Agriculture Knowledge for Everyone

Animal husbandry

Use of organic manure in fish productivity मछली पालन आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है मछली पालन कई मछुवारे परिवारो के जीवन व्यतीत करने का प्रमुख साधन/ व्यवसाय है  परन्तु मछली पालन से जितना मत्स्य पालकों को लाभ प्राप्त होना चाहिए वो नही हो पाता है क्योकि मछलियों का उत्पादकता दर बहुत कम ही हो पाता है, जिसका प्रमुख कारण मछलियों को पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों का नहीं मिल पाना है मछलियों में हो रहे पोषक तत्वों के कमी को खाद पदार्थो का उपयोग करके किया जा सकता है यह खाद पदार्थ बहुत से प्रकार के होते है जैसे की गाय के गोबर, सूअर, मुर्गी, पालन से निकल रहे अपशिस्ट पदार्थ इत्यादि। चूंकि‍ इन अपशिस्ट पदार्थों में बहूत सारे आवश्यक पोषक तत्व पाए जाते है जो तालाबों में सूक्ष्मजीवी जीवों के लिए आवश्यक आहार का कार्य करता है जिससे तालाबो में पादप प्लवक (phytoplankton) एवं जंतु प्लवक (zooplankton)की संख्या बढ़ जाती है एवं इन जीवों को मछलियाँ प्रमुख रूप से भोजन के रूप में उपयोग करती है उत्पादकता: उत्पादकता का विचार सर्वप्रथम १७६६ में प्रकृतिवाद के संस्थापक क्वेसने के लेख में सामने आया। उत्पादन दक्षता की औसत माप है।  उत्पादकता को इस प्रकार से व्याखित किया जा सकता है। किसी भी एक स्थाई स्थान एवं स्थाई समय अन्तराल में जीवो के द्वारा अकार्बनिक पदार्थो से...

How to properly nurture newborn calf? पशुपालन व्यवसाय की सफलता के लिये उचित संख्या में उत्तम गुणों वाले बच्चों का विकास आवश्यक है। यही बछड़े बड़े होकर पुराने, बूढ़े तथा अनुत्पादक पशुओं का स्थान लेते है। इस तरह यह सतत प्रक्रिया चलती रहती है एवं उत्पादकता और लाभ दोनों ही बढ़ते हैं। यदि बछड़े पर्याप्त संख्या में ना हों तो अगली पीढ़ी के लिये उच्च उत्पादकता के पशु चयन करने में सफलता नहीं मिल पाएगी । यदि पालन पोषण पर ध्यान नहीं दिया जाए तो बछड़ों की मृत्युदर अधिक हो जाती है साथ ही जो बच्चे बच जाते हैं उनकी वृधिदर कम हो जाती है तथा उत्पादकता घट जाती है। बछड़ों की मृत्युदर सबसे अधिक जन्म से एक माह तक की आयु में होती है। पशुओं की विभिन्न प्रजातियों में इनके कारण भिन्न होते हैं । परन्तु कुछ कारण सभी में एक जैसे होते हैं एवं इनसे बचाव के उपाय भी समान होते हैं। कुछ सावधानियों को ध्यान में रखकर इनका उचित प्रबंधन करने से मृत्युदर में कमी की जा सकती है। बछड़े के पैदा होने का स्थान कैसा हो?   बछड़ों का स्वास्थ इस बात पर निर्भर होता है की उसका जनन स्थल कैसा है। यह बात सभी प्रजातियों  जैसे गाय, भैस, भेड़, बकरी, शुकर आदि पर सामान रूप से लागु होती है। बच्चा देने वाले...

Scientific management of milch cattle and milk harness भारत में डेयरी उद्योग तेजी से बढ़ रहा हैl अब इसका विस्तार सीमान्त किसानों के जीविकोपार्जन से आगे निकलकर व्यावसायिक रूप में हो रहा है l वर्तमान समय में भारत को दुग्ध उत्पादन में सर्वश्रेष्ठ देश होने का गौरव प्राप्त है l विश्व के कुल दुग्ध उत्पादन में १८% हिस्सा हमारा देश उत्पादित कर रहा हैl गाय एवं भैंस हमारे देश के मुख्य डेयरी पशुओं में आते हैंl दुग्ध उत्पादक किसानों द्वारा दोनों तरह के पशु पाले जाते हैं l किसानों के लिए अधिक दुग्ध उत्पादन के लिए अच्छी नस्ल के चयन के साथ ही उनका उचित प्रबंधन भी अत्यंत आवश्यक होता है l इसके लिए सर्वप्रथम दुग्ध स्त्रवण की प्रक्रिया को समझना आवश्यक है l दुधारू पशुओं में दुग्घ स्त्रवण गाय एवं भैसों का अयन (udder) चार अलग-अलग भागों में विभाजित होता है एवं चारों भाग एक दुसरे से बिलकुल अलग होते हैंl  अयन में दुग्ध उत्पादन कि इकाई इसमें पाई जाने वाली असंख्य कुपिकाएँ (एल्विओलस) होती हैl जिनके अंदर दुग्ध स्त्रवण करने वाली कोशिकाएं पाई जाती हैंl इन कोशिकाओं के चारों ओर सूक्ष्म रक्त वाहिकाएं एवं मांसपेशियां होती हैंl प्रत्येक १ लीटर दूध बनाने के लिए लगभग ४०० लीटर रक्त इन कोशिकाओं में प्रवाहित होता हैl ये कोशिकाएं रक्त से आवश्यक तत्वों को लेकर दूध...

