनाई है । इसके अतिरिक्त भी ऊँट की बहुत सी उपयोगिताएं हैं, जो निरन्तर सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों से प्रभावित है। ऊंटनी के दूध का ओषधिय महत्त्व होता है। इसका उपयोग मधुमेह, दमा, पीलिया, तपेदिक, एनीमिया, कैंसर और...

दुधारू पशुओं में थनैला (Mastitis) रोग Mastitis or Thanela disease is mainly of two types - Clinical Thanela is easily identified by looking at the symptoms of the disease. Such as swelling in the udders, watery milk coming, salty or tasteless milk or splashing in the milk. But the external symptoms of the disease are not visible in sub-clinical Thanela. दुधारू पशुओं में थनैला (Mastitis) रोग थनैला मुख्य रूप से दुधारू पशुओं के थन की बीमारी है। इस बीमारी से ग्रसित पशु का जो दूध होता है उसका रंग और प्रकृति बदल जाती है। थन में सूजन, दूध में छिछड़े, दूध फट के आना, मवाद आना या पस आना जैसे लक्षण दिखाई देते है।थनैला रोग एक जीवाणु जनित रोग है। यह रोग ज्यादातर दुधारू पशु गाय, भैंस, बकरी को होता है। जब मौसम में नमी अधिक होती है तब इस बीमारी का प्रकोप और भी बढ़ जाता है। देसी गायों की अपेक्षा ज़्यादा दूध देने वाली संकर नस्ल की विदेशी गायों पर इस बीमारी का हमला ज़्यादा होता है। थनैला एक ऐसी बीमारी है, जिसे पूरी तरह से मिटाया नहीं जा सकता, लेकिन सावधानियों से इसे घटा ज़रूर सकते हैं। थनैला से संक्रमित गाय का दूध इस्तेमाल के लायक नहीं रहता। वो दूध फटा हुआ सा या थक्के जैसा या दही की तरह जमा हुआ...

  दुधारू पशुओं में मिल्क फीवर रोग के कारण एव बचाव के उपाय In animals giving more milk, excess calcium comes out of the body through milk and the animal becomes calcium deficit. This disease is called milk fever, but in this disease the body of the animal Instead of increasing the temperature, it is less than normal.  दुधारू पशुओं में मिल्क फीवर रोग के कारण एव बचाव के उपाय मिल्क फीवर रोग मुख्यत ज्यादा दूध देने वाले पशुओं में सामान्यतया गर्भावस्था के अंत में ब्याने के कुछ समय के मध्य होता है। यह एक उपापचय (मेटाबोलिक) रोग है जो कि रक्त में कैल्शियम की कमी से होता है यह रोग अधिक दूध देने वाले पशुओं के ब्याने के 2 से 3 दिन के अंदर होता है लेकिन ब्याने के बाद अधिकतम उत्पादन के समय भी हो सकता है।  मिल्क फीवर अधिक दूध देने वाली गाय व भैंस में तीसरे से सातवें ब्यात में अधिक होता है। मिल्क फीवर रोग भेड़ व बकरियों में भी पाया जाता है । ज्यादा दूध देने वाले पशुओं में ब्याने के बाद काफी मात्रा में कैल्शियम खीस के साथ निकालने से इसकी कमी हो जाती है दूध के द्वारा अधिक मात्रा में कैल्शियम शरीर से बाहर आ जाता है इस रोग को मिल्क फीवर कहते है लेकिन इस रोग में पशु...

पशुओं में ब्रूसेल्लोसिस रोग का उपचार एवं रोकथाम ब्रुसेलोसिस रोग गाय, भैंस, भेड़ एवं बकरी में फैलने वाली एक संक्रामक बीमारी है, जो बुसेला बैक्टीरिया के कारण होती है,जो  पशुओं से मनुष्यों में एवं मनुष्यों से पशुओं में फैलती है। इस बीमारी से ग्रस्त पशुओं में 7-9 महीने के गर्भकाल में गर्भपात (Abortion) हो जाता है। इस रोग को अडुलेट ज्वर और माल्टा ज्वर भी कहते है। ये रोग पशुशाला में बड़े पैमाने पर फैलता है तथा पशुओं में गर्भपात हो जाता है, जिससे बहुत अधिक आर्थिक नुकसान होता है।ये बीमारी मनुष्य के स्वास्थ्य एवं आर्थिक दृष्टिकोण से भी बेहद घातक रोग है। ब्रुसेलोसिस रोग का कारण - ब्रूसेलोसिस ब्रूसेला नामक जीवाणु से होता है। गाय, भैंस में ये रोग ब्रूसेल्ला एबोरटस नामक जीवाणु द्वारा होता हैं तथा भेड़ एव बकरी में ये ब्रूसेल्ला मेलिटरंसिस जीवाणु से होता है।  यह जीवाणु ग्याभिन पशु की बच्चेदानी में रहता है तथा अंतिम तिमाही में गर्भपात करवा देता है। एक बार संक्रमित हो जाने पर जीवन काल तक यह जीवाणु पशु के दूध तथा गर्भाश्य के स्त्राव में निकालता है।पशुओं में ब्रुसेल्लोसिस रोग संक्रमित पदार्थ के खाने से, जननांगों के स्त्राव से, योनि स्त्राव से, संक्रमित चारे से, रोगी पशु का कच्चा दूध पीने से, असावधानी पूर्वक जेर निकलने से तथा संक्रमित वीर्य से, कृत्रिम गर्भाधान द्वारा फैलता...