जलीय कृषि में असवेंदनता दवाइयों का उपयोग  मछलियाँ सवेदन शील जीवों में से एक होती है इन्हे पकड़ने, यातायात एवं किसी भी बीमारी से बचाव के लिए दवाई दिए जाने के वक्त यह बहुत ही जल्दी तनाव में आ जाती है जिसके कारण कई बार मछलियों को शारीरक चोट पहुच जाती है तो कई बार मछलियों के इन तनावों के कारण मृत्यु भी हो  जाती है जिससे प्रमुख हानि मछली पालकों को होता है इन सभी हानियों को चेतना शून्य करने वाली औषधियों का उपयोग करके कम किया जा सकता है।  इस औषधि के उपयोग से मछलियों में तिलमिलाहट कम हो जाती है जिससे आसानी से मछलियों को पकड़ा एवं एक जगह से दुसरे जगह तक ले जाया सकता है! असंवेदनकारी दवाऐं, मछलीयों को बिना किसी शारीरिक जख्म एवं हानि‍ पहुचाऐ ,  हॉर्मोन या किसी बीमारी से बचाव की दवाइयों को मछलियों के शरीर में डालने के वक्त भी मददगार है यह असवेंदन दवाइयां कुछ समय तक असर करने के बाद पुन: मछलियों को उसके प्राथमिक स्तिथि की तरह ला देती है जिससे मछलियों को कोई हानि नहीं होती है एवं इसको उपयोग करने का  तरीका भी बहुत ही असान है मछली पालक इन औषधियों को आसानी से उपयोग कर सकते है परंतु इन औषधियों के उपयोग के लिए सावधानी बहुत जरूरी है।  यह औषधियां...

Role of goat farming in doubling farmer’s income बकरी पालन ग्रामीण भारत में किसानों के लिए गरीबी कम करने की तकनीकों में से एक है। 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के लक्ष्य के साथ, संयुक्त राष्ट्र (यू.एन.) की एक विशेष एजेंसी, इंटरनेशनल फंड फॉर एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट (आईएफएडी) के सहयोग से भारत सरकार किसानों को गरीबी से बाहर निकालकर भारत में बकरी पालन का विकास कर रही है। बकरियां पालना एक आमदनी पैदा करने वाली गतिविधि है, जिसमें विशेषकर दूरदराज के, आदिवासी और पारिस्थितिक रूप से कमजोर क्षेत्रों के लिए आय बढ़ाने और पोषण में सुधार करने की काफी संभावना है। ऐसी खेती में न्यूनतम निवेश और इनपुट लागत की आवश्यकता होती है। भारत वैश्विक बकरी आबादी में दूसरे स्थान पर है और यहां यह उल्लेख करना उचित है कि देश में उत्पादक वैश्विक बकरी बाजार में अपनी भूमिका और लाभ बढ़ाने की क्षमता है। बकरियां कठोर पर्यावरणीय परिस्थितियों में जीवित रह सकती हैं और सूखाग्रस्त क्षेत्रों में उनकी जीवित रहने की दर अच्छी होती है। पीढ़ी अंतराल कम है और वे एक वर्ष में दो बार गर्भधारण करने और प्रजनन करने में सक्षम हैं और ज्यादातर वे जुड़वा बच्चों को जन्म देते हैं, कभी-कभी तीन या चार बच्चे जन्म देते हैं यह खेती उन किसानों, खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए...

दुधारू पशुओं के लिए आहार प्रबंधन  डेयरी व्यवसाय के लिए उत्तम नस्ल के साथ-साथ आहार प्रबंध अति आवश्यक है। उचित आहार प्रबंध से न केवल पशु अधिक दूध देते हैं बल्कि उसकी शारीरिक बढ़वार, प्रजनन क्षमता एवं स्वास्थ्य पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है। लाभप्रद डेयरी व्यवसाय हेेतुु पशु को बचपन से लेकर वृद्धि की विभिन्न अवस्थओ, प्रजनन काल एवं उत्पादन काल के दौरान समुचित पोषण उपलब्ध होना चाहिए। बछड़े-बछड़ियों की उनकी आरंभिक अवस्था में वृद्धि एवं मृत्यूू, गर्भकाल में माँ केे आहार प्रबंधन से प्रभावित होता है । बछड़ियों को जन्म के 2 घंटे के अंदर माँ का खीस पिलाना आवश्यक है। खीस की मात्रा निर्धारण बछड़ियों के शारीरिक भार पर निर्भर करता है। जब बछड़ियों को माँ के साथ रखा जाता हैं, तो आवश्यकतानुसार वे माँ से पोषण ले लेती हैं। परन्तु यदि कृत्रिम विधि से पाला जा रहा है, तो इस बात का महत्व और भी अधिक हो जाता है। आरंभिक अवस्था में दूध बच्चे के लिए सम्पूर्ण आहार का कार्य करता है इसलिए उसे समुचित मात्रा में दूध उपलब्ध होना चाहिए। नवजात के पालन - पोषण में सबसे महत्वपूर्ण स्थान खीस पिलाने का है। खीस न मिलने से बछड़े-बछियों में रोगो से लड़ने की क्षमता का विकास नही हो पाता हैै, साथ ही बीमार होने की संभावना बढ़ जाती...

Backyard poultry farming घर के पिछवाड़े मे छोटे स्तर पर मुर्गियों को घरेलू श्रम और स्थानीय उपलब्ध दाना-पानी का उपयोग करते हुए बिना किसी विशेष आर्थिक व्यय के पालन पोषण को बैकयार्ड कुक्कुट पालन कहते है। कुक्कुट पालन आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोगों को आर्थिक स्वावलंबन दिलाने मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। बैकयार्ड कुक्कुट पालन प्रायः दोहरे उपयोग वाली मुर्गियों का उपयोग बैकयार्ड कुक्कुट पालन के लिए किया जाता है।  इसमे मुर्गियाँ घर की चारदीवारी के अंदर स्वतः विचरण करते हुए आपना खाना पीना खुद खोजती हैं। बैकयार्ड कुक्कुट को पालने के लिए किसी विशेष घर की आवाश्यकता नहीं होती है । मुर्गीयों को प्रायः बांस की टोकरी अथवा कार्ड बोर्ड के बक्से मे रात को शिकारियो से बचाने के लिए रखा जाता है। ये अधिकतर रसोई अवशिष्ट, टूटे हुए अनाज के दाने, कीड़े मकोड़ों आदि को खाकर जिंदा रहती हैं। इन्हे सिर्फ कुछ मात्रा मे अलग से घटा हुआ  दाना-पानी देने की आवश्यकता होती है। इन्हे अंडा देने के दिनों मे अच्छी शेल की क्वालिटी के लिए शैल ग्रिट अथवा मार्बल के छोटे छोटे टुकड़े प्रतिदिन 5-7 ग्राम/ पक्षी देना चाहिए।  बैकयार्ड कुक्कुट पालन के लाभ इसके लिए बहुत कम जमीन, श्रम एवं पूंजी की आवश्यकता होती है। यह गाँव के लोगों को फसल की बर्बादी या अन्य आपात स्थितियों मे अतिरिक्त आय...

Nurturing and management of livestock पशुपालन ग्रामीण जीवन का महत्‍वपूर्ण अंग है। समृद्ध डेयरी व्‍यवसाय के कारण देश,  दुग्‍ध उत्‍पादन मे अग्रणी बना हुआ है। पशुओं के पालन पोषण एवं प्रबंधन  के लिए तीन बातों पर ध्यान देना अत्‍यंत आवश्‍यक है। सही जनन, सही खानपान और रोगों से बचाव 1. सही जनन: सही जनन के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। अच्‍छी नस्ल का चुनाव : पशुपालन के लिए नस्लों का चुनाव करते समय वहाँ की जलवायु और सामाजिक एवं आर्थिक परिवेश पर ध्यान देना आवश्यक है। बिहार की जलवायु के अनुसार यहा जो पशुपालक संकर नस्ल की पशु पालना चाहते है वह जरसी क्रॉस पाल सकते है। वैसे इलाके जहां हरा चारा प्रचुर मात्रा मे उपलब्ध है वहाँ फ्रीसियन क्रॉस भी पाली जा सकती है। जो पशुपालक देशी नस्ल की गाय पालना चाहते है वो साहिवाल, रेड सिंधी अथवा थरपारकर नस्ल की गाय पाल सकते है। भैंसों मे मुर्रा नस्ल की भैंस को पालना यहा की आवो हवा के अनुसार सबसे उपयुक्त है। कृत्रिम गर्भाधान: मादा के जननांग मे शुक्राणु को कृत्रिम रूप से रखने की प्रक्रिया को कृत्रिम गर्भाधान कहते हैं। इसके कई लाभ हैं सांढ को पालने की आवश्यकता नहीं रहती है संक्रामक बीमारियो के फैलने की संभावना कम हो जाती है। उत्तम गुण वाले सांढ का उपयोग अधिक से अधिक किया जा सकता है। नर के मरने...