पंगेसियस मछली को तालाबों और पिंजरों में पालने की सही विधि पंगेसियस एक अत्यधिक प्रवासी नदी की प्रजाति है, और यह समग्र रूप से कृषि क्षेत्र में सबसे तेजी से बढ़ने वाली मीठे पानी की मछली प्रजातियों में से एक है। यह मछली वियतनाम की मेकांग नदी की मूल निवासी है और पूरे महाद्वीप में एक जलीय कृषि प्रजाति के रूप में पेश की गई है। हाल ही में, कैटफ़िश ने विश्व जलीय कृषि में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभानी शुरू कर दी है। पंगेसियस की खेती दुनिया भर में तेजी से विकसित होने वाले जलीय कृषि प्रकारों में से एक माना जाता है। वैश्विक वार्षिक कैटफ़िश उत्पादन (FAO, 2014) में पंगेसियस का लगभग 40% योगदान है। FAO के अनुसार, २०१८ में पंगेसियस ने कुल वैश्विक जलीय कृषि में 4.3% का योगदान दिया है और 2015 से 2030 तक एशियाई क्षेत्र में और बढ़ने की उम्मीद है। जलीय कृषि भारत में सबसे तेजी से बढ़ने वाले क्षेत्र में से एक है जो हाल के दिनों में प्रजातियों के विविधीकरण (नई प्रजातियों की शुरूआत) और नई कृषिप्रणाली के कारण 6-7% प्रति वर्ष की दर से बढ़ा है। भारत में मीठे पानी की जलीय कृषि, कुल जलीय कृषि उत्पादन में 95% से अधिक का योगदान करती है। पंगेसियस में कई गुण हैं जो इसे जलीय कृषि के लिए...

Ocean Farming: Smart and Sustainable agriculture on water bodies कृषि एवं संबंधित उद्योग वैश्विक स्तर पर मौलिक और वास्तविक परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम इस अपरिहार्य परिवर्तन को समझें और कृषि में संरचनात्मक बदलाव की वैश्विक गति को बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाएं। कृषि में इस तरह के परिवर्तन के कारणों पर तीन बिन्दुओं के तहत चर्चा की जा सकती है। सबसे पहले, विश्व में मानव आबादी की निरंतर वृद्धि वास्तव में हमें 2050 (संयुक्त राष्ट्र, 2019) तक 10 बिलियन जनसंख्या तक ले जायेगी और कोविड-19 जैसी महामारी ने पहले ही वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला में बहोत बडा व्यवधान पैदा किया है। दूसरा, अंधाधुंध उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग, मीठे पानी का खनन, वनों की कटाई, भूमि क्षरण, मृदा की उर्वरता में गिरावट और अत्यधिक एकल फसल पध्दती इत्यादी से वैश्विक कृषि के कार्बन फुट प्रिंट बढ रहे है और उसके द्वारा संचालित वैश्विक जलवायु परिवर्तन इस बदलाव का कारण है। तैरते कृषि का महासागरीय खेती के रूप में आभासी प्रतिनिधत्व (स्त्रोतः फोब्र्स पत्रिका 2020) तीसरा, इस संरचनात्मक कृषि परिवर्तन को नैनो-उर्वरक, परिशुद्धि खेती, ऊध्र्वाधर खेती, ड्रोन, रोबोटिक्स, उपग्रह, स्वचालित कृषि मशीनरी और मशीन लर्निंग जैसी नवीन वैज्ञानिक तकनीकों द्वारा भी संभव किया जा रहा है। वर्तमान में, वैश्विक भूमि क्षेत्र का 11 प्रतिशत क्षेत्र...

Nodular skin, Lumpy skin disease in cattle लम्पी स्किन डिजीज (LSD) या गांठदार त्वचा रोग राजस्थान के कई जिलों में फैला हुआ है। यह एक तेजी से फैलने वाली विषाणु जनित बीमारी है। यह बीमारी पशुपालको के आर्थिक नुकसान का प्रमुख कारण है। यह रोग  गाय और भैंसो में मुख्य रूप से देखा गया है। इस रोग में पशु के पूरे शरीर पर गांठे बन जाती है इस लिए इसको गांठदार त्वचा रोग भी कहते है | यह रोग भेड़ व बकरी माता जैसे विषाणु के कारण होता है। यह रोग परजीवी जैसे कीड़े ,मच्छर एवं मक्खियों के काटने से फैलता है। यह रोग संक्रमित पशु के चारे, दाने व घाव से भी फैल सकता है। इस रोग के कारण पशुओं में मृत्यु दर काफी कम होती हैं या 10 प्रतिशत तक हो सकती है, लेकिन विशेष रूप से कम उम्र के दुधारू पशुओं के अधिक प्रभावित होने से दूध उत्पादन कम हो जाता है, जिससे पशुपालक को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इस रोग में पशु को तेज बूखार आ जाता है, जो लगभग 6-7 दिन तक रहता है। लसिका ग्रथियों में सूजन आ जाती है। कभी -कभी पशु के नाक और आँखो से पानी आता है। पशु का दूध उत्पादन काफी कम हो जाता है। शरीर के वजन में कमी और कभी- कभी मृत्यु भी हो